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Wednesday, October 1, 2008

ग्रेजियानो की घटना

पूंजीवादी शोषण के खिलाफ मजदूरों में सुलगते आक्रोश से उठी एक चिंगारी!


मेहनतकश साथियो,


ग्रेटर नोएडा की ग्रेजियानो कंपनी में उठे मजदूर असंतोष की लपट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पूंजीवादी शोषण की चक्‍की में पिस रहे देश के करीब 50 करोड़ मजदूर हमेशा चुप नहीं बैठे रहेंगे। घटना के बाद देश के श्रम मंत्री तक को यह स्‍वीकारना पड़ा कि देश भर के मजदूरों में भीतर ही भीतर असंतोष सुलग रहा है। यह बात गौर करने लायक है कि देश के उद्योग संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद श्रम मंत्री को अपना थूका हुआ चाटना पड़ा और उसे अपने मालिकों से माफी मांगनी पड़ी। पूंजी की चाकर इन सरकारों और मंत्रियों से भला और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है।

360 करोड़ रुपये का सालाना प्रोडक्‍शन देने वाले ग्रेजियानो के करीब 350 मजदूर एक साल से बपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इनमें से अधिकांश पिछले 7-8 वर्षों से कार्यरत थे। मुनाफे की हवस का शिकार कंपनी मैनेजमेंट सोच रहा था कि जब बाजार में 2000-2500 रुपये पर काम करने वाले लोगों की भरमार है तो फिर पुराने मजदूरों को 6000 रुपये मासिक वेतन क्‍यों दिया जाये? यही सोचकर पुराने मजदूरों को निकाला जाने लगा। मजदूरों ने इसके खिलाफ श्रम विभाग, कंपनी मैनेजमेंट, जिला प्रशासन, गृह मंत्री और इटली की सरकार तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन राजा भोज भला गंगू तेली की कहॉं सुनने वाले थे। मजदूरों की नामलेवा ट्रेड यूनियनों ने भी दलाली खाकर मालिकपरस्‍ती का नंगा प्रदर्शन किया।

इस तरह अपने हक की लड़ाई में मजदूर अलग-थलग पड़ गये। मौके का फायदा उठाते हुए कंपनी ने 22 सितंबर को समझौते के नाम पर मजदूरों से भविष्‍य में आंदोलन न करने और माफीनामा लिखने का दबाव बनाया। इंकार करने पर उन्‍हें कंपनी के गुण्‍डों ने पीटना शुरू कर दिया और इर लड़ाई में कंपनी का सीईओ मारा गया।
उसके बाद जो कुछ हुआ वह आम गरीबों और मजदूरों की पूंजीवादी न्‍याय और सुशासन की झूठी आस-उम्‍मीद को तार-तार कर देने के लिए काफी है। सैकड़ों मजदूरों को गिरु्फ्तार किया गया। देश के पूंजीपतियों, राजनीतिक पार्टियों, गली-कूचे के टटपूंजिये नेताओं और मीडिया एवं गद्दार ट्रेड यूनियन नेताओं ने मजदूरों को हत्‍यारा घोषित कर दिया। कहा गया चाहे जैसे भी हालात रहे हों मजदूरों को और बर्दाश्‍त करना चाहिए था। दुर्घटनावश हुई एक सीईओ की मौत पर इतना शोर मचाने वालों से यहॉं यह पूछा जाना चाहिए कि हर रोज काम के दौरान मरने वाले 6000 (पूरे विश्‍व में-ब्‍लागर) मजदूरों की मौत पर ये हमेशा क्‍यों खामोश रहते हैं?

