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Sunday, October 18, 2009

सामाजिक सरोकारों के लिए जेल पहुंचा पत्रकार .....इस विलुप्‍त होती नस्‍ल को आपके समर्थन की जरूरत है।

दिल्‍ली और नोएडा-गाजियाबाद के सामाजिक सरोकार रखने वाले सभी पत्रकारगण तपीश मेंदोला के नाम से परिचित होंगे। अगर आपको याद न हो तो बता दें कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान इसी नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता के अथक प्रयासों की बदौलत दिल्‍ली, नोएडा और गाजियाबाद में बड़े पैमाने पर गरीबों के बच्‍चों के गुमशुदा होने और पुलिस-प्रशासन की तरफ से उन्‍हें कोई मदद न मिलने उल्‍टा लापता बच्‍चों के गरीब मां-बाप को ही डराने, धमकाने और अपमानित करने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनीं। अनेक अखबारों और न्‍यूज चैनलों ने तपिश का इंटरव्‍यू भी लिया और दिखाया और कईयों ने उनकी मदद से लेकिन उनका या उनके संगठन नौजवान भारत सभा का नाम लिए बगैर प्रस्‍तुतियां कीं।

तपिश और नौजवान भारत सभा तथा सहयोगी संगठनों के प्रयासों की बदौलत गुमशुदा बच्‍चों के मामले पर दिल्‍ली हाइकोर्ट में सुनवाई चल रही है और कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में पुलिस-प्रशासन को काफी लताड़ भी पिलाई है।

फिलहाल तपिश और उनके दो और नौजवान साथी एक अन्‍य मजदूर के साथ जेल में बंद हैं, उनका जुर्म यह है कि उन्‍होंने एक बेहद मानवीय और कानूनी मसले पर कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए गोरखपुर के मजदूर आंदोलन का साथ दिया और उसमें अग्रणी भूमिका निभाई। कदम कदम पर फैक्‍ट्री मालिकों और जिला प्रशासन द्वारा विश्‍वासघात करने के बावजूद ढाई तीन महीने से चल रहे इस जुझारू आंदोलन में मजदूरों की तरफ से कोई उकसावे या हिंसा की घटना अभी तक सामने नहीं आयी है, हालांकि मालिकों और प्रशासन की तरफ से इस तरह की गति‍विधियां लगातार जारी रही हैं। मालिकों ने अपने गुंडों के साथ मिलकर मजदूरों और उनके नेताओं पर जानलेवा हमला भी किया जिसमें स्‍वयं एक फैक्‍ट्री के मालिक ने रिवाल्‍वर से मारकर मारकर एक नौजवान प्रमोद का सिर फोड़ दिया। पर लोकत़ंत्र का खेल यह कि स्‍वयं इन नौजवानों और मजदूरों के खिलाफ ही कई प्रकार की धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया।

आंदोलन के दबाव में आने के बाद जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई 12 वा‍र्ताएं फैक्‍ट्री मालिकों के असहयोग या अनुपस्थिति के कारण असफल सिद्ध हो चुकी हैं। इसके बाद अनशन पर बैठे मजूदरों को डराने धमकाने का पुलिसिया नाटक लगातार चल रहा था कि 15 अक्‍टूबर को बातचीत के बहाने मजदूर आंदोलन के तीन अग्रणी साथियों तपिश, प्रशांत और प्रमोद को प्रशासन ने बातचीत के बहाने एडीएम के कार्यालय बुलाया गया।

प्रशासन की नेकनीयत पर भरोसा करके वार्ता के लिए पहुंचे तीनों नौजवानों के साथ एडीएम के कार्यालय में सिटी मजिस्‍ट्रेट, एडीएम सिटी और कैंट थाने के इंस्‍पेक्‍टर और कुछ और पुलिस वालों ने बेरहमी से मारपीट की। फैक्‍ट्री मालिकों के लठैत की भूमिका में आ चुके प्रशासन ने लोकतंत्र का नकाब उतारकर पूरी नंगई के साथ बेरहम सलूक किया। बताने के बावजूद ह्रदय रोगी प्रशांत पर भी इन सरकारी दरिंदों ने अपना कहर बरपा किया और 17 अक्‍टूबर की शाम तक उन्‍हें डाक्‍टरी मदद नहीं दी गई थी। हालांकि पुलिस उनपर कोई गंभीर धारा नहीं लगा सकी बावजूद इसके उन्‍हें जमानत नहीं दी गई है और 22 अक्‍टूबर तक के लिए जेल भेज दिया गया है।

