Monday, July 13, 2009

मीडिया में आई गिरावट पर मीडिया वालों की चिंता का सार क्‍या है...।

आजकल मीडिया में स्‍वयं मीडिया की आलोचना छायी हुई है। मीडिया के गिरते स्‍तर पर मीडिया से जुड़े तमाम लोग विचार-विमर्श कर रहे हैं। सरकार भी मीडिया पर नियंत्रण लगाने के मूड मे दीख रही है और अगर सरकार जल्‍दी करती नहीं दीख रही है तो इसका बस एक ही कारण है कि अपनी तमाम गिरावट के बावजूद मीडिया सरकार के लिए उपयोगी ही साबित हो रहा है, वह स्‍वयं अपने तईं वह सारे काम कर रहा है जो वर्तमान दौर में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के लिहाज से प्रासंगिक है। मोटा-मोटी यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया का जिस हद तक पतन होता जाएगा उस हद तक वह आम जनता के लिए नुकसानदेह और सरकार के लिए फायदेमंद होता जाएगा।

यहीं यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर मीडिया के पतन पर इतना शोर क्‍यों।

इस प्रश्‍न का जवाब एक दूसरे प्रश्‍न के जवाब में निहित है कि मीडिया के पतन पर चिन्‍ता व्‍यक्‍त करने वाले लोग कौन हैं और उनकी चिन्‍ता का सार क्‍या है।

व्‍यक्तियों से पहले विचारों की बात करना सही तरीका होगा क्‍योंकि अं‍तत: व्‍यक्तियों का महत्‍व उनके नामों से नहीं बल्कि उनके विचारों से ही तय होता है और विचारहीन मनुष्‍य जैसी कोई चीज नहीं होती।

मीडिया के पतन पर स्‍यापा करने वाले ज्‍यादातर लोग स्‍वयं मीडिया की इस पतनकथा के प्रत्‍यक्षदर्शी रहे हैं। यह कहना भी अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि इन तमाम प्रत्‍यक्षदर्शियों में से ज्‍यादातर मीडिया में आई इस गिरावट के हमसफर रहे हैं, कुछ इस गिरावट के लिए जिम्‍मेदार रहे हैं तो कुछ मूकदर्शक और कुछ अन्‍य इसके लाभार्थी रहे हैं।

आज वे मीडिया में आई गिरावट पर आश्‍चर्यव्‍यक्‍त कर रहे हैं तो यह अपने आप में एक आश्‍चर्य की बात है क्‍योंकि मीडिया में मूल्‍यों का ह्रास किसी दुर्घटना का दुष्‍परिणाम नहीं बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है जो लगातार उनकी आंखों के सामने घटती रही है।

आज मीडिया के जनपक्षधर न रह जाने की बात की जाती है पर इस बिन्‍दु पर विचार पर विचार नहीं किया जाता कि मीडिया अपने आप में कोई चिंतनशील प्राणी नहीं है। वह कितना जनपक्षधर है यह इस बात से तय होता है कि मीडिया से जुड़े लोग कितने जनपक्षधर रह गये हैं। मीडिया समाज से इतर कोई चीज नहीं है। वह समाज को प्रभावित भी करता है और समाज से प्रभावित भी होता है। समाज में जिन मूल्‍यों का बोलबाला होगा, समाज में जिन विचारों, लोगों और व्‍यवस्‍थाओं का प्रभुत्‍व होगा उसी की छाप उस समय के मीडिया पर रहेगी। आज मीडिया की चर्चा एक स्‍वायत्त स्‍वतंत्र निकाय के रूप मे की जा रही है, अन्‍य सामाजिक शक्तियों के साथ उसके अंतरसंबंधों का विश्‍लेषण नहीं किया जाता।

मीडिया की वर्तमान हालत पर चिंता व्‍यक्‍त करने वाले लेखों का विश्‍लेषण सतही, पूरा सत्‍य नहीं बल्कि सत्‍यांश, अपने को किनारे रखकर किया गया और ऐतिहासिक समझ के अभाव से परिपूर्ण नजर आता है।

आज के मीडिया को आज के विशिष्‍ट ऐतिहासिक दौर से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब समाज में ही प्रगति पर प्रतिक्रिया हावी है, और आज जब ज्‍यादा नहीं बल्कि 60 साल पहले के राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता आंदोलन के दौर के मूल्‍य भी क्षरित हो गये हैं तो हम गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद और राधा मोहन गोकुलजी जैसे पत्रकारों की उम्‍मीद कैसे कर सकते हैं।

आज के मीडिया के स्‍वामित्‍व के स्‍वरूप, उसके उत्‍पादन के स्‍वरूप और उसका उत्‍पादन करने वाले लोग तथा उसके उपभोग के स्‍वरूप पर विचार करने के बाद और मीडिया मालिकों और मीडियाकर्मियों और मीडियाकर्मियों और आम लोगों के बीच के संबंधों पर विचार करने के बाद यह समझने के लिए बहुत अक्‍ल की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि आज का मीडिया ऐसा ही हो सकता है।

सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं का स्‍वरूप बहुत हद तक इस बात से तय होता है कि समाज के प्रभावशाली तबकों के हितों के अनुसार चीजें कैसी होनी चाहिए।

असली मुद्दों के बजाय गौड़ मुद्दों की तरफ लोगों का ध्‍यान भटकाना, लोगों को अतार्किक और अवैज्ञानिक बनाना, विचारों के बजाय वस्‍तुओं और विश्‍लेषण की दृष्टि देने के बजाय तथ्‍यों पर जोर देना, पहलकदमी संगठित करने के बजाय लोगों को निष्क्रिय श्रोता बनाना क्‍या ये ही वे चीजें नहीं हैं जो किसी भी दौर के शासक वर्ग की जरूरत होती हैं। लोग अपनी दाल-रोटी के बजाय राखी सावंत के स्‍वयंवर में ज्‍यादा दिलचस्‍पी लें क्‍या आज के मालिक वर्ग की इसके अलावा कोई और चाहत हो सकती है। और क्‍या आज का मीडिया बिल्‍कुल यही काम नहीं कर रहा है। और क्‍या नामी-गिरामी मीडिया वालों को लाखों का पैकेज और अन्‍य सुख-सुविधाएं यही काम करने के लिए नहीं दी जा रही हैं।

खैर मैं जिस मुद्दे की तरफ फिलहाल आना चाहता हूं वह यह है कि मीडिया की हालत पर स्‍यापा करने वालों या यहां तक कि उसकी आलोचना करने वालों की चिंता/आलोचना का सार क्‍या है।

हमारे चिंतकों और सरकार की मुख्‍य चिंता यह है कि जिस तेजी से मीडिया अपने रसातल की ओर जाता रहा है उससे कहीं उसकी विश्‍वसनीयता ही संदेह के घेरे में न आ जाए क्‍योंकि यदि ऐसा हो गया तो जनमानस पर अपने विचारों का प्रभाव कैसे डाला जा सकेगा। एक मायने में यह‍ चिंता सही भी है क्‍योंकि आजकल मीडिया में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है वह बुर्जुआ मानदंडों से भी बेहद घटिया स्‍तर का है। अखबारों के संपादकीय पृष्‍ठों की सामग्री का स्‍तर बेहद गिर गया है और पूरा लेख पढ़ने के बाद उसमें से कोई काम की बात कोई तार्किक समझदारी या विश्‍लेषण ढूंढ पाना मुश्किल होता है। कुछ स्‍वनामधन्‍य प्रतिष्ठित स्‍तंभकार अपनी चवन्‍नी चलाए जा रहे हैं। ज्‍यादातर लेखों का कोई आपरेटिव पार्ट ही नहीं होता है और यह समझना मुश्किल होता है कि लेख लिखा ही क्‍यों गया था। लगता है कि हमारे माननीय पत्रकारों, विचारकों ने सोचना-समझना, चिंतन करना और यहां तक कि पढ़ना-लिखना भी बंद कर दिया है। दो-चार डेटा, पुरानी पढ़ाई से हासिल दो-चार तर्क, दो-चार शब्‍दों की बाजीगरी और हो गया लेख तैयार। न्‍यूज और विज्ञापन का फर्क मिटता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महिमागान करने वाला मीडिया यह नहीं बताता कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिल जाना ही पूरा जनवाद नहीं होता। आज का मीडिया कहीं एकदम साफ झूठ बोल रहा है तो कहीं सत्‍यांश, कहीं वह जितना कहता है उससे कहीं ज्‍यादा छुपाता है तो कहीं वह निष्‍पक्षता की आड़ में स्‍पष्‍टत: जनविरोधी और प्रतिक्रियावादी प्रचार का माध्‍यम बना हुआ है।

मीडिया की दुर्गति पर चिंतित ज्‍यादतर विचारकों की चिंता उसके जनपक्षधर चरित्र की नहीं बल्कि उसकी स्‍तरहीन सामग्री को लेकर है। लेकिन मीडिया की बीमार हालत का उनका रोग-निदान जितना सतही और आंशिक है उनकी सलाह उतनी ही निष्‍प्रभावी है। कुल मिलाकर उनकी बातों का सार यह है कि मीडिया की विभिन्‍न भूमिकाओं के बीच संतुलन स्‍थापित किया जाए, कुछ कुछ सुधार करके चीजों को ठीक कर लिया जाए, न्‍यूज और विज्ञापन के बीच संतुलन बनाया जाए और मुनाफे के उद्यम के साथ-साथ मीडिया की विश्‍वसनीयता पर आंच भी न आने दी जाए। पूंजीपतियों के स्‍वामित्‍व वाले मीडिया के विकल्‍प का कोई खाका उनके पास नहीं है। उनकी गरमा-गरम आलोचना में किसी सार्थक पहल की दिशा नहीं है नौजवान मीडियाकर्मियों को वे इसी प्रणाली में फिट हो जाने के अलावा कोई दूसर मार्ग नहीं दिखा सकते। आखिर इसी मीडिया ने उन्‍हें शोहरत और सहूलियतें दी हैं इसलिए इसके स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता तो उन्‍हें होती ही है, यह दीगर बात है कि इसका इलाज करने में वे असमर्थ हैं।

Sunday, April 12, 2009

सवर्ण मानसिकता से ग्रस्‍त दलित चेतना - भाग II

यह समझने के लिए बहुत अक्‍ल की जरूरत नहीं है कि आज के युग में जाति व्‍यवस्‍था की कोई आवश्‍यकता नहीं है। जाति व्‍यवस्‍था के जिस शुद्धतम प्राचीन रूप की बात की जाती है वह भी आज के समय में लागू नहीं हो सकती है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जाति व्‍यवस्‍था की उपयोगिता कब की समाप्‍त हो चुकी है। लेकिन इतिहास निर्माण में बल की भूमिका का सिद्धान्‍त बताता है कि कोई चीज चाहे कितनी ही जर्जर क्‍यों न हो जाए वह तब तक नष्‍ट नहीं होगी जब तक कि उसपर बाहर से बल आरोपित न किया जाए। जाति व्‍यवस्‍था के संदर्भ में आज हम ऐसे ही मुकाम पर खड़े हैं।
हर चीज को विद्यमान है उसके होने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्‍य है और वह कारण उस चीज को सार्थकता प्रदान करता है, लेकिन समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है और उसे नष्‍ट कर देने के कारण भी उत्‍पन्‍न होने लगते हैं। जाति प्रथा आजतक मौजूद है तो इसके पीछे भी कारण हैं।
पूरा का पूरा सामन्‍ती समाज शूद्रों और दलितों के श्रम पर आश्रित था। अपने विशेषाधिकारों को बनाए रखने और अपने उत्तराधिकारियों का भविष्‍य सुनिश्चित करने के लिए जरूरी था कि शासक वर्ग (अगड़ी जातियां) कठोर जातिगत नियम और कानून बनाएं। उस दौर में सत्ता और धर्म दो प्रमुख हथियार थे जिनका उपयोग निचली जातियों के सदियों से अनपढ़ लोगों का शोषण-उत्‍पीड़न करने के लिए किया जाता था।
जाति व्‍यवस्‍था का आज भी इसी उद्देश्‍य पूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज न सिर्फ उच्‍च जातियों के सत्ताधारी बल्कि दलित जातियों के सत्ताधारी भी सत्ता हासिल करने और उसे बचाए रखने के लिए जाति प्रथा का उपयोग कर रहे हैं। अगर जाति प्रथा वास्‍तव में समाप्‍त हो गयी तो वे सत्ता कैसे हासिल करेंगे।
पूंजीवाद अपने साथ आधुनिक विचार लेकर आता है। वह लोगों में स्‍वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्‍व के विचार डालता है। तर्क और खुले दिमाग से सोचने को प्रोत्‍साहित करता है। लेकिन यह उसी दौर में होता है जिस दौर तक पूंजीवाद की भूमिका क्रान्तिकारी होती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब पूंजीवाद अपने स्‍वघोषित उद्देश्‍यों से ही पीछे हट जाता है। स्‍वतंत्रता का मतलब सिर्फ खरीदने बेचने की स्‍वतंत्रता होती है, समानता सिर्फ पूंजीपतियों के लिए होती है और भाईचारा सिर्फ मुनाफे के आधार पर बनता है। जब तक फायदा हो तब तक भाई-भाई और अगर फायदा न हो तो मार-कुटाई। अपने प्रगतिविरोधी रूप में पूंजीवाद अतीत की उन सभी प्रथाओं को गोद ले लेता है जो भले ही आज के लिए उपयोगी न हों लेकिन जिससे उसका हित सधता हो। ऐसा ही कुछ जाति प्रथा के साथ भी हुआ। लोगों को बांटने और अपना उल्‍लू सीधा करने में जाति प्रथा और इस तरह की अन्‍य चीजें जैसे कि धर्म, नस्‍ल, राष्‍ट्रीयता ऐसे अचूक हथियारों का काम करते हैं कि शासक वर्ग कभी नहीं चाहेगा कि वे पूरी तरह समाप्‍त हों।
ऐसे में दलित जातियों के कुछ आगे बढ़ आए लोगों को भी इसी में अपना फायदा दिखाई देता है। जैसे ही वे थोड़ा पढ़-लिख लेते हैं या पैसा कमा लेते हैं जो वे जल्‍दी से जल्‍दी उच्‍च जातियों में जगह प्राप्‍त करने को बेचैन हो जाते हैं। इसलिए वे जातियों को पूरी तरह समाप्‍त करने के बजाय आरक्षण जैसी मांगें करते हैं। वे यह कोशिश नहीं करते कि सदियों से हीन भावना से ग्रस्‍त अपने बिरादर भाइयों को सम्‍मान के साथ जीना और संघर्ष करना सिखाएं। बल्कि इधर-उधर के कुछ मुद्दे उठाकर वे इस पूरी लड़ाई को ही मुद्दे से भटका देते हैं।
जाति प्रथा कोई ऐसी समस्‍या नहीं है जिसे संसद में बहुमत पाकर, आरक्षण लागू करके या नियम-कानून बनाकर समाप्‍त किया जा सके। यह मनुष्‍य की गरिमा की लड़ाई है। यह समाज में मानव श्रम को उसका उचित स्‍थान दिलाने की लड़ाई है। यह इस तथ्‍य को स्‍थापित करने की लड़ाई है कि श्रम वास्‍तव में मनुष्‍य का नैसर्गिक गुण है। और श्रम किए बिना मनुष्‍य मनुष्‍य रह ही नहीं सकता है। यह निजी संपत्ति पर आधारित एक सदियों पुरानी बुराई का नाश करने की लड़ाई है। चूंकि आज के मजदूर वर्ग में दलित जातियों के ही लोग सबसे अधिक हैं इसलिए मजदूरों के हकों की कोई भी लड़ाई वास्‍तव में दलित जातियों के लोगों की बहुसंख्‍या के हित की लड़ाई है। आरक्षण जैसी चीजों के बजाय मजदूर आन्‍दोलन से ही दलित जातियों का सबसे बड़ा और सबसे निचला तबका अपना उद्धार कर सकता है। इसलिए मार्क्‍स के सिद्धान्‍तों की अनदेखी करके दलित प्रश्‍न का कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है।

Thursday, March 26, 2009

सवर्ण मानसिकता से ग्रस्‍त दलित चेतना

हाल ही में 'आज समाज' अखबार में छपी एक छोटी सी खबर का जिक्र करना चाहता हूं। अखबार की खबर के अनुसार फोरम आफ एकेडमिक्स फार सोशल जस्टिस की ओर से दिल्ली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्री हरबंस नाम के एक वक्ता ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होने के कारण राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित रंगनायकम्मा की पुस्तक '''जाति' प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं' पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। श्री हरबंस ने और क्या कहा इसकी अखबार में कोई चर्चा नहीं है और फिलहाल मैं उसपर कोई टिप्पणी भी नहीं कर रहा हूं, मैं सिर्फ जातिसूचक शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति के पीछे काम करने वाली मानसिकता पर कुछ बातें करना चाहता हूं।
सबसे पहले तो मैं ऐसा आरोप लगाने वाले सम्मानित बुद्धिजीवी से पूछना चाहता हूं कि क्या जाति प्रश्न पर कोई किताब जातियों का नाम लिए बिना लि‍खी जा सकती है। क्या बुद्ध और अंबेडकर ने खास जाति के लोगों को संबोधित करने के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। मान लीजिये कि किसी तथाकथित निम्‍न जाति (यहां यह स्पष्टत कर दें कि न तो रंगनायकम्मा और न ही ब्लागर उन्हें निम्न मानता है, ऐतिहासिक कारणों से मुझे ऐसी शब्दावली का प्रयोग करना पड़ रहा है) के लोगों का एक संगठन है, तो यदि उससे पूछा जाए कि आप कौन हैं तो क्या इसका जवाब यह होना चाहिए कि हम ऐसी जाति के लोगों का संगठन हैं जिसका नाम लेने से हमपर और आपपर जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का आरोप लग सकता है।
और संविधान किस तरह जातियों को आरक्षण देता है। क्या वह जातियों का नाम लिए बिना और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किए बिना आरक्षण की बात करता है। और जो लोग आरक्षण का लाभ प्राप्त‍ करते हैं क्या उनके प्रमाणपत्र पर जाति का उल्लेख नहीं होता है। अगर जातिसूचक शब्दों के प्रयोग के आधार पर प्रतिबंध लगाया जाए तो तमाम धार्मिक ग्रंथ जिनमें बौद्ध ग्रंथ भी शामिल हैं उनपर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा क्योंकि उनमें तो अनेकों बार तमाम ऊंची-नीची जातियों का उल्लेख आता है।
असल में मामला यह है कि ऐसी मांग करने वाले हमारे बुद्धिजीवी जातियों के संबंध में स्वयं ही उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं जिसका वे दूसरों पर आरोप लगाते हैं। आखिर रंगनाकम्मा ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किसी जाति विशेष को गाली देने के लिए तो किया नहीं है, बल्कि उनके समर्थन में किया है। वे तो यहां तक कहती हैं कि किसी ''निचली'' जाति का होना अपमान का नहीं बल्कि सम्मान की बात है क्योंकि इन जातियों के लोग दूसरों का शोषण करके नहीं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर जीते हैं। लेकिन हमारे बुद्धिजीवी ऐसा नहीं सोचते। वे यह नहीं सोचते कि जबतक समाज में किसी काम को छोटा और किसी काम को बड़ा समझने की मानसिकता बनी रहेगी और इस आधार पर लोगों में सामाजिक विभाजन बने रहेंगे तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी खास वर्ग को संबोधित करने के लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जब तक विभाजन रहेगा उस विभाजन को व्यक्त करने वाले शब्द भी रहेंगे ही रहेंगे, इसे किसी ताकत या कानून से रोका नहीं जा सकता। आज के शब्द कल न रहें तो भी वह काम और उस काम को करने वाले लोग तो रहेंगे ही। और उनको पुकारने के लिए किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा।
सच्चाई यह है कि जिन्हे ''निचली'' जातियां कहा जाता है वे ज्यादातर वे जातियां हैं जो शारीरिक श्रम करती हैं जिनके श्रम के बिना पूरा का पूरा समाज एक दिन भी चल नहीं सकता। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इन जातियों को अपने पर फख्र महससू करना चाहिए। लेकिन चूंकि समाज पर बौद्धिक श्रम (वास्तव में निठल्लापन) करने वालों का प्रभुत्व रहा है इसलिए वे इस तरह के शारीरिक काम को हेय समझते हैं, और स्वयं करना तो दूर जो करते हैं उन्हें नीची नजर से देखते हैं। ऐसे में जिन शब्दों के साथ अपने को जोड़कर किसी इंसान को सम्मांनित महससू करना चाहिए उन शब्दों के प्रयोग पर हमारे बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं। क्या इससे यह निष्किर्ष नहीं निकलता कि हमारे सम्मानित बुद्धिजीवी भी श्रम के संदर्भ में उसी सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हैं।
दलित बुद्धिजीवियों और अन्य पढ़े-लिखे दलितों के साथ एक समस्या तो यह भी है कि वे अपनी जाति को लेकर स्व्यं ही हीन भावना के शिकार रहते हैं। अपनी जाति के लोगों को अपने पेशे पर सम्मानित महसूस करने के लिए प्रोत्सांहित करने के बजाय उनकी मंशा बस इतनी होती है कि बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग का हो जाने के बाद उन्हें उनकी जाति से जोड़कर न देखा जाए। अपने बराबर की हैसियत वाले समाज में (धन पर आधारित बराबरी) उन्हें अगड़ी जातियों के बराबर का समझा जाए। दलित पूंजीवाद की वकालत करने वाले लोगों का भी यही अप्रोच है कि दलितों में ही कुछ अमीर और गरीब दलित हो जाएं। तो यह प्रश्न भी उठता है कि दलित जातियों के अमीर उन दलितों को क्या हेय नहीं समझेंगे जो अपने पुराने पेशे में ही रह जाएंगे। क्या कोई अमीर दलित किसी गरीब दलित के परिवार के साथ वैवाहिक संबंध बनाना चाहेगा। और अगर इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो क्या इससे सिद्ध नहीं हो जाता कि आज की परिस्थिति में जाति प्रश्न का समाधान संपत्ति के प्रश्न को हल किए बिना नहीं किया जा सकता। और इसी से क्या यह सहज निष्कर्ष भी नहीं निकलता है कि जाति प्रश्‍न के समाधान के लिए मार्क्स‍ जरूरी हैं।
मजेदार बात तो यह है कि जहां जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर इतना हो हल्ला मचता है उस देश में तमाम सरकारी कागजों पर जाति का कॉलम बना होता है। जिनमें बहुत से सरकारी कागज तो ऐसे होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की जाति पूछने का कोई औचित्य ही नहीं होता। जैसे कि किराए पर मकान लेते समय पुलिस वेरिफिकेशन के लिए प्रयोग किया जाने वाला कागज।

अगली पोस्ट में मैं इस बात पर फोकस करूंगा कि आज समाज में पेशे के आधार पर जाति विभाजन का कोई औचित्य नहीं रह गया है, क्योंकि चाहे निम्न जाति का लड़का हो या उच्च जाति का अगर वह गरीब है तो वह शहर आकर फैक्ट्री में काम करेगा अपने पुरखों का पेशा तो करेगा नहीं। इसलिए तर्कसंगत ढंग से देखें तो पेशे पर आधारित जातियों के विभाजन की व्यावस्था पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के साथ फिट नहीं होती। लेकिन फिर भी ऐसा है, तो इसके क्या कारण हैं। वे कौन हैं जिनका हित जाति व्यीवस्था को बनाए रखने में है या कहें कि जाति व्यणवस्था किनका हित साधन करती है।

Monday, February 16, 2009

सत्‍यम का घोटाला और नैति‍कता की दुहाई।

सत्‍यम कंपनी का घोटाला जगजाहिर होने के बाद सरकार से लेकर नियामक एजेंसियों और मीडिया तक सब के सब रामालिंगा राजू पर टूट पड़े। कल तब जिसे इंक्रेडिबल इंडिया का स्‍टार आइकॉन बताया जा रहा था उसे अचानक बदनामी के गर्त में गिरा दिया गया। सत्‍यम के घोटाले को एक असाधारण घटना करार दिया गया और राजू के कृत्‍य का अनैतिकता की श्रेणी में डाल दिया गया।

प्रश्‍न यहीं खड़ा होता है। रामालिंगा राजू ने जो किया वह अनैतिक कैसे हो सकता है। और रामालिंगा राजू न ऐसा क्‍या किया जो उनके जैसे बाकी लोग नहीं करते या अपनी औकात के मुताबिक जिन्‍हें मौका मिलता है वह नहीं करते। नैतिकता की दुहाई तो तब दी जा सकती है जब नैतिकता और अनैतिकता में कोई गुणात्‍मक भेद हो।

अगर रामालिंगा राजू पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने बही-खातों में हेर फेर की तो पूछा जा सकता है कि उसने कौन सा बड़ा गुनाह कर दिया। कौन पूंजीपति, व्‍यवसायी, दूकानदार, बही-खातों में हेर फेर नहीं करता। छोटे से छोटे दूकानदार से लेकर बड़े से बड़े उद्योगपति तक कौन टैक्‍स बचाने के लिए झूठे खर्च और हिसाब किताब में गड़बड़ी नहीं करता। अगर छोटा दूकानदार दाल और चावल में मिलावट करता है तो बड़ा पूंजीपति घटिया उत्‍पाद बनाकर मुनाफा कमाता है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्‍यम जैसी बड़ी बड़ी साफ्टवेयर कंपनियों के मुनाफे का राज़ है उनके कर्मचारियों का भयंकर शोषण और उनकी मेहनत की लूट। सॉफ्टवेयर कंपनियों में 10-12 घंटे काम को सामान्‍य समझा जाता है और पगार 8 घंटे की दी जाती है। इन कंपनियों में कहा जाता है कि आने का समय तो तय है लेकिन जाने का समय मैनेजर और काम के अनुसार तय होता है। ओवरटाइम का कोई झंझट ये कं‍पनियां नहीं पालतीं बस आपको चाय कॉफी मिलती रहती है। चूंकि ये कंपनियां विदेशी ग्राहकों की सेवा करती हैं इसलिए मुद्रा में अंतर के कारण इन्‍हें भारी मुनाफा होता है और अपने कर्मचारियों को बाकी उद्योगों की तुलना में बेहतर पगार देने के बाद भी इनका मुनाफा जबरदस्‍त होता है। साफ्टवेयर और कॉल सेंटर में काम करने वालों की जिंदगी कोल्‍हू के बैल के जैसी होती है। जिंदगी और बाहरी दुनिया से कटे ये नौजवान बहुत कम उम्र में ही अलगाव, डिप्रेशन और अन्‍य मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।

यह सब कुछ सामान्‍य माना जाता है और अनैतिक नहीं समझा जाता। राजू भी जब यह सब कर रहा था तब उसे अनैतिक नहीं समझा गया। राजू की गलती बस यही रही कि वह अपनी सीमा से बाहर चला गया और नियंत्रण खो बैठा। पर जो खुद ही अनैतिक हैं, जो खुद ही ये सारे गलत धंधे करते हैं वे राजू को किस आधार पर अनैतिक कह रहे हैं। क्‍या हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष, फिक्‍की और एस्‍सोचैम के लोग जो राजू को अनैतिक कह रहे हैं वे यह मानते हैं कि बाकी सभी दूध के धुले हैं। वास्‍तव में सबकी सच्‍चाई सभी जानते हैं लेकिन आपसी समझदारी के नाते कोई मुंह नहीं खोलता जब तक कि समस्‍या इस हद तक न बढ़ जाए कि उसे छुपाए रख पाना संभव ही न हो सके।

असल में पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में नैतिकता और अनैतिकता का कोई भेद नहीं होता। जो चीज मुनाफा दे वह नैतिक होती है। यहां लूट, डकैती, भ्रष्‍टाचार सब जायज है। और यह अपने दायरे में सभी को समेट लेती है। हर छोटे बड़े व्‍यवसायी को ईमान धर्म बेचकर बस मुनाफा कमाना होता है। इसलिए चूंकि हमाम में सभी नंगे होते हैं और एकदूसरे की असलियत से वाकिफ होते हैं कोई दूसरे पर उंगली नहीं उठाता। जब पानी सर से गुजरने लगता है तब किसी न किसी को बलि का बकरा बनना पड़ता है ताकि लोगों का भरोसा इस व्‍यवस्‍था में बनाए रखा जा सके। राजू के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का बस यही मतलब है कि निवेशकों का विश्‍वास भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था से टूट न जाए। सिर्फ एक राजू की वजह से लूट के इस पूरे कारोबार पर ही खतरा न मंडराने लगे। हमारे देश को चलाने वाले पूंजीपतियों और उनकी सरकार की बस यही मंशा है। नैतिकता और ईमान धर्म से तो खुद उनका दूर दूर तक का कोई वास्‍ता नहीं है।

Monday, January 26, 2009

आधी अधूरी आजादी, लूला लंगड़ा गणतंत्र।

ये कैसी आजादी है, ये किसकी आजादी है

जनता के हिस्‍से में केवल लूट और बर्बादी है।

जनवरी 1950 को आज के दिन हमारे महान देश का महान संविधान लागू हुआ। इस संविधान की महानता यह थी कि इसे देश देश के महज 15 प्रतिशत मध्‍यवर्ग, उच्‍च मध्‍यवर्ग, अंग्रेज परस्‍त जगीरदारों, जमींदारों, नवाबों, राजाओं और व्‍यापारियों के प्रतिनिधियों ने मिलकर बनाया था। उससे भी ज्‍यादा तारीफ की बात यह थी कि दुनिया भर के संविधानों से से जोड़-जुगाड़कर तैयार किया गया यह संविधान मूलत: उन्‍हीं नियमों-कानूनों पर आधारित था जो अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे थे। कल तक अंग्रेजों की चापलूसी करते आ रहे कायर-नपुंसक राजे-रजवाड़े, क्रान्तिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही देने वाले गद्दार, जनता पर जुल्‍म करने वाले जमींदार और जागीरदार और अपने ही लोगों पर लाठी-गोली बरसाने वाली पुलिस और सेना सब पहले की तरह शासन करते रहे। लेकिन बात इतनी ही नहीं थी, हमारे महान देश की महानता तो यह थी कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर करने वाले क्रान्तिकारियों पर देश की आजादी के बाद भी कई वर्षों तक मुकदमें चलाए जाते रहे। शान्ति के दूत महात्‍मा गॉंधी को भी इस बात से कोई ऐतराज नहीं था।

यह आजादी मुट्ठी भर धनिकों की

लड़कर हासिल करनी होगी सही आजादी श्रमिकों की।

जैसा कि भगतसिंह ने कहा था आजादी के बाद गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों का शासन आ गया और जनता की बुनियादी हालत में कोई बदलाव नहीं हुआ। लूट, शोषण, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई, भूख, कुपोषण आजादी के ये तोहफे जनता की झोली में आ गिरे। आजादी के बाद कई वर्षों तक अपने ही देश की फौज अपने ही देश के किसानों और मजदूरों का खून बहाती रही। तेभागा-तेलंगाना, पुनप्रा-वायलार, मलाबार तक किसानों, मजदूरों का खून बहाने में नेहरू और पटेल की सरकार अंग्रेजों से पीछे नहीं रही। सार्विक मताधिकार का झुनझुना थमा दिया गया पर लोगों की चेतना उन्‍नत करने का कोई प्रयास नहीं किया गया जिसके कारण यह झुनझुना आज तक एक झुनझुना ही बना रह गया। ज्‍यों ज्‍यों भारतीय शासक वर्ग का जनविरोधी और पूंजीपरस्‍त चरित्र उजागर होता गया समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्‍यों का उसी तेजी से ह्रास होता गया। आजादी की लड़ाई के दौर में जो भी प्रगतिशील संस्‍कार और संस्‍थाएं खड़ी की गई थीं, पूंजी और बाजार ने उन्‍हें इस तरह पतित और भ्रष्‍ट कर दिया कि आज सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्‍त से लोगों को हैरानी तक नहीं होती है। बल्कि हैरानी तो इस बात पर होती है कि इसके बावजूद सबकुछ चल रहा है। वैसे इसके पीछे भी कोई रहस्‍य नहीं है क्‍योंकि अगर भले ही घिसते-पिटते लेकिन अगर सबकुछ चलेगा नहीं तो आखिर लूटेंगे क्‍या। यह सबकुछ चलाते रहना भी लुटेरों की एक मजबूरी है।

मजेदार बात तो यह भी है कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने वालों को विदेशी पूंजी से कोई ऐतराज नहीं है उल्‍टा वे तो विदेशी राज का बखान भी करते हैं और कहते हैं कि सरकार आप तो बहुत अच्‍छे थे आप चले क्‍यों गए, वापस चले आइए, अपनी पूंजी के टुकड़े हमारी तरफ उछालिए, हमें गुलामी की ऐसी आदत पड़ गई है कि हम अपनी मां को भी अंग्रेजी संबोधन से पुकारते हैं। हमारे देश की अरबों करोड़ों जनता अपने खून पसीने से आपको मालामाल कर देने को लालायित है.....प्‍लीज आइए और हमें लूटिए।

जिस विदेशी गुंडे के ऊपर उसके देश के और दुनिया भर के लोग थूकते और जूता मारते हैं हमारे देश का प्रधानमंत्री कहता है कि भारतीय उसे प्‍यार करते हैं।

राष्‍ट्रीय गर्व और राष्‍ट्रीय भावना का आलम यह है कि आज के महान दिन जिस इंडिया गेट पर देश के गौरव का बखान किया जाता है वह देश की आजादी के लिए मरने वाले सेनानियों का नहीं बल्कि अंग्रेजों की भाड़े की नौकरी करने वाले सैनिकों की याद में बनाया गया है।

हमारे महान देश की महान सभ्‍यता और संस्‍कृति के स्‍तुतिगान में महापुराण लिखे जा सकते हैं। हमें दो चार श्‍लोकों और छंदों के अलावा भले कुछ न आए लेकिन हम अपने को दुनिया का गुरु कहते हैं। हमारी दो तिहाई आबादी भूखे पेट सोती है लेकिन हम सुजलाम सुफलाम धरती के निवासी हैं। हमारे सिर पर छत नहीं है लेकिन हम चांद पर महल बनाने चल पड़े हैं। हमारे लिए नारी सीता और सावित्री है तो फिर हम उसे दहेज के लिए क्‍यों न जलाएं। हम स्‍वदेशी स्‍वदेशी भी चिल्‍लाएंगे और विदेशी बैंकों में अपनी काली कमाई भी जमा करेंगे........ और अब तो हम विश्‍व महाशक्ति बनने जा रहे हैं। और ऐसा होते ही देखना हम इतिहास के पहिए को वापस घुमाकर पौराणिक काल में न पहुंचा दें तो कहना...........बच्‍चा बच्‍चा या तो राम का होगा या किसी काम का न होगा।।।

पर ऐसा होने वाला नहीं है....इतिहास का पहिया एक बार आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं घुमाया जा सकता.....और जब कोई ऐसी कोशिश करता है तो वह मानवता के लिए एक त्रासदी का ही निर्माण करता है।

इसके उलट इतिहास को आगे ले जाने वाली ताकतें भी तैयार हो रही हैं। इतिहास के अंत की घोषणाएं करने वाले आज डिप्रेशन के शिकार हैं। उनकी छक्‍के छूट रहे हैं और कल तक बड़बोलापन करने वाले आज कहीं कोने में मिमिया रहे हैं।

Wednesday, December 17, 2008

अगर दुनिया में एक ही जाति, धर्म, नस्‍ल, राष्‍ट्रीयता के लोग हों, तो क्‍या हिंसा/आतंकवाद खत्‍म हो जाएगा ।

हिंसा या आतंकवाद के लिए एक सभ्‍य समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। और जब तक समाज में हिंसा मौजूद है तबतक सभ्‍य समाज बनाया भी नहीं जा सकता है। समाज में हिंसा तब भी थी जब दुनिया का कोई धर्म पैदा नहीं हुआ था इसलिए हिंसा (या आतंकवाद जो हिंसा का ही एक रूप है) को किसी एक धर्म या सभी धर्मों से भी जोड़कर नहीं देखा जा सकता। धर्म नहीं होते तो भी हिंसा/आतंकवाद रहता। लेकिन यह कोई इतना छोटा मसला भी नहीं है कि आनन-फानन में इसके बारे में भावनात्‍मक आवेग में आकर और बिना कुछ सोचे विचारे कोई समाधान प्रस्‍तुत कर दिया जाए। सच्‍चाई यह है कि हिंसा का विरोध करने वाले यहां भी अपने निजी हितों को ही ऊपर रखते हैं।
मिसाल के लिए रतन टाटा को ही ले लीजिए। आजतक जब तक कि 'सिस्‍टम' ने रतन टाटा को तमाम वैध-अवैध तरीकों से व्‍यवसाय फैलाने, मुनाफा लूटने, श्रमिकों की मेहनत लूटने की इजाजत और खुली छूट दे रखी थी तब तक आज के युवाओं के आदर्श रतन टाटा जी को सिस्‍टम पर पूरा भरोसा था। ऐसा तो नहीं कि देश में इसके पहले कभी हिंसा हुई ही नही थी, पर रतन टाटा चुप रहे। और जब उनके अपने होटल पर हमला हुआ (ऐसा होटल जिसमें भारत की 99.5 प्रतिशत जनता घुस भी नहीं सकती थी), तो टाटाजी ने बयान दे डाला कि हमें सिस्‍टम पर भरोसा नहीं है, हम अपनी सुरक्षा स्‍वयं करेंगे (टाइम्‍स आफ इंडिया, 17 दिसंबर, 08)। बिल्‍कुल कर सकते हैं, क्‍योंकि आप ऐसी सुरक्षा अफोर्ड कर सकते हैं, पर देश की 99 प्रतिशन जनता तो नहीं अफोर्ड कर सकती। अगर यह सिस्‍टम रतन टाटा जैसे देश के 'रतन' की सुरक्षा नहीं कर सकता तो आम आदमी के बारे में कहना ही क्‍या है।
समाज में हिंसा तभी से मौजूद रही है जबसे समाज शोषकों और शोषितों में विभाजित हुआ। यह हिंसा विकृत सामाजिक व्‍यवस्‍था का एक बाइप्रोडक्‍ट है। यह समाज रूपी शरीर को लगी बीमारी का एक लक्षण भर है, यह अपने आप में पूरी बीमारी नहीं है। और यदि शरीर को ठीक करना है तो इलाज इस बीमारी के लक्षणों का नहीं बल्कि बीमारी का करना होगा।
आज समाज में जो हिंसा व्‍याप्‍त है उसके कई रूप हैं और कई कारण भी। लेकिन हिंसा का विरोध करने वाले अधिकतर लोग एक तरह की हिंसा का विरोध तो करते हैं मगर अन्‍य प्रकार की हिंसा पर चुप्‍पी साधे रहते हैं। जापान पर दो एटम बम गिरा चुका अमेरिका आज विश्‍व मंच पर शान्ति की बात करता है और गुआंतानामो बे और अबु घरेब में अमानवीय कृत्‍य अंजाम देता है। सच्‍चाई यह है कि अपने आर्थिक, राजनीतिक, व्‍यक्तिगत, धार्मिक, जातिगत, नस्‍लीय या लैंगिक स्‍वार्थपूर्ति के लिए दूसरों पर जोर-जबरदस्‍ती करना ही हर प्रकार की हिंसा का मूल स्रोत है। चूंकि पूंजीवादी समाज किसी भी तरीके से स्‍वार्थपूर्ति करने को जायज समझता है और इसी सिद्धान्‍त पर आधारित है इसलिए पूंजीवादी समाज में हिंसा भी अधिक होती है।
हर शासक वर्ग हिंसा को अपने हितों के अनुरूप परिभाषित करता है। इसलिए भारत में जहां औसतन 2 लोगों के रोज आतंकवादी गतिविधियों में मारे जाने पर भयंकर हाय तौबा मचती है उसी भारत में पुलिस हिरासत में रोज 4 लोगों के मरने और काम के दौरान होने वाली घटनाओं और बीमारियों से रोज मरने वाले 1095 लोगों के बारे में न तो मीडिया में कोई जगह मिलती है, न तो मानवतावादी ब्‍लॉगर उसपर कुछ लिखते हैं। हमारे महान देश में भूख और कुपोषण से हर दिन हजारों लोग मरते हैं, पांच वर्ष से कम आयु वाले बच्‍चों में शिशु मुत्‍यु दर 76 प्रतिशत है। लेकिन इन आंकड़ों से हमें कोई कष्‍ट नहीं होता। क्‍योंकि हमारा एजेंडा तो हिंसा को धार्मिक रंग देना और राजनीतिक लाभ हासिल करना है। पर क्‍या सिर्फ हिंसा/आतंकवाद खत्‍म हो जाने से भूख और कुपोषण भी खत्‍म हो जाएगा, मजदूरों को सरकार द्वारा तय न्‍यूनतम वेतन मिलने लगेगा, दहेज के लिए औरतों को जलाना और कन्‍या शिशुओं की भ्रूण हत्‍या खत्‍म हो जाएगी, सबको शिक्षा, रोजगार और सम्‍मान से जीने का हक मिल जाएगाए जातिगत, भाषाई और क्षेत्रीय असामनताएं दूर हो जाएंगी।

नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा..... लेकिन इतना जरूर है कि अगर ये सब बुराइयां खत्‍म की जाएं या इस दिशा में प्रयास किया जाए तो हिंसा या आतंकवाद जरूर खत्‍म हो जाएगा या बहुत कम रह जाएगा।

ब्‍लाग की एक पोस्‍ट में इस समस्‍या के सभी पहलुओं पर नहीं लिखा जा सकता। इस मुद्दे पर अधिक विस्‍तार से पढ़ने के लिए राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित एक पुस्तिका 'आतंकवाद के बारे में : विभ्रम और यथार्थ' अवश्‍य देखें।

Tuesday, December 16, 2008

सरकार यानी पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी

एक ट्रेंड के तौर पर यह पहले से ही नजर आने लगा था लेकिन जो लोग प्रवृत्तियों और रुझानों को पर्याप्‍त तथ्‍यों के प्रकाश में ही समझ पाते हैं अब तो उनके सामने भी यह लगातार अधिक से अधिक साफ होता जा रहा है कि पूंजीवादी जनतंत्र के इस तमाशे में वही सफल हो सकता है जिसकी झोली में सबसे अधिक पूंजी हो।
पांच राज्‍यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मीडिया में (टाइम्‍स आफ इंडिया) बहुत प्रमुखता से यह खबर प्रकाशित हुई कि इन विधानसभा चुनावों में ज्‍यादातर उम्‍मीदवार और सफल प्रत्‍याशी करोड़ों के स्‍वामी हैं। दिल्‍ली विधानसभा के लगभग सारे ही विधायक लखपति या करोड़पति हैं। पांचों राज्‍यों जिनमें अभी विधानसभा चुनाव हुए हैं में देखें तो 40 प्रतिशत सीटें करोड़पति प्रत्‍याशियों ने जीती हैं। 5 लाख प्रतिवर्ष से कम आय वाले 3 प्रतिशत से भी कम उम्‍मीदवारों ने चुनाव में सफलता प्राप्‍त की। दिल्‍ली विधानसभा में औसत निकालें तो प्रत्‍येक विधायक के पास 2.86 करोड़ की संपत्ति है। यही बीजेपी और कांग्रेस के विधायकों का भी औसत है। वहीं छत्तीसगढ़ विधानसभा का हर दूसरा विधायक 3 करोड़ की परिसंपत्तियों का मालिक है।
सिर्फ तथ्‍यों की ही बात करें तो आंकड़ें बताते हैं कि यदि आपके पास 5 करोड़ से अधिक की संपत्ति है तो आपके चुनाव जीतने की संभावना 50 प्रतिशत हो जाती है। कम आय वालों के लिए यह संभावना उनकी आय के हिसाब से ही कम होती जाती है।
यह ट्रेंड कोई नई बात नहीं है लेकिन मीडिया में इसको अब जगह मिली क्‍योंकि अब आंकड़े इतने सनसनी फैलाने वाले हो गए हैं कि इन्‍हें पहले पन्‍ने पर देकर अखबार की रेटिंग बढ़ाई जा सकती है। वर्ना यह तो सभी जानते हैं कि संसद और विधानसभाओं में हर पूंजीपति की अपनी एक लॉबी होती है और यह भी सब जानते हैं कि कौन सांसद या विधायक किस पूंजीपति के हित साधता है। यह अनायास नहीं है कि अनिल अंबानी और विजय माल्‍या जैसे पूजीपति स्‍वयं सांसद बनते हैं। अब इसमें कुछ समझने लायक नहीं बचा है कि हमारे सम्‍मानित सांसद और विधायक या तो स्‍वयं पूंजीपति हैं या पूंजीपति बनने की राह पर हैं और इसलिए इससे यह एक सरल सा निष्‍कर्ष भी निकलता है कि उनके हित पूंजीपतियों के हितों के साथ्‍ा नत्‍थी हैं। चाहे वे किस भी जाति धर्म के हों लेकिन उनका वर्ग एक है - पूंजीपति वर्ग। और उनका काम भी एक ही है अपने वर्ग की उन्‍नति के बारे में सोचना और काम करना।
समानता, स्‍वतंत्रता और भाईचारे के जिस नारे के साथ पूंजीपति वर्ग सत्ता में आया था उसका मतलब सिर्फ यह रह गया है कि पूंजीपतियों के बीच की समानता, देश और देश की जनता को लूटने की स्‍वतंत्रता और इस लूट के निजाम को बनाए रखने के लिए शोषकों का आपसी भाईचारा। देश की तीन चौथाई आबादी के लिए समानता, स्‍वतंत्रता और भाईचारे की पोल तभी खुल जाती है जब चौराहे पर खाकी वर्दी डाले कोई पुलिसवाला उसको जब-तब मां-बहन की सुना देता है। आम आदमी चोर बदमाशों से उतना नहीं डरता जितना कि पुलिस से। ऐसा इसलिए नहीं है क्‍योंकि नौकरशाही में कुछ भ्रष्‍ट लोग आ गए हैं बल्कि इसलिए है क्‍यों‍कि नौकरशाही लोगों की सेवा के लिए है ही नहीं। नौकरशाही का काम तो पूंजीपति वर्ग के हितों की हिफाजत करना और उसके पक्ष में न्‍याय-कानून का प्रयोग करना है। बाकी जनता के लिए तो कोर्ट कचहरी और सरकारी दफ्तर बस दिखावे की चीजें हैं।
कहने की कोई जरूरत नहीं कि देश की संसद और विधानसभाएं आम लोगों के हितों की रक्षा नहीं करते और न ही आम जनता को उनसे कोई अपेक्षाएं पालनी चाहिए। पूंजीवादी धनतंत्र में पूंजी का नंगा खेल अब उस हद तक बढ़ चुका है (और इसे बढ़ते ही जाना है) कि इस व्‍यवस्‍था को सुधारने की कोई उम्‍मीद बाकी नहीं रह गई है।