देश के मजदूरों-मेहनतकशों को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि पूंजी (मालिकों) और श्रम (मजदूरों) के बीच की इस लड़ाई में पूंजीपति और उनकी मैनेजिंग कमेटी यानी सरकार, पुलिस, कानून और गद्दार ट्रेड यूनियनें मजदूरों के खिलाफ एकजुट हैं। ऐसे हालात का मुकाबला करने के लिए मजदूर वर्ग को चाहिए कि किस्‍म-किस्‍म के चुनावबाज नेताओं और दलाल ट्रेड यूनियनबाजों का पिछलग्‍गू बनना बंद कर दें। मजदूरों को चाहिए कि वह सभी गरीबों-मेहनतकशों के साथ पूंजीवाद विरोधी क्रान्तिकारी आंदोलन के साथ आकर खड़े हों। और शोषण की संपूर्ण व्‍यवस्‍था के खात्‍मे को अपने जीवन का लक्ष्‍य बना लें। केवल तभी यह उम्‍मीद की जा सकती है कि मजदूरों की आने वाली पीढि़यां खुली हवा में आजादी की सांस ले सकेंगी।


अंधकार का युग बीतेगा, जो लड़ेगा वो जीतेगा!
बिगुल मजदूर दस्‍ता
नोएडा : 9891993332,
दिल्‍ली : 011-65976788
*** मजदूरों के क्रान्तिकारी संगठन बिगुल मजदूर दस्‍ता द्वारा ग्रेजियानो की घटना पर निकाला गया एक पर्चा।

Wednesday, September 24, 2008

हर साल 400,000 कामगारों की मौत पर चुप्‍पी लेकिन एक सीईओ की मौत पर इतना स्‍यापा

हर इन्‍सान की जान कीमती होती है। चाहे वह मज़दूर हो या पूँजीपति। पूँजीवादी जनतन्‍त्र भी इसे अपना आदर्श घोषित करता है लेकिन असलियत में इसे लागू नहीं करता। अपने जीवन से हर आदमी यह महसूस कर सकता है कि किस तरह विधायिका, न्‍यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया तक पैसेवालों की सेवा में लगे रहते हैं।

कल ग्रेटर नोएडा में एक कम्‍पनी के काम से निकाले गये मज़दूरों और कम्‍पनी के प्रबंधन और सुरक्षाकर्मियों के बीच हिंसक संघर्ष में कम्‍पनी के सीईओ की मौत हो गयी। इस घटना के द्वारा आइये इस व्‍यवस्‍था के विभिन्‍न खम्‍भों और समाज के विभिन्‍न वर्गों की मानसिकता की पड़ताल करने की कोशिश की जाये और कुछ निष्‍कर्षों पर पहुँचा जाये।

अन्‍तरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में प्रति वर्ष 400,000 कामगारों (प्रतिदिन तकरीबन 100 से ज्‍यादा) की मौत हो जाती है और इसके अतिरिक्‍त 350,000 कामगार काम सम्‍बन्‍धी बीमारियों से ग्रस्‍त हो जाते हैं। कभी ब्‍वॉयलर फटने से तो कभी दीवार ढहने से तो कभी करेंट लगने से मज़दूरों की मौत होना आम बात है। सीवरों की सफ़ाई के दौरान अकसर ही सफ़ाई कर्मियों की मौत हो जाती है या वे बेहोश हो जाते हैं। ज्‍यादतर मज़दूरों की मौत उपयुक्‍त सुरक्षा उपकरणों के न होने से होती हैं। ख़तरनाक से ख़तरनाक काम भी हेल्‍मेट, जूतों और दस्‍तानों के बगैर ही मज़दूरों से करवाये जाते हैं। वास्‍तव में कितने मज़ूदूर काम के दौरान मरते हैं यह पता करना एक मुश्किल काम है, क्‍योंकि ज्‍यादातर कम्‍पनियॉं ठेकेदारी, दिहाड़ी और पीस रेट पर काम करवाती हैं और मज़दूरों का कोई लेखा-जोखा नहीं रखतीं। सच्‍चाई यह है कि शायद ही कोई कम्‍पनी सरकार द्वारा तय न्‍यूनतम मज़दूरी देती है और सरकार द्वारा तय सुरक्षा मानकों का पालन करती है। बहुत कम ही ऐसी कम्‍पनियॉं हैं जहॉं दुर्घटना के बाद फर्स्‍ट एड बाक्‍स तत्‍काल उपलब्‍ध हो सके। पीने के पानी, हवा, रोशनी, शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी कम्‍पनियॉं ध्‍यान नहीं देती हैं। और ऐसी स्थितियों में मज़दूरों से 12 से 14 घण्‍टे तक जबरदस्‍ती काम करवाया जाता है, गाली-गलौच की जाती है, महीनों-महीनों तक एक भी छुट्टी नहीं दी जाती। कम से कम पगार पर काम करवाया जाता है और उसका भी समय से भुगतान नहीं किया जाता और जब चाहा काम पर रखा जब चाहा निकाल बाहर किया।