मुद्दा यह है कि अपने संविधानप्रदत्त जायज और बेहद छोटी मांगों के लिए भी यदि ऐसी ज्‍यादतियों का शिकार होना पड़े तो शायद शरीफ नागरिकों के सोचने का भी वक्‍त आ गया है कि यह लोकतंत्र है या निरंकुश तानाशाही। यह बात सिर्फ तपिश और उनके साथियों या गोरखपुर के मजदूर आंदोलन की नहीं है बल्कि यही हाल पूरे देश में है और 99.9 प्रतिशत मामलों में यही होता है। आज अगर हम चुप बैठे तो कल को यही हमारे साथ भी होगा और तब कोई बोलने वाला नहीं होगा।

मीडिया के सामाजिक सरोकारों पर बेहद गंभीर चर्चाएं करने वाले साथियों से मैं कहना चाहूंगा कि अब उससे आगे बढ़कर कुछ करने का समय आ गया है। सामाजिक सरोकार रखने वाला एक जुझारू पत्रकार अपने दो और नौजवान साथियों और एक मजदूर साथी के साथ जेल में बंद है क्‍योंकि उसने वह किया जो हम सबको करना चाहिए। सामाजिक सरोकार रखने वाले पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की विलुप्‍त होती प्रजाति के जो लोग भी शेष बचे हैं उनसे मेरी अपील है कि इस मुद्दे पर आगे आएं और अपना सहयोग-समर्थन दें।

विस्‍तृत जानकारी के लिए यहां क्लिक करें

अपना सहयोग-समर्थन देने के लिए और अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें :
सत्‍यम : 9910462009 ईमेल: satyamvarma@gmail.com
संदीप : 9350457431

Wednesday, September 24, 2008

हर साल 400,000 कामगारों की मौत पर चुप्‍पी लेकिन एक सीईओ की मौत पर इतना स्‍यापा

हर इन्‍सान की जान कीमती होती है। चाहे वह मज़दूर हो या पूँजीपति। पूँजीवादी जनतन्‍त्र भी इसे अपना आदर्श घोषित करता है लेकिन असलियत में इसे लागू नहीं करता। अपने जीवन से हर आदमी यह महसूस कर सकता है कि किस तरह विधायिका, न्‍यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया तक पैसेवालों की सेवा में लगे रहते हैं।

कल ग्रेटर नोएडा में एक कम्‍पनी के काम से निकाले गये मज़दूरों और कम्‍पनी के प्रबंधन और सुरक्षाकर्मियों के बीच हिंसक संघर्ष में कम्‍पनी के सीईओ की मौत हो गयी। इस घटना के द्वारा आइये इस व्‍यवस्‍था के विभिन्‍न खम्‍भों और समाज के विभिन्‍न वर्गों की मानसिकता की पड़ताल करने की कोशिश की जाये और कुछ निष्‍कर्षों पर पहुँचा जाये।

अन्‍तरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में प्रति वर्ष 400,000 कामगारों (प्रतिदिन तकरीबन 100 से ज्‍यादा) की मौत हो जाती है और इसके अतिरिक्‍त 350,000 कामगार काम सम्‍बन्‍धी बीमारियों से ग्रस्‍त हो जाते हैं। कभी ब्‍वॉयलर फटने से तो कभी दीवार ढहने से तो कभी करेंट लगने से मज़दूरों की मौत होना आम बात है। सीवरों की सफ़ाई के दौरान अकसर ही सफ़ाई कर्मियों की मौत हो जाती है या वे बेहोश हो जाते हैं। ज्‍यादतर मज़दूरों की मौत उपयुक्‍त सुरक्षा उपकरणों के न होने से होती हैं। ख़तरनाक से ख़तरनाक काम भी हेल्‍मेट, जूतों और दस्‍तानों के बगैर ही मज़दूरों से करवाये जाते हैं। वास्‍तव में कितने मज़ूदूर काम के दौरान मरते हैं यह पता करना एक मुश्किल काम है, क्‍योंकि ज्‍यादातर कम्‍पनियॉं ठेकेदारी, दिहाड़ी और पीस रेट पर काम करवाती हैं और मज़दूरों का कोई लेखा-जोखा नहीं रखतीं। सच्‍चाई यह है कि शायद ही कोई कम्‍पनी सरकार द्वारा तय न्‍यूनतम मज़दूरी देती है और सरकार द्वारा तय सुरक्षा मानकों का पालन करती है। बहुत कम ही ऐसी कम्‍पनियॉं हैं जहॉं दुर्घटना के बाद फर्स्‍ट एड बाक्‍स तत्‍काल उपलब्‍ध हो सके। पीने के पानी, हवा, रोशनी, शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी कम्‍पनियॉं ध्‍यान नहीं देती हैं। और ऐसी स्थितियों में मज़दूरों से 12 से 14 घण्‍टे तक जबरदस्‍ती काम करवाया जाता है, गाली-गलौच की जाती है, महीनों-महीनों तक एक भी छुट्टी नहीं दी जाती। कम से कम पगार पर काम करवाया जाता है और उसका भी समय से भुगतान नहीं किया जाता और जब चाहा काम पर रखा जब चाहा निकाल बाहर किया।

पर यह सब मुद्दे कभी मुख्‍यधारा की चिन्‍ता का सबब नहीं बनते। किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनते किसी न्‍यूज चैनल पर जगह नहीं पाते। कोई सरकारी अधिकारी या मन्‍त्री इन पर कुछ नहीं बोलता। मरने वाले मज़दूर को मुआवज़ा मिला या नहीं उसके परिवार का क्‍या हुआ, उसके बच्‍चे कैसे जीयेंगे इन प्रश्‍नों पर शरीफ़ से शरीफ़ नागरिक भी बहुत चिन्‍ता और सरोकार से नहीं सोचता। सरकार सिर्फ कानून बनाकर अपने कर्तव्‍यों की इतिश्री कर लेती है और कानून कागजों में बन्‍द होकर रह जाते हैं।

लेकिन अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष करने वाले मज़दूरों के साथ झड़प में एक सीईओ की मौत पर पूरा मीडिया जगत छाती पीट रहा है। अधिकारी और मन्‍त्री बयान दे रहे हैं, पुलिस ने 136 से अधिक मज़दूरों को हिरासत में ले लिया है और 63 पर हत्‍या का आरोप लगाया है। उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम और फिक्‍की ने इस हिंसक घटना की घोर निन्‍दा की है और मुजरिमों पर तत्‍काल और सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई की मॉंग की है। एस्‍सोचैम के अध्‍यक्ष सज्‍जन जिंदल ने इसे एक क्रूरतापूर्ण जुर्म करार दिया है और पूँजीपतियों के इन संगठनों ने धमकी दी है कि इससे निवेशकों के बीच देश की छवि खराब होगी। इन संगठनों ने श्रम मन्‍त्री आस्‍कर फर्नांडीज को इसलिए लताड़ा है कि उन्‍होंने प्रबंधन से मजदूरों के साथ हमदर्दी बरतने को कहा। यह कहने के लिए निश्चित है कि श्रम मन्‍त्री को सरकार और '10 जनपथ' की तरफ से अभी और डॉंट पड़ेगी या पड़ चुकी होगी।

नंगे तौर पर देखा जा सकता है कि ये तमाम पूँजीवादी तन्‍त्र जो प्रतिवर्ष 400,000 मज़दूरों की मौत कुछ नहीं कहते एक सीईओ की मौत पर कैसे सक्रिय हो गये हैं। मजदूरों की मौत पर शायद ही किसी पूंजीपति, अधिकारी पर कोई कार्रवाई होती है और अगर होती भी है तो इतनी मामूली कि उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और मजदूरों की मौत का सिलसिला लगातार जारी रहता है। भोपाल गैस काण्‍ड जैसी विभत्‍स घटना के बीस साल बाद भी मुजरिमों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है और हजारों प्रभावित लोगों को राहत नहीं दी गई है। फिक्‍की, एस्‍सोचैम, सीआईआई इस बारे में कभी कुछ नहीं कहते। पर एक सीईओ की मौत पर उन्‍होंने तत्‍काल हंगामा खड़ा कर दिया यह जाने बगैर कि गलती किसकी थी। एक कहावत है कि ताकतवर कभी गलत नहीं होता, गलती हमेशा कमजोर की ही होती है।


तो इस सबसे क्‍या यह निष्‍कर्ष नहीं निकलता कि इस व्‍यवस्‍था में मज़दूरों और आम लोगों की जिन्‍दगी की कोई क़ीमत नहीं है और तब फिर क्‍या यह निष्‍कर्ष नहीं निकलता कि मज़दूरों को इस व्‍यवस्‍था से कोई उम्‍मीद भी नहीं करनी चाहिए...।