घटना
यूनियन कार्बाइड - दिसंबर 2-3, 1984 की रात को अमेरिकी कंपनी की भारतीय सहायक कंपनी (यू सी आई एल) के प्लांट से जहरीली गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोगों की मौत और लाखों लोग प्रभावित।
ग्रेजि़यानो - ग्रेटर नोएडा स्थित ग्रेजियानो कंपनी के मजदूरों का आंदोलन और इस दौरान सीईओ ललित किशोर चौधरी की मौत।
घटना का कारण
यूनियन कार्बाइड - मुनाफे की हवस में शीर्ष प्रबंधन की जानकारी और आदेश पर बरती गई हर प्रकार की लापरवाही। निर्देशों की अवहेलना करते हुए बहुत अधिक मात्रा में अत्यंत जहरीली गैस का भंडारण। गैस को ठंडा करने वाले यंत्र का लंबे समय से बेकार पड़े रहना। चेतावनी देने वाले यंत्रों का काम न करना। यानी कि सारी की सारी जानबूझकर की गई लापरवाहियां।
ग्रेजियानो - अमानवीय कार्यस्थितियों, कम वेतन, छंटनी, प्रबंधन और उसके द्वारा पाले गए गुण्डों द्वारा गाली-गलौच और यूनियन बनाने की मांग पर मजदूरों ने आन्दोलन शुरू किया। कंपनी और ठेकेदारों के गुण्डों ने मजदूरों पर जानलेवा हमला किया (आजकल ये सभी उद्योगों में आम बात है)। सरिया, डंडों से मजदूरों की पिटाई की गई, सुरक्षा गार्डों ने फायरिंग भी की। लगभग 35 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस का दस्ता इस बीच पास में ही खड़ा रहा और प्रबंधन के इशारे पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि प्रबंधन अपने गुण्डों से मजदूरों को पिटवाकर अपनी ताकत दिखाना चाहता था। इस दौरान ग्रेजियानो के सीईओ ललित चौधरी को सिर पर चोट लग गई जो उनकी मौत का कारण बनी। क्या हुआ, कैसे हुआ यह किसी ने नहीं देखा। सीईओ की पत्नी के अनुसार ललित चौधरी की मौत व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा थी, मजदूरों के आंदोलन से उसका कोई संबंध नहीं था।
घटना के बाद की कार्रवाई
यूनियन कार्बाइड - कंपनी के मालिक वारेन एंडरसन को वीआईपी सरकारी मेहमान की तरह सरकारी हेलिकॉप्टर से भगा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उस समय कहा कि हम किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते हैं। कुछ अखबारों ने लिखा कि यह मजदूरों की करतूत थी। लगभग 26 साल तक कानूनी नौटंकी जिसमें जघन्य आरोपों को मामूली लापरवाही में तब्दील कर दिया गया। सजा के नाम पर प्रमुख आरोपियों को 2-2 साल की सजा हुई। सजा के साथ ही साथ जमानत भी थमा दी गई।
ग्रेजियानो - सीईओ की मौत के बाद सरकार से लेकर प्रशासनिक तंत्र और अदालत तक और उद्योगपतियों की संस्थाओं से लेकर मीडिया तक सबने एकसाथ मजदूरों पर हल्ला बोल दिया। इस मुद्दे पर सरकार ने वरिष्ठ नौकरशाहों और पूंजीपतियों की एक कमेटी बनाई। पुलिस ने मजदूरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पकड़ा, बर्बर ढंग से पीटा और 137 मजदूरों को हिरासत में लिया। 63 पर सीईओ की हत्या करने का आरोप लगाया गया। बाकियों पर बलवा करने और शांति भंग करने का आरोप लगाया गया। इस बार न्यायालय ने बड़ी मुस्तैदी से मजदूरों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। मजदूरों के साथ इंसानों जैसा बर्ताव करने का अनुरोध करने की हिमाकत करने के चलते तत्कालीन श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडीज को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा। गरीब मजदूरों के परिवार सड़क पर आ गए। मीडिया को न पहले उनकी चिंता थी न अब है।
यह केवल दो घटनाओं से संबंधित तथ्यों की एक संक्षिप्त प्रस्तुति है: निष्कर्ष निकालने का काम पाठक स्वयं करें।
ग्रेजियानों की घटना के बारे में अधिक विस्तार से जानने के लिए मेरी एक पुरानी पोस्ट देखें।
वस्तुगत यथार्थ की तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति का एक प्रयास.....क्योंकि यदि रूप ही अन्तर्वस्तु का द्योतक होता तो विज्ञान की ज़रूरत ही नहीं होती!
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Thursday, June 17, 2010
Wednesday, October 1, 2008
ग्रेजियानो की घटना
पूंजीवादी शोषण के खिलाफ मजदूरों में सुलगते आक्रोश से उठी एक चिंगारी!
मेहनतकश साथियो,
ग्रेटर नोएडा की ग्रेजियानो कंपनी में उठे मजदूर असंतोष की लपट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पूंजीवादी शोषण की चक्की में पिस रहे देश के करीब 50 करोड़ मजदूर हमेशा चुप नहीं बैठे रहेंगे। घटना के बाद देश के श्रम मंत्री तक को यह स्वीकारना पड़ा कि देश भर के मजदूरों में भीतर ही भीतर असंतोष सुलग रहा है। यह बात गौर करने लायक है कि देश के उद्योग संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद श्रम मंत्री को अपना थूका हुआ चाटना पड़ा और उसे अपने मालिकों से माफी मांगनी पड़ी। पूंजी की चाकर इन सरकारों और मंत्रियों से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है।
360 करोड़ रुपये का सालाना प्रोडक्शन देने वाले ग्रेजियानो के करीब 350 मजदूर एक साल से बपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इनमें से अधिकांश पिछले 7-8 वर्षों से कार्यरत थे। मुनाफे की हवस का शिकार कंपनी मैनेजमेंट सोच रहा था कि जब बाजार में 2000-2500 रुपये पर काम करने वाले लोगों की भरमार है तो फिर पुराने मजदूरों को 6000 रुपये मासिक वेतन क्यों दिया जाये? यही सोचकर पुराने मजदूरों को निकाला जाने लगा। मजदूरों ने इसके खिलाफ श्रम विभाग, कंपनी मैनेजमेंट, जिला प्रशासन, गृह मंत्री और इटली की सरकार तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन राजा भोज भला गंगू तेली की कहॉं सुनने वाले थे। मजदूरों की नामलेवा ट्रेड यूनियनों ने भी दलाली खाकर मालिकपरस्ती का नंगा प्रदर्शन किया।
इस तरह अपने हक की लड़ाई में मजदूर अलग-थलग पड़ गये। मौके का फायदा उठाते हुए कंपनी ने 22 सितंबर को समझौते के नाम पर मजदूरों से भविष्य में आंदोलन न करने और माफीनामा लिखने का दबाव बनाया। इंकार करने पर उन्हें कंपनी के गुण्डों ने पीटना शुरू कर दिया और इर लड़ाई में कंपनी का सीईओ मारा गया।
उसके बाद जो कुछ हुआ वह आम गरीबों और मजदूरों की पूंजीवादी न्याय और सुशासन की झूठी आस-उम्मीद को तार-तार कर देने के लिए काफी है। सैकड़ों मजदूरों को गिरु्फ्तार किया गया। देश के पूंजीपतियों, राजनीतिक पार्टियों, गली-कूचे के टटपूंजिये नेताओं और मीडिया एवं गद्दार ट्रेड यूनियन नेताओं ने मजदूरों को हत्यारा घोषित कर दिया। कहा गया चाहे जैसे भी हालात रहे हों मजदूरों को और बर्दाश्त करना चाहिए था। दुर्घटनावश हुई एक सीईओ की मौत पर इतना शोर मचाने वालों से यहॉं यह पूछा जाना चाहिए कि हर रोज काम के दौरान मरने वाले 6000 (पूरे विश्व में-ब्लागर) मजदूरों की मौत पर ये हमेशा क्यों खामोश रहते हैं?
देश के मजदूरों-मेहनतकशों को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि पूंजी (मालिकों) और श्रम (मजदूरों) के बीच की इस लड़ाई में पूंजीपति और उनकी मैनेजिंग कमेटी यानी सरकार, पुलिस, कानून और गद्दार ट्रेड यूनियनें मजदूरों के खिलाफ एकजुट हैं। ऐसे हालात का मुकाबला करने के लिए मजदूर वर्ग को चाहिए कि किस्म-किस्म के चुनावबाज नेताओं और दलाल ट्रेड यूनियनबाजों का पिछलग्गू बनना बंद कर दें। मजदूरों को चाहिए कि वह सभी गरीबों-मेहनतकशों के साथ पूंजीवाद विरोधी क्रान्तिकारी आंदोलन के साथ आकर खड़े हों। और शोषण की संपूर्ण व्यवस्था के खात्मे को अपने जीवन का लक्ष्य बना लें। केवल तभी यह उम्मीद की जा सकती है कि मजदूरों की आने वाली पीढि़यां खुली हवा में आजादी की सांस ले सकेंगी।
मेहनतकश साथियो,
ग्रेटर नोएडा की ग्रेजियानो कंपनी में उठे मजदूर असंतोष की लपट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पूंजीवादी शोषण की चक्की में पिस रहे देश के करीब 50 करोड़ मजदूर हमेशा चुप नहीं बैठे रहेंगे। घटना के बाद देश के श्रम मंत्री तक को यह स्वीकारना पड़ा कि देश भर के मजदूरों में भीतर ही भीतर असंतोष सुलग रहा है। यह बात गौर करने लायक है कि देश के उद्योग संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद श्रम मंत्री को अपना थूका हुआ चाटना पड़ा और उसे अपने मालिकों से माफी मांगनी पड़ी। पूंजी की चाकर इन सरकारों और मंत्रियों से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है।
360 करोड़ रुपये का सालाना प्रोडक्शन देने वाले ग्रेजियानो के करीब 350 मजदूर एक साल से बपने हकों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इनमें से अधिकांश पिछले 7-8 वर्षों से कार्यरत थे। मुनाफे की हवस का शिकार कंपनी मैनेजमेंट सोच रहा था कि जब बाजार में 2000-2500 रुपये पर काम करने वाले लोगों की भरमार है तो फिर पुराने मजदूरों को 6000 रुपये मासिक वेतन क्यों दिया जाये? यही सोचकर पुराने मजदूरों को निकाला जाने लगा। मजदूरों ने इसके खिलाफ श्रम विभाग, कंपनी मैनेजमेंट, जिला प्रशासन, गृह मंत्री और इटली की सरकार तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन राजा भोज भला गंगू तेली की कहॉं सुनने वाले थे। मजदूरों की नामलेवा ट्रेड यूनियनों ने भी दलाली खाकर मालिकपरस्ती का नंगा प्रदर्शन किया।
इस तरह अपने हक की लड़ाई में मजदूर अलग-थलग पड़ गये। मौके का फायदा उठाते हुए कंपनी ने 22 सितंबर को समझौते के नाम पर मजदूरों से भविष्य में आंदोलन न करने और माफीनामा लिखने का दबाव बनाया। इंकार करने पर उन्हें कंपनी के गुण्डों ने पीटना शुरू कर दिया और इर लड़ाई में कंपनी का सीईओ मारा गया।
उसके बाद जो कुछ हुआ वह आम गरीबों और मजदूरों की पूंजीवादी न्याय और सुशासन की झूठी आस-उम्मीद को तार-तार कर देने के लिए काफी है। सैकड़ों मजदूरों को गिरु्फ्तार किया गया। देश के पूंजीपतियों, राजनीतिक पार्टियों, गली-कूचे के टटपूंजिये नेताओं और मीडिया एवं गद्दार ट्रेड यूनियन नेताओं ने मजदूरों को हत्यारा घोषित कर दिया। कहा गया चाहे जैसे भी हालात रहे हों मजदूरों को और बर्दाश्त करना चाहिए था। दुर्घटनावश हुई एक सीईओ की मौत पर इतना शोर मचाने वालों से यहॉं यह पूछा जाना चाहिए कि हर रोज काम के दौरान मरने वाले 6000 (पूरे विश्व में-ब्लागर) मजदूरों की मौत पर ये हमेशा क्यों खामोश रहते हैं?
देश के मजदूरों-मेहनतकशों को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि पूंजी (मालिकों) और श्रम (मजदूरों) के बीच की इस लड़ाई में पूंजीपति और उनकी मैनेजिंग कमेटी यानी सरकार, पुलिस, कानून और गद्दार ट्रेड यूनियनें मजदूरों के खिलाफ एकजुट हैं। ऐसे हालात का मुकाबला करने के लिए मजदूर वर्ग को चाहिए कि किस्म-किस्म के चुनावबाज नेताओं और दलाल ट्रेड यूनियनबाजों का पिछलग्गू बनना बंद कर दें। मजदूरों को चाहिए कि वह सभी गरीबों-मेहनतकशों के साथ पूंजीवाद विरोधी क्रान्तिकारी आंदोलन के साथ आकर खड़े हों। और शोषण की संपूर्ण व्यवस्था के खात्मे को अपने जीवन का लक्ष्य बना लें। केवल तभी यह उम्मीद की जा सकती है कि मजदूरों की आने वाली पीढि़यां खुली हवा में आजादी की सांस ले सकेंगी।
अंधकार का युग बीतेगा, जो लड़ेगा वो जीतेगा!
बिगुल मजदूर दस्ता
नोएडा : 9891993332,
दिल्ली : 011-65976788
*** मजदूरों के क्रान्तिकारी संगठन बिगुल मजदूर दस्ता द्वारा ग्रेजियानो की घटना पर निकाला गया एक पर्चा।
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