पर यह सब मुद्दे कभी मुख्‍यधारा की चिन्‍ता का सबब नहीं बनते। किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनते किसी न्‍यूज चैनल पर जगह नहीं पाते। कोई सरकारी अधिकारी या मन्‍त्री इन पर कुछ नहीं बोलता। मरने वाले मज़दूर को मुआवज़ा मिला या नहीं उसके परिवार का क्‍या हुआ, उसके बच्‍चे कैसे जीयेंगे इन प्रश्‍नों पर शरीफ़ से शरीफ़ नागरिक भी बहुत चिन्‍ता और सरोकार से नहीं सोचता। सरकार सिर्फ कानून बनाकर अपने कर्तव्‍यों की इतिश्री कर लेती है और कानून कागजों में बन्‍द होकर रह जाते हैं।

लेकिन अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष करने वाले मज़दूरों के साथ झड़प में एक सीईओ की मौत पर पूरा मीडिया जगत छाती पीट रहा है। अधिकारी और मन्‍त्री बयान दे रहे हैं, पुलिस ने 136 से अधिक मज़दूरों को हिरासत में ले लिया है और 63 पर हत्‍या का आरोप लगाया है। उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम और फिक्‍की ने इस हिंसक घटना की घोर निन्‍दा की है और मुजरिमों पर तत्‍काल और सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई की मॉंग की है। एस्‍सोचैम के अध्‍यक्ष सज्‍जन जिंदल ने इसे एक क्रूरतापूर्ण जुर्म करार दिया है और पूँजीपतियों के इन संगठनों ने धमकी दी है कि इससे निवेशकों के बीच देश की छवि खराब होगी। इन संगठनों ने श्रम मन्‍त्री आस्‍कर फर्नांडीज को इसलिए लताड़ा है कि उन्‍होंने प्रबंधन से मजदूरों के साथ हमदर्दी बरतने को कहा। यह कहने के लिए निश्चित है कि श्रम मन्‍त्री को सरकार और '10 जनपथ' की तरफ से अभी और डॉंट पड़ेगी या पड़ चुकी होगी।

नंगे तौर पर देखा जा सकता है कि ये तमाम पूँजीवादी तन्‍त्र जो प्रतिवर्ष 400,000 मज़दूरों की मौत कुछ नहीं कहते एक सीईओ की मौत पर कैसे सक्रिय हो गये हैं। मजदूरों की मौत पर शायद ही किसी पूंजीपति, अधिकारी पर कोई कार्रवाई होती है और अगर होती भी है तो इतनी मामूली कि उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और मजदूरों की मौत का सिलसिला लगातार जारी रहता है। भोपाल गैस काण्‍ड जैसी विभत्‍स घटना के बीस साल बाद भी मुजरिमों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है और हजारों प्रभावित लोगों को राहत नहीं दी गई है। फिक्‍की, एस्‍सोचैम, सीआईआई इस बारे में कभी कुछ नहीं कहते। पर एक सीईओ की मौत पर उन्‍होंने तत्‍काल हंगामा खड़ा कर दिया यह जाने बगैर कि गलती किसकी थी। एक कहावत है कि ताकतवर कभी गलत नहीं होता, गलती हमेशा कमजोर की ही होती है।


तो इस सबसे क्‍या यह निष्‍कर्ष नहीं निकलता कि इस व्‍यवस्‍था में मज़दूरों और आम लोगों की जिन्‍दगी की कोई क़ीमत नहीं है और तब फिर क्‍या यह निष्‍कर्ष नहीं निकलता कि मज़दूरों को इस व्‍यवस्‍था से कोई उम्‍मीद भी नहीं करनी चाहिए...।