Thursday, March 26, 2009

सवर्ण मानसिकता से ग्रस्‍त दलित चेतना

हाल ही में 'आज समाज' अखबार में छपी एक छोटी सी खबर का जिक्र करना चाहता हूं। अखबार की खबर के अनुसार फोरम आफ एकेडमिक्स फार सोशल जस्टिस की ओर से दिल्ली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्री हरबंस नाम के एक वक्ता ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होने के कारण राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित रंगनायकम्मा की पुस्तक '''जाति' प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं' पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। श्री हरबंस ने और क्या कहा इसकी अखबार में कोई चर्चा नहीं है और फिलहाल मैं उसपर कोई टिप्पणी भी नहीं कर रहा हूं, मैं सिर्फ जातिसूचक शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति के पीछे काम करने वाली मानसिकता पर कुछ बातें करना चाहता हूं।
सबसे पहले तो मैं ऐसा आरोप लगाने वाले सम्मानित बुद्धिजीवी से पूछना चाहता हूं कि क्या जाति प्रश्न पर कोई किताब जातियों का नाम लिए बिना लि‍खी जा सकती है। क्या बुद्ध और अंबेडकर ने खास जाति के लोगों को संबोधित करने के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। मान लीजिये कि किसी तथाकथित निम्‍न जाति (यहां यह स्पष्टत कर दें कि न तो रंगनायकम्मा और न ही ब्लागर उन्हें निम्न मानता है, ऐतिहासिक कारणों से मुझे ऐसी शब्दावली का प्रयोग करना पड़ रहा है) के लोगों का एक संगठन है, तो यदि उससे पूछा जाए कि आप कौन हैं तो क्या इसका जवाब यह होना चाहिए कि हम ऐसी जाति के लोगों का संगठन हैं जिसका नाम लेने से हमपर और आपपर जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का आरोप लग सकता है।
और संविधान किस तरह जातियों को आरक्षण देता है। क्या वह जातियों का नाम लिए बिना और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किए बिना आरक्षण की बात करता है। और जो लोग आरक्षण का लाभ प्राप्त‍ करते हैं क्या उनके प्रमाणपत्र पर जाति का उल्लेख नहीं होता है। अगर जातिसूचक शब्दों के प्रयोग के आधार पर प्रतिबंध लगाया जाए तो तमाम धार्मिक ग्रंथ जिनमें बौद्ध ग्रंथ भी शामिल हैं उनपर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा क्योंकि उनमें तो अनेकों बार तमाम ऊंची-नीची जातियों का उल्लेख आता है।
असल में मामला यह है कि ऐसी मांग करने वाले हमारे बुद्धिजीवी जातियों के संबंध में स्वयं ही उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं जिसका वे दूसरों पर आरोप लगाते हैं। आखिर रंगनाकम्मा ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किसी जाति विशेष को गाली देने के लिए तो किया नहीं है, बल्कि उनके समर्थन में किया है। वे तो यहां तक कहती हैं कि किसी ''निचली'' जाति का होना अपमान का नहीं बल्कि सम्मान की बात है क्योंकि इन जातियों के लोग दूसरों का शोषण करके नहीं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर जीते हैं। लेकिन हमारे बुद्धिजीवी ऐसा नहीं सोचते। वे यह नहीं सोचते कि जबतक समाज में किसी काम को छोटा और किसी काम को बड़ा समझने की मानसिकता बनी रहेगी और इस आधार पर लोगों में सामाजिक विभाजन बने रहेंगे तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी खास वर्ग को संबोधित करने के लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जब तक विभाजन रहेगा उस विभाजन को व्यक्त करने वाले शब्द भी रहेंगे ही रहेंगे, इसे किसी ताकत या कानून से रोका नहीं जा सकता। आज के शब्द कल न रहें तो भी वह काम और उस काम को करने वाले लोग तो रहेंगे ही। और उनको पुकारने के लिए किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा।
सच्चाई यह है कि जिन्हे ''निचली'' जातियां कहा जाता है वे ज्यादातर वे जातियां हैं जो शारीरिक श्रम करती हैं जिनके श्रम के बिना पूरा का पूरा समाज एक दिन भी चल नहीं सकता। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इन जातियों को अपने पर फख्र महससू करना चाहिए। लेकिन चूंकि समाज पर बौद्धिक श्रम (वास्तव में निठल्लापन) करने वालों का प्रभुत्व रहा है इसलिए वे इस तरह के शारीरिक काम को हेय समझते हैं, और स्वयं करना तो दूर जो करते हैं उन्हें नीची नजर से देखते हैं। ऐसे में जिन शब्दों के साथ अपने को जोड़कर किसी इंसान को सम्मांनित महससू करना चाहिए उन शब्दों के प्रयोग पर हमारे बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं। क्या इससे यह निष्किर्ष नहीं निकलता कि हमारे सम्मानित बुद्धिजीवी भी श्रम के संदर्भ में उसी सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हैं।
दलित बुद्धिजीवियों और अन्य पढ़े-लिखे दलितों के साथ एक समस्या तो यह भी है कि वे अपनी जाति को लेकर स्व्यं ही हीन भावना के शिकार रहते हैं। अपनी जाति के लोगों को अपने पेशे पर सम्मानित महसूस करने के लिए प्रोत्सांहित करने के बजाय उनकी मंशा बस इतनी होती है कि बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग का हो जाने के बाद उन्हें उनकी जाति से जोड़कर न देखा जाए। अपने बराबर की हैसियत वाले समाज में (धन पर आधारित बराबरी) उन्हें अगड़ी जातियों के बराबर का समझा जाए। दलित पूंजीवाद की वकालत करने वाले लोगों का भी यही अप्रोच है कि दलितों में ही कुछ अमीर और गरीब दलित हो जाएं। तो यह प्रश्न भी उठता है कि दलित जातियों के अमीर उन दलितों को क्या हेय नहीं समझेंगे जो अपने पुराने पेशे में ही रह जाएंगे। क्या कोई अमीर दलित किसी गरीब दलित के परिवार के साथ वैवाहिक संबंध बनाना चाहेगा। और अगर इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो क्या इससे सिद्ध नहीं हो जाता कि आज की परिस्थिति में जाति प्रश्न का समाधान संपत्ति के प्रश्न को हल किए बिना नहीं किया जा सकता। और इसी से क्या यह सहज निष्कर्ष भी नहीं निकलता है कि जाति प्रश्‍न के समाधान के लिए मार्क्स‍ जरूरी हैं।
मजेदार बात तो यह है कि जहां जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर इतना हो हल्ला मचता है उस देश में तमाम सरकारी कागजों पर जाति का कॉलम बना होता है। जिनमें बहुत से सरकारी कागज तो ऐसे होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की जाति पूछने का कोई औचित्य ही नहीं होता। जैसे कि किराए पर मकान लेते समय पुलिस वेरिफिकेशन के लिए प्रयोग किया जाने वाला कागज।

अगली पोस्ट में मैं इस बात पर फोकस करूंगा कि आज समाज में पेशे के आधार पर जाति विभाजन का कोई औचित्य नहीं रह गया है, क्योंकि चाहे निम्न जाति का लड़का हो या उच्च जाति का अगर वह गरीब है तो वह शहर आकर फैक्ट्री में काम करेगा अपने पुरखों का पेशा तो करेगा नहीं। इसलिए तर्कसंगत ढंग से देखें तो पेशे पर आधारित जातियों के विभाजन की व्यावस्था पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के साथ फिट नहीं होती। लेकिन फिर भी ऐसा है, तो इसके क्या कारण हैं। वे कौन हैं जिनका हित जाति व्यीवस्था को बनाए रखने में है या कहें कि जाति व्यणवस्था किनका हित साधन करती है।

Monday, February 16, 2009

सत्‍यम का घोटाला और नैति‍कता की दुहाई।

सत्‍यम कंपनी का घोटाला जगजाहिर होने के बाद सरकार से लेकर नियामक एजेंसियों और मीडिया तक सब के सब रामालिंगा राजू पर टूट पड़े। कल तब जिसे इंक्रेडिबल इंडिया का स्‍टार आइकॉन बताया जा रहा था उसे अचानक बदनामी के गर्त में गिरा दिया गया। सत्‍यम के घोटाले को एक असाधारण घटना करार दिया गया और राजू के कृत्‍य का अनैतिकता की श्रेणी में डाल दिया गया।

प्रश्‍न यहीं खड़ा होता है। रामालिंगा राजू ने जो किया वह अनैतिक कैसे हो सकता है। और रामालिंगा राजू न ऐसा क्‍या किया जो उनके जैसे बाकी लोग नहीं करते या अपनी औकात के मुताबिक जिन्‍हें मौका मिलता है वह नहीं करते। नैतिकता की दुहाई तो तब दी जा सकती है जब नैतिकता और अनैतिकता में कोई गुणात्‍मक भेद हो।

अगर रामालिंगा राजू पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने बही-खातों में हेर फेर की तो पूछा जा सकता है कि उसने कौन सा बड़ा गुनाह कर दिया। कौन पूंजीपति, व्‍यवसायी, दूकानदार, बही-खातों में हेर फेर नहीं करता। छोटे से छोटे दूकानदार से लेकर बड़े से बड़े उद्योगपति तक कौन टैक्‍स बचाने के लिए झूठे खर्च और हिसाब किताब में गड़बड़ी नहीं करता। अगर छोटा दूकानदार दाल और चावल में मिलावट करता है तो बड़ा पूंजीपति घटिया उत्‍पाद बनाकर मुनाफा कमाता है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्‍यम जैसी बड़ी बड़ी साफ्टवेयर कंपनियों के मुनाफे का राज़ है उनके कर्मचारियों का भयंकर शोषण और उनकी मेहनत की लूट। सॉफ्टवेयर कंपनियों में 10-12 घंटे काम को सामान्‍य समझा जाता है और पगार 8 घंटे की दी जाती है। इन कंपनियों में कहा जाता है कि आने का समय तो तय है लेकिन जाने का समय मैनेजर और काम के अनुसार तय होता है। ओवरटाइम का कोई झंझट ये कं‍पनियां नहीं पालतीं बस आपको चाय कॉफी मिलती रहती है। चूंकि ये कंपनियां विदेशी ग्राहकों की सेवा करती हैं इसलिए मुद्रा में अंतर के कारण इन्‍हें भारी मुनाफा होता है और अपने कर्मचारियों को बाकी उद्योगों की तुलना में बेहतर पगार देने के बाद भी इनका मुनाफा जबरदस्‍त होता है। साफ्टवेयर और कॉल सेंटर में काम करने वालों की जिंदगी कोल्‍हू के बैल के जैसी होती है। जिंदगी और बाहरी दुनिया से कटे ये नौजवान बहुत कम उम्र में ही अलगाव, डिप्रेशन और अन्‍य मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।

यह सब कुछ सामान्‍य माना जाता है और अनैतिक नहीं समझा जाता। राजू भी जब यह सब कर रहा था तब उसे अनैतिक नहीं समझा गया। राजू की गलती बस यही रही कि वह अपनी सीमा से बाहर चला गया और नियंत्रण खो बैठा। पर जो खुद ही अनैतिक हैं, जो खुद ही ये सारे गलत धंधे करते हैं वे राजू को किस आधार पर अनैतिक कह रहे हैं। क्‍या हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष, फिक्‍की और एस्‍सोचैम के लोग जो राजू को अनैतिक कह रहे हैं वे यह मानते हैं कि बाकी सभी दूध के धुले हैं। वास्‍तव में सबकी सच्‍चाई सभी जानते हैं लेकिन आपसी समझदारी के नाते कोई मुंह नहीं खोलता जब तक कि समस्‍या इस हद तक न बढ़ जाए कि उसे छुपाए रख पाना संभव ही न हो सके।

असल में पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में नैतिकता और अनैतिकता का कोई भेद नहीं होता। जो चीज मुनाफा दे वह नैतिक होती है। यहां लूट, डकैती, भ्रष्‍टाचार सब जायज है। और यह अपने दायरे में सभी को समेट लेती है। हर छोटे बड़े व्‍यवसायी को ईमान धर्म बेचकर बस मुनाफा कमाना होता है। इसलिए चूंकि हमाम में सभी नंगे होते हैं और एकदूसरे की असलियत से वाकिफ होते हैं कोई दूसरे पर उंगली नहीं उठाता। जब पानी सर से गुजरने लगता है तब किसी न किसी को बलि का बकरा बनना पड़ता है ताकि लोगों का भरोसा इस व्‍यवस्‍था में बनाए रखा जा सके। राजू के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का बस यही मतलब है कि निवेशकों का विश्‍वास भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था से टूट न जाए। सिर्फ एक राजू की वजह से लूट के इस पूरे कारोबार पर ही खतरा न मंडराने लगे। हमारे देश को चलाने वाले पूंजीपतियों और उनकी सरकार की बस यही मंशा है। नैतिकता और ईमान धर्म से तो खुद उनका दूर दूर तक का कोई वास्‍ता नहीं है।

Monday, January 26, 2009

आधी अधूरी आजादी, लूला लंगड़ा गणतंत्र।

ये कैसी आजादी है, ये किसकी आजादी है

जