वस्तुगत यथार्थ की तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति का एक प्रयास.....क्योंकि यदि रूप ही अन्तर्वस्तु का द्योतक होता तो विज्ञान की ज़रूरत ही नहीं होती!
Monday, February 16, 2009
सत्यम का घोटाला और नैतिकता की दुहाई।
प्रश्न यहीं खड़ा होता है। रामालिंगा राजू ने जो किया वह अनैतिक कैसे हो सकता है। और रामालिंगा राजू न ऐसा क्या किया जो उनके जैसे बाकी लोग नहीं करते या अपनी औकात के मुताबिक जिन्हें मौका मिलता है वह नहीं करते। नैतिकता की दुहाई तो तब दी जा सकती है जब नैतिकता और अनैतिकता में कोई गुणात्मक भेद हो।
अगर रामालिंगा राजू पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने बही-खातों में हेर फेर की तो पूछा जा सकता है कि उसने कौन सा बड़ा गुनाह कर दिया। कौन पूंजीपति, व्यवसायी, दूकानदार, बही-खातों में हेर फेर नहीं करता। छोटे से छोटे दूकानदार से लेकर बड़े से बड़े उद्योगपति तक कौन टैक्स बचाने के लिए झूठे खर्च और हिसाब किताब में गड़बड़ी नहीं करता। अगर छोटा दूकानदार दाल और चावल में मिलावट करता है तो बड़ा पूंजीपति घटिया उत्पाद बनाकर मुनाफा कमाता है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम जैसी बड़ी बड़ी साफ्टवेयर कंपनियों के मुनाफे का राज़ है उनके कर्मचारियों का भयंकर शोषण और उनकी मेहनत की लूट। सॉफ्टवेयर कंपनियों में 10-12 घंटे काम को सामान्य समझा जाता है और पगार 8 घंटे की दी जाती है। इन कंपनियों में कहा जाता है कि आने का समय तो तय है लेकिन जाने का समय मैनेजर और काम के अनुसार तय होता है। ओवरटाइम का कोई झंझट ये कंपनियां नहीं पालतीं बस आपको चाय कॉफी मिलती रहती है। चूंकि ये कंपनियां विदेशी ग्राहकों की सेवा करती हैं इसलिए मुद्रा में अंतर के कारण इन्हें भारी मुनाफा होता है और अपने कर्मचारियों को बाकी उद्योगों की तुलना में बेहतर पगार देने के बाद भी इनका मुनाफा जबरदस्त होता है। साफ्टवेयर और कॉल सेंटर में काम करने वालों की जिंदगी कोल्हू के बैल के जैसी होती है। जिंदगी और बाहरी दुनिया से कटे ये नौजवान बहुत कम उम्र में ही अलगाव, डिप्रेशन और अन्य मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
यह सब कुछ सामान्य माना जाता है और अनैतिक नहीं समझा जाता। राजू भी जब यह सब कर रहा था तब उसे अनैतिक नहीं समझा गया। राजू की गलती बस यही रही कि वह अपनी सीमा से बाहर चला गया और नियंत्रण खो बैठा। पर जो खुद ही अनैतिक हैं, जो खुद ही ये सारे गलत धंधे करते हैं वे राजू को किस आधार पर अनैतिक कह रहे हैं। क्या हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, फिक्की और एस्सोचैम के लोग जो राजू को अनैतिक कह रहे हैं वे यह मानते हैं कि बाकी सभी दूध के धुले हैं। वास्तव में सबकी सच्चाई सभी जानते हैं लेकिन आपसी समझदारी के नाते कोई मुंह नहीं खोलता जब तक कि समस्या इस हद तक न बढ़ जाए कि उसे छुपाए रख पाना संभव ही न हो सके।
असल में पूंजीवादी व्यवस्था में नैतिकता और अनैतिकता का कोई भेद नहीं होता। जो चीज मुनाफा दे वह नैतिक होती है। यहां लूट, डकैती, भ्रष्टाचार सब जायज है। और यह अपने दायरे में सभी को समेट लेती है। हर छोटे बड़े व्यवसायी को ईमान धर्म बेचकर बस मुनाफा कमाना होता है। इसलिए चूंकि हमाम में सभी नंगे होते हैं और एकदूसरे की असलियत से वाकिफ होते हैं कोई दूसरे पर उंगली नहीं उठाता। जब पानी सर से गुजरने लगता है तब किसी न किसी को बलि का बकरा बनना पड़ता है ताकि लोगों का भरोसा इस व्यवस्था में बनाए रखा जा सके। राजू के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का बस यही मतलब है कि निवेशकों का विश्वास भारतीय अर्थव्यवस्था से टूट न जाए। सिर्फ एक राजू की वजह से लूट के इस पूरे कारोबार पर ही खतरा न मंडराने लगे। हमारे देश को चलाने वाले पूंजीपतियों और उनकी सरकार की बस यही मंशा है। नैतिकता और ईमान धर्म से तो खुद उनका दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है।
Monday, January 26, 2009
आधी अधूरी आजादी, लूला लंगड़ा गणतंत्र।
जनता के हिस्से में केवल लूट और बर्बादी है।
जनवरी 1950 को आज के दिन हमारे महान देश का महान संविधान लागू हुआ। इस संविधान की महानता यह थी कि इसे देश देश के महज 15 प्रतिशत मध्यवर्ग, उच्च मध्यवर्ग, अंग्रेज परस्त जगीरदारों, जमींदारों, नवाबों, राजाओं और व्यापारियों के प्रतिनिधियों ने मिलकर बनाया था। उससे भी ज्यादा तारीफ की बात यह थी कि दुनिया भर के संविधानों से से जोड़-जुगाड़कर तैयार किया गया यह संविधान मूलत: उन्हीं नियमों-कानूनों पर आधारित था जो अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे थे। कल तक अंग्रेजों की चापलूसी करते आ रहे कायर-नपुंसक राजे-रजवाड़े, क्रान्तिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही देने वाले गद्दार, जनता पर जुल्म करने वाले जमींदार और जागीरदार और अपने ही लोगों पर लाठी-गोली बरसाने वाली पुलिस और सेना सब पहले की तरह शासन करते रहे। लेकिन बात इतनी ही नहीं थी, हमारे महान देश की महानता तो यह थी कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले क्रान्तिकारियों पर देश की आजादी के बाद भी कई वर्षों तक मुकदमें चलाए जाते रहे। शान्ति के दूत महात्मा गॉंधी को भी इस बात से कोई ऐतराज नहीं था।
यह आजादी मुट्ठी भर धनिकों की
लड़कर हासिल करनी होगी सही आजादी श्रमिकों की।
जैसा कि भगतसिंह ने कहा था आजादी के बाद गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों का शासन आ गया और जनता की बुनियादी हालत में कोई बदलाव नहीं हुआ। लूट, शोषण, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई, भूख, कुपोषण आजादी के ये तोहफे जनता की झोली में आ गिरे। आजादी के बाद कई वर्षों तक अपने ही देश की फौज अपने ही देश के किसानों और मजदूरों का खून बहाती रही। तेभागा-तेलंगाना, पुनप्रा-वायलार, मलाबार तक किसानों, मजदूरों का खून बहाने में नेहरू और पटेल की सरकार अंग्रेजों से पीछे नहीं रही। सार्विक मताधिकार का झुनझुना थमा दिया गया पर लोगों की चेतना उन्नत करने का कोई प्रयास नहीं किया गया जिसके कारण यह झुनझुना आज तक एक झुनझुना ही बना रह गया। ज्यों ज्यों भारतीय शासक वर्ग का जनविरोधी और पूंजीपरस्त चरित्र उजागर होता गया समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का उसी तेजी से ह्रास होता गया। आजादी की लड़ाई के दौर में जो भी प्रगतिशील संस्कार और संस्थाएं खड़ी की गई थीं, पूंजी और बाजार ने उन्हें इस तरह पतित और भ्रष्ट कर दिया कि आज सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त से लोगों को हैरानी तक नहीं होती है। बल्कि हैरानी तो इस बात पर होती है कि इसके बावजूद सबकुछ चल रहा है। वैसे इसके पीछे भी कोई रहस्य नहीं है क्योंकि अगर भले ही घिसते-पिटते लेकिन अगर सबकुछ चलेगा नहीं तो आखिर लूटेंगे क्या। यह सबकुछ चलाते रहना भी लुटेरों की एक मजबूरी है।
मजेदार बात तो यह भी है कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने वालों को विदेशी पूंजी से कोई ऐतराज नहीं है उल्टा वे तो विदेशी राज का बखान भी करते हैं और कहते हैं कि सरकार आप तो बहुत अच्छे थे आप चले क्यों गए, वापस चले आइए, अपनी पूंजी के टुकड़े हमारी तरफ उछालिए, हमें गुलामी की ऐसी आदत पड़ गई है कि हम अपनी मां को भी अंग्रेजी संबोधन से पुकारते हैं। हमारे देश की अरबों करोड़ों जनता अपने खून पसीने से आपको मालामाल कर देने को लालायित है.....प्लीज आइए और हमें लूटिए।
जिस विदेशी गुंडे के ऊपर उसके देश के और दुनिया भर के लोग थूकते और जूता मारते हैं हमारे देश का प्रधानमंत्री कहता है कि भारतीय उसे प्यार करते हैं।
राष्ट्रीय गर्व और राष्ट्रीय भावना का आलम यह है कि आज के महान दिन जिस इंडिया गेट पर देश के गौरव का बखान किया जाता है वह देश की आजादी के लिए मरने वाले सेनानियों का नहीं बल्कि अंग्रेजों की भाड़े की नौकरी करने वाले सैनिकों की याद में बनाया गया है।
हमारे महान देश की महान सभ्यता और संस्कृति के स्तुतिगान में महापुराण लिखे जा सकते हैं। हमें दो चार श्लोकों और छंदों के अलावा भले कुछ न आए लेकिन हम अपने को दुनिया का गुरु कहते हैं। हमारी दो तिहाई आबादी भूखे पेट सोती है लेकिन हम सुजलाम सुफलाम धरती के निवासी हैं। हमारे सिर पर छत नहीं है लेकिन हम चांद पर महल बनाने चल पड़े हैं। हमारे लिए नारी सीता और सावित्री है तो फिर हम उसे दहेज के लिए क्यों न जलाएं। हम स्वदेशी स्वदेशी भी चिल्लाएंगे और विदेशी बैंकों में अपनी काली कमाई भी जमा करेंगे........ और अब तो हम विश्व महाशक्ति बनने जा रहे हैं। और ऐसा होते ही देखना हम इतिहास के पहिए को वापस घुमाकर पौराणिक काल में न पहुंचा दें तो कहना...........बच्चा बच्चा या तो राम का होगा या किसी काम का न होगा।।।
पर ऐसा होने वाला नहीं है....इतिहास का पहिया एक बार आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं घुमाया जा सकता.....और जब कोई ऐसी कोशिश करता है तो वह मानवता के लिए एक त्रासदी का ही निर्माण करता है।
इसके उलट इतिहास को आगे ले जाने वाली ताकतें भी तैयार हो रही हैं। इतिहास के अंत की घोषणाएं करने वाले आज डिप्रेशन के शिकार हैं। उनकी छक्के छूट रहे हैं और कल तक बड़बोलापन करने वाले आज कहीं कोने में मिमिया रहे हैं।
Wednesday, December 17, 2008
अगर दुनिया में एक ही जाति, धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता के लोग हों, तो क्या हिंसा/आतंकवाद खत्म हो जाएगा ।
मिसाल के लिए रतन टाटा को ही ले लीजिए। आजतक जब तक कि 'सिस्टम' ने रतन टाटा को तमाम वैध-अवैध तरीकों से व्यवसाय फैलाने, मुनाफा लूटने, श्रमिकों की मेहनत लूटने की इजाजत और खुली छूट दे रखी थी तब तक आज के युवाओं के आदर्श रतन टाटा जी को सिस्टम पर पूरा भरोसा था। ऐसा तो नहीं कि देश में इसके पहले कभी हिंसा हुई ही नही थी, पर रतन टाटा चुप रहे। और जब उनके अपने होटल पर हमला हुआ (ऐसा होटल जिसमें भारत की 99.5 प्रतिशत जनता घुस भी नहीं सकती थी), तो टाटाजी ने बयान दे डाला कि हमें सिस्टम पर भरोसा नहीं है, हम अपनी सुरक्षा स्वयं करेंगे (टाइम्स आफ इंडिया, 17 दिसंबर, 08)। बिल्कुल कर सकते हैं, क्योंकि आप ऐसी सुरक्षा अफोर्ड कर सकते हैं, पर देश की 99 प्रतिशन जनता तो नहीं अफोर्ड कर सकती। अगर यह सिस्टम रतन टाटा जैसे देश के 'रतन' की सुरक्षा नहीं कर सकता तो आम आदमी के बारे में कहना ही क्या है।
समाज में हिंसा तभी से मौजूद रही है जबसे समाज शोषकों और शोषितों में विभाजित हुआ। यह हिंसा विकृत सामाजिक व्यवस्था का एक बाइप्रोडक्ट है। यह समाज रूपी शरीर को लगी बीमारी का एक लक्षण भर है, यह अपने आप में पूरी बीमारी नहीं है। और यदि शरीर को ठीक करना है तो इलाज इस बीमारी के लक्षणों का नहीं बल्कि बीमारी का करना होगा।
आज समाज में जो हिंसा व्याप्त है उसके कई रूप हैं और कई कारण भी। लेकिन हिंसा का विरोध करने वाले अधिकतर लोग एक तरह की हिंसा का विरोध तो करते हैं मगर अन्य प्रकार की हिंसा पर चुप्पी साधे रहते हैं। जापान पर दो एटम बम गिरा चुका अमेरिका आज विश्व मंच पर शान्ति की बात करता है और गुआंतानामो बे और अबु घरेब में अमानवीय कृत्य अंजाम देता है। सच्चाई यह है कि अपने आर्थिक, राजनीतिक, व्यक्तिगत, धार्मिक, जातिगत, नस्लीय या लैंगिक स्वार्थपूर्ति के लिए दूसरों पर जोर-जबरदस्ती करना ही हर प्रकार की हिंसा का मूल स्रोत है। चूंकि पूंजीवादी समाज किसी भी तरीके से स्वार्थपूर्ति करने को जायज समझता है और इसी सिद्धान्त पर आधारित है इसलिए पूंजीवादी समाज में हिंसा भी अधिक होती है।
हर शासक वर्ग हिंसा को अपने हितों के अनुरूप परिभाषित करता है। इसलिए भारत में जहां औसतन 2 लोगों के रोज आतंकवादी गतिविधियों में मारे जाने पर भयंकर हाय तौबा मचती है उसी भारत में पुलिस हिरासत में रोज 4 लोगों के मरने और काम के दौरान होने वाली घटनाओं और बीमारियों से रोज मरने वाले 1095 लोगों के बारे में न तो मीडिया में कोई जगह मिलती है, न तो मानवतावादी ब्लॉगर उसपर कुछ लिखते हैं। हमारे महान देश में भूख और कुपोषण से हर दिन हजारों लोग मरते हैं, पांच वर्ष से कम आयु वाले बच्चों में शिशु मुत्यु दर 76 प्रतिशत है। लेकिन इन आंकड़ों से हमें कोई कष्ट नहीं होता। क्योंकि हमारा एजेंडा तो हिंसा को धार्मिक रंग देना और राजनीतिक लाभ हासिल करना है। पर क्या सिर्फ हिंसा/आतंकवाद खत्म हो जाने से भूख और कुपोषण भी खत्म हो जाएगा, मजदूरों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन मिलने लगेगा, दहेज के लिए औरतों को जलाना और कन्या शिशुओं की भ्रूण हत्या खत्म हो जाएगी, सबको शिक्षा, रोजगार और सम्मान से जीने का हक मिल जाएगाए जातिगत, भाषाई और क्षेत्रीय असामनताएं दूर हो जाएंगी।
नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा..... लेकिन इतना जरूर है कि अगर ये सब बुराइयां खत्म की जाएं या इस दिशा में प्रयास किया जाए तो हिंसा या आतंकवाद जरूर खत्म हो जाएगा या बहुत कम रह जाएगा।
ब्लाग की एक पोस्ट में इस समस्या के सभी पहलुओं पर नहीं लिखा जा सकता। इस मुद्दे पर अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित एक पुस्तिका 'आतंकवाद के बारे में : विभ्रम और यथार्थ' अवश्य देखें।
Tuesday, December 16, 2008
सरकार यानी पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मीडिया में (टाइम्स आफ इंडिया) बहुत प्रमुखता से यह खबर प्रकाशित हुई कि इन विधानसभा चुनावों में ज्यादातर उम्मीदवार और सफल प्रत्याशी करोड़ों के स्वामी हैं। दिल्ली विधानसभा के लगभग सारे ही विधायक लखपति या करोड़पति हैं। पांचों राज्यों जिनमें अभी विधानसभा चुनाव हुए हैं में देखें तो 40 प्रतिशत सीटें करोड़पति प्रत्याशियों ने जीती हैं। 5 लाख प्रतिवर्ष से कम आय वाले 3 प्रतिशत से भी कम उम्मीदवारों ने चुनाव में सफलता प्राप्त की। दिल्ली विधानसभा में औसत निकालें तो प्रत्येक विधायक के पास 2.86 करोड़ की संपत्ति है। यही बीजेपी और कांग्रेस के विधायकों का भी औसत है। वहीं छत्तीसगढ़ विधानसभा का हर दूसरा विधायक 3 करोड़ की परिसंपत्तियों का मालिक है।
सिर्फ तथ्यों की ही बात करें तो आंकड़ें बताते हैं कि यदि आपके पास 5 करोड़ से अधिक की संपत्ति है तो आपके चुनाव जीतने की संभावना 50 प्रतिशत हो जाती है। कम आय वालों के लिए यह संभावना उनकी आय के हिसाब से ही कम होती जाती है।
यह ट्रेंड कोई नई बात नहीं है लेकिन मीडिया में इसको अब जगह मिली क्योंकि अब आंकड़े इतने सनसनी फैलाने वाले हो गए हैं कि इन्हें पहले पन्ने पर देकर अखबार की रेटिंग बढ़ाई जा सकती है। वर्ना यह तो सभी जानते हैं कि संसद और विधानसभाओं में हर पूंजीपति की अपनी एक लॉबी होती है और यह भी सब जानते हैं कि कौन सांसद या विधायक किस पूंजीपति के हित साधता है। यह अनायास नहीं है कि अनिल अंबानी और विजय माल्या जैसे पूजीपति स्वयं सांसद बनते हैं। अब इसमें कुछ समझने लायक नहीं बचा है कि हमारे सम्मानित सांसद और विधायक या तो स्वयं पूंजीपति हैं या पूंजीपति बनने की राह पर हैं और इसलिए इससे यह एक सरल सा निष्कर्ष भी निकलता है कि उनके हित पूंजीपतियों के हितों के साथ्ा नत्थी हैं। चाहे वे किस भी जाति धर्म के हों लेकिन उनका वर्ग एक है - पूंजीपति वर्ग। और उनका काम भी एक ही है अपने वर्ग की उन्नति के बारे में सोचना और काम करना।
समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे के जिस नारे के साथ पूंजीपति वर्ग सत्ता में आया था उसका मतलब सिर्फ यह रह गया है कि पूंजीपतियों के बीच की समानता, देश और देश की जनता को लूटने की स्वतंत्रता और इस लूट के निजाम को बनाए रखने के लिए शोषकों का आपसी भाईचारा। देश की तीन चौथाई आबादी के लिए समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की पोल तभी खुल जाती है जब चौराहे पर खाकी वर्दी डाले कोई पुलिसवाला उसको जब-तब मां-बहन की सुना देता है। आम आदमी चोर बदमाशों से उतना नहीं डरता जितना कि पुलिस से। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि नौकरशाही में कुछ भ्रष्ट लोग आ गए हैं बल्कि इसलिए है क्योंकि नौकरशाही लोगों की सेवा के लिए है ही नहीं। नौकरशाही का काम तो पूंजीपति वर्ग के हितों की हिफाजत करना और उसके पक्ष में न्याय-कानून का प्रयोग करना है। बाकी जनता के लिए तो कोर्ट कचहरी और सरकारी दफ्तर बस दिखावे की चीजें हैं।
कहने की कोई जरूरत नहीं कि देश की संसद और विधानसभाएं आम लोगों के हितों की रक्षा नहीं करते और न ही आम जनता को उनसे कोई अपेक्षाएं पालनी चाहिए। पूंजीवादी धनतंत्र में पूंजी का नंगा खेल अब उस हद तक बढ़ चुका है (और इसे बढ़ते ही जाना है) कि इस व्यवस्था को सुधारने की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई है।
Sunday, November 30, 2008
सर्वहारा के महान शिक्षक फ्रेडरिक एंगेल्स (जन्मदिन 28 नवंबर) की याद में
Wednesday, October 22, 2008
ग्रेजियानो की घटना : छद्म मानवतावादियों के मुंह पर तमाचा मारती सच्चाईयां
ग्रेजियानो की घटना पर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जांच-पड़ताल से उभरे तथ्य।
22 सितम्बर की घटना और उसकी पृष्ठभूमि
सरलीकोन ग्रेज़ियानो ट्रांसमिशन इण्डिया इटली की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सबसिडियरी है। यहां बड़ी मशीनों के गियर, एक्सेल आदि बनाये जाते हैं। इसके अधिकांश उत्पाद अमेरिका-इटली के बाजारों में बिकते हैं। 2003 में 20 करोड़ से कम की पूंजी से शुरू की गयी इस कम्पनी की पूंजी 2008 में बढ़कर 240 करोड़ रुपये हो चुकी है। यह ज़बर्दस्त मुनाफ़ा मज़दूरों के भयंकर शोषण की बदौलत ही सम्भव हुआ था।
फैक्ट्री में 12-12 घण्टे की दो शिफ्टों में दिनों-रात काम होता था। ओवरटाइम अनिवार्य था और कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जाती थी। इसे मानने से इंकार करने वाले मज़दूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था। शुरू में 350 स्थायी मज़दूरों को आपरेटर-कम-सेटलर के तौर पर रखा गया था और 80 अप्रेंटिस/ट्रेनी थे। करीब 500 मज़दूर लेबर कांट्रैक्टरों के मातहत काम करते थे। पिछले कुछ सालों से बिना कारण बताये मज़दूरों की बीच-बीच में छँटनी की जा रही थी। उनको कोई ज्वॉयनिंग लेटर नहीं दिया जाता था। गलत ढंग से कार्ड पंच करके उनके वेतन और ओवरटाइम से भारी कटौती की जा रही थी। सवाल उठाने पर मैनेजरों की मार-गाली इनाम में मिला करती। इन हालात से तंग आकर पहले-पहल मज़दूरों ने नवम्बर 2007 में यूनियन बनाने की कोशिश शुरू की। इसकी भनक लगते ही कम्पनी ने 3 मज़दूरों के फैक्ट्री में घुसने पर रोक लगा दी और एक को बर्खास्त कर दिया। कानुपर स्थित रजिस्ट्रार कार्यालय ने भी कम्पनी मैनेजमेण्ट की शह पर तरह-तरह के हथकण्डों से यूनियन के गठन को लटकाये रखा।
दिसम्बर 2007 में मैनेजमेण्ट के रवैये के विरुद्ध आन्दोलन करने पर 100 और मज़दूरों को बाहर कर दिया गया। लम्बे आन्दोलन के बाद 24 जनवरी, 2008 को कम्पनी ने साप्ताहिक छुट्टी और 1200 रु. वेतनवृद्धि की बात मान ली। लेकिन इस समझौते के तुरन्त बाद कम्पनी ने स्थानीय ठेकेदारों के मातहत 400 नये मज़दूर ठेके पर रख लिये जो फैक्ट्री परिसर के भीतर ही रहते थे। 400 मज़दूरों के इस ''कैप्टिव फोर्स'' के दम पर इन ठेकेदारों ने पहले से काम कर रहे मज़दूरों को धमकाना शुरू कर दिया। इन ठेकेदारों ने मज़दूरों को आतंकित करने और उनके आन्दोलन से निपटने के लिए फैक्ट्री परिसर में लोहे की छड़ें, लाठियां और दूसरे हथियार भी इकट्ठा कर रखे थे। इसके साथ ही 150 सिक्योरिटी गार्डों के रूप में एक ठेकेदार के तहत गुण्डों की पूरी बटालियन खड़ी कर ली गयी।
400 नये भर्ती किये गये ठेका मज़दूर चूँकि 3 महीनों के दौरान मशीन ऑपरेट करना सीख गये थे इसीलिए चरणबद्ध तरीके से मज़दूरों को निकाला जाने लगा। 5 मई को कम्पनी ने 5 मज़दूरों की छँटनी कर दी। इन मज़दूरों को निकाले जाने का विरोध कर रहे 27 परमानेण्ट मज़दूरों को सस्पेण्ड कर दिया गया। इसके एक हफ्ते बाद ही 30 और मज़दूर निकाल बाहर किये गये। एकदम स्पष्ट था कि कम्पनी सोची-समझी रणनीति के तहत योजनाबद्ध तरीके से पुराने मज़दूरों से छुटकारा पाना चाह रही थी। मैनेजमेण्ट ने वर्कशाप के भीतर रिवर्स एग्ज़ॉस्ट पंखे बन्द करा दिये जिससे भीतर गर्मी बेहद बढ़ गयी। चारों ओर क्लोज़ सर्किट कैमरे लगा दिये गये थे और जो भी मज़दूर थोड़ी देर भी ढीला पड़ता दिखता उसे बाहर कर दिया जाता। मज़दूरों ने संबंधित अधिकारियों से शिकायत भी की लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
मज़दूरों ने डीएलसी और जिलाधिकारी के कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया। श्रममन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री को अपनी समस्या से अवगत कराया। उन्होंने इटली दूतावास तक अपनी बात पहुँचायी। लेकिन उनकी आवाज बहरे कानों पर पड़ रही थी। मज़दूरों को अलग-थलग पड़ता देख कम्पनी मैनेजमेण्ट ने दम्भ के साथ घोषणा की कि अगर प्रधानमन्त्री भी कहें तो भी तुम लोगों को काम पर वापस नहीं लेंगे। 2 जुलाई के दिन मैनेजमेण्ट ने बाकी बचे 192 मज़दूरों को भी काम से निकाल दिया। वस्तुत: कंपनी को इस दिन श्रमायुक्त के समक्ष हुए समझौते के अनुसार मज़दूरों को काम पर वापस रखना था! इस तरह कुल 254 मज़दूरों को सड़क पर धकेल दिया गया। कई महीनों से बेरोजगार मज़दूरों के सामने भुखमरी की नौबत पैदा हो गयी। कई लोगों को अपने घर का सामान तक बेचना पड़ा। मज़दूर ही नहीं श्रम विभाग के अधिकारियों तक का कहना है कि समझौते पर कई बार सहमत होने के बावजूद कम्पनी में वापस पहुँचते ही मैनेजमेण्ट के लोग उसे लागू करने से मुकर जाते थे।
22 सितम्बर को क्या हुआ?
एक बार फिर मज़दूरों ने श्रम विभाग का दरवाजा खटखटाया। मैनेजमेण्ट ने साफ तौर पर कहा कि 22 सितम्बर तक सभी मज़दूर कम्पनी में आकर माफीनामा लिखें तभी आगे की बात की जायेगी। मजबूर होकर मज़दूर 22 सितम्बर की सुबह 9 बजे फैक्ट्री गेट पर पहुँचे। उन्हें 3 घण्टे इन्तजार कराया गया। 12 बजे के बाद मज़दूरों को भीतर टाइम ऑफिस में बुलवाया गया जहां हथियारबंद सिक्योरिटी गार्ड और स्थानीय गुण्डे पहले से तैनात थे। वहां मौजूद एक मैनेजर ने मज़दूरों से कहा कि वे कम्पनी को हुए नुकसान और तोड़फोड़ के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हुए माफीनामे पर दस्तखत करें तभी उन्हें वापस लिया जायेगा। इस पर एक मज़दूर ने प्रतिवाद करते हुए कहा ''जब हम लोगों ने कोई तोड़फोड़ की ही नहीं तो माफीनामे में ऐसा क्यों लिखें?'' इस पर अनिल शर्मा नाम के एक टाइम ऑफ़िसर ने मज़दूर को थप्पड़ मार दिया। दोनों में झगड़ा हुआ और सिक्योरिटी वालों ने मज़दूरों को पीटना शुरू कर दिया।
भीतर से हल्ला-गुल्ला सुनकर बाहर मौजूद मज़दूर भीतर दौड़ पड़े। मज़दूरों को रोकने के लिए एक मैनेजर ने सिक्योरिटी गार्डों और गुण्डों को मज़दूरों पर हमला करने का आदेश दे दिया। एक सिक्योरिटी गार्ड ने मज़दूरों पर गोली भी चलायी। इस मारपीट में 34 मज़दूर घायल हो गये। इस दौरान बिसरख थाने के एस.एच.ओ. जगमोहन शर्मा पुलिस बल के साथ मौजूद रहे लेकिन मालिकान की शह पर उन्होंने कुछ नहीं किया। बाद में पुलिस ने दोनों तरफ के लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन मैनेजमेण्ट के लोगों को तो छोड़ दिया गया जबकि मज़दूरों को जेल भेज दिया गया।
इसी अफरा-तफरी में सीईओ एल.के. चौधरी के सिर में भी चोट लगी और अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चौधरी के परिजनों का कहना है कि उनकी हत्या किसी व्यावसायिक रंजिश के तहत की गयी है, मज़दूरों ने उन्हें नहीं मारा।
लेकिन नियमित कर्मचारियों की छुट्टी करने पर आमादा मैनेजमेण्ट को एक बहाना मिल गया। स्थानीय उद्योगपति, कारपोरेट मीडिया, नौकरशाही सब मिलकर मज़दूरों को बदनाम करने और दोषी ठहराने में जुट गये। 63 मज़दूरों पर सीईओ की हत्या की साजिश रचने और उन्हें मारने का इल्जाम लगाया गया जबकि 72 अन्य पर बलवा करने और शान्ति भंग करने की धाराएं लगा दी गयीं। कई दिनों तक प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ऐसी ख़बरें आती रहीं कि ''मज़दूरों ने बर्बरतापूर्वक पीट-पीटकर सी.ई.ओ. की हत्या कर दी''।
घटना के तुरन्त बाद उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार उद्योगपतियों के पक्ष में सक्रिय हो गयी। 26 सितम्बर को दिल्ली में बुलायी गयी विशेष बैठक में मायावती ने पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को मज़दूरों के साथ सख्ती से निपटने के निर्देश दिये। मुख्य सचिव और एडीजी (कानून-व्यवस्था) ने नोएडा में कैम्प ऑफिस बनाकर उद्योगपतियों के ''दुखड़े'' सुनना शुरू कर दिया। किसी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मज़दूरों की क्या शिकायतें हैं। सरकार के रवैये से ऐसा लगता है जैसे ''औद्योगिक अशान्ति'' के सारे मामले महज़ कानून-व्यवस्था के मसले हैं और इसके लिए मज़दूर ही दोषी हैं। इन्हीं से निपटने के लिए सरकार ने आनन-फानन में नोएडा के औद्योगिक इलाकों के लिए तीन नये डीएसपी भी तैनात कर दिये। श्रम कार्यालय को लगभग दरकिनार करते हुए सरकार ने ''औद्योगिक सम्बन्ध समिति'' का गठन करके औद्योगिक विवादों के सम्बन्ध में तमाम कार्यकारी अधिकार उसे सौंप दिये हैं। इस समिति में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों के सी.ई.ओ. के अलावा जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं। मालिकान के हौसले इतने बुलन्द हैं कि ग्रेटर नोएडा एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष के मुताबिक सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है कि श्रम कार्यालय द्वारा किसी भी उद्योगपति के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने से पहले उन्हें सूचना दी जायेगी। बिल्कुल साफ है कि केन्द्र की यूपीए सरकार और उ.प्र. की मायावती सरकार राजनीति के मैदान में एक-दूसरे से चाहे जितना झगड़ें, श्रम-शक्ति को लूटने में देशी-विदेशी पूंजीपतियों के लठैत बनकर उनकी मदद के लिए किसी भी हद तक चले जाने के मामले में दोनों में कोई अंतर नहीं है।
कुछ सामाजिक तथा मज़दूर संगठन ग्रेजियानो के मज़दूरों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए तथा इस मुहिम से जुड़ने के लिए संपर्क करें:
tapish.m@gmail.com
grazianoworkerssolidarity@yahoo.com
फोन : तपिश - 9891993332
Thursday, October 16, 2008
पूंजीपतियों की चिंता में दुबली हुई जाती सरकारें...
आप सोच रहे होंगे कि भाई इसमें दिक्कत क्या है। ये तो वही पूंजीपति हैं जो अपने कामगारों का खून-पसीना एक किए रहते हैं। जब चाहे नौकरी पर रखते हैं जब चाहे निकाल बाहर करते हैं। बैंको से अरबों करोड़ों का कर्ज लेकर चुकाते नहीं हैं। किसानों की जमीनें कब्जा करते हैं। टैक्स की चोरी करते हैं और स्विस बैंकों में रुपया जमा करवाते हैं। इंसानों का खून और किडनी बेचते हैं और यहां तक कि इन्होंने प्रकृति का भी विनाश कर डाला है। सभ्यता, संस्कृति और इंसानियत तक को बिकाऊ माल बना दिया है। औरत को उपभोग की वस्तु बना दिया है और बच्चों तक को अपनी वासना का जकड़ में ले लिया है। मुनाफे ही हवस में जो इंसान भी नहीं रह गए हैं ऐसे धनपशु आज अगर अपने ही खेल में पिट रहे हैं तो इनपर रहम किया भी जाए तो क्यों।
पर सरकार ऐसा नहीं सोचती। सरकार चाहे अपने देश के लोगों को दो जून की रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल भी न उपलब्ध करवा सके पर पूंजीपतियों के लिए अपने खजाने खोलने में सरकार एक मिनट की भी देर नहीं करेगी। अमेरिका की सरकार अपने देश की एक कंपनी को बचाने के लिए जितने डॉलर खर्च कर रही है उतने में पूरे विश्व को कई साल तक खाना खिलाया जा सकता है। 5 साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं पर सरकार को उनकी चिंता नहीं है। देश की आधी आबादी भूखे पेट सोती है पर सरकार को उसकी भी चिंता नहीं है। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, मजदूर किडनियां बेच रहे हैं, औरतें अपनी अस्मिता बेचने को मजबूर हैं और बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है पर सरकार को इन सबकी भी चिंता नहीं है। सरकार को चिंता है तो बस उन धनपशुओं की जिनकी जीवनशैली पर इस आर्थिक मंदी के बावजूद कोई असर नहीं पड़ने वाला है। उनकी ऐय्याशियां कम नहीं होने वाली हैं। उनके गुनाह कम नहीं होने वाले हैं।
अगर अब भी आप नहीं समझ पाए हैं कि सरकार लोगों की नहीं पूंजीपतियों की चिंता क्यों करती है तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि 'सरकार पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी का काम करती है।' लोगों की चिंता करना उसका काम ही नहीं है, सरकार का जन्म ही इस काम के लिए नहीं हुआ है। सरकार के लिए पूंजीपतियों का हित सर्वोपरि है। उनके हित के लिए सरकार कभी बाजार खोल देती है तो कभी तमाम तरह की पाबन्दियां लगाती है। कभी उन्हें लूट-खसोट की पूरी आजादी देती है तो कभी उनके लिए अपने खजाने खोल देती है। सीधी-सादी चीजों को कानूनों के जंजाल में इस तरह उलझाती है कि पैसे वाला चाहे तो कानून अपनी जेब में रखकर घूम सकता है और गरीब बेगुनाह होकर भी पूरी जिंदगी हवालात में गुजार सकता है।
पूरे विश्व के स्तर पर आई मौजूदा आर्थिक मंदी ने नंगे तौर पर यह दिखा दिया है कि सरकार की एकमात्र चिंता पूंजीपतियों की सेवा करना है, उनके हितों की सुरक्षा करना है। आम जनता को भी अब यह समझ लेना चाहिए कि ऐसी सरकार के भरोसे उनकी नैय्या पर होने वाली नहीं है। शहीदे-आजम भगतसिंह की एक-एक बात आज सही साबित हो रही है। आज भगतसिंह के विचार पहले से भी कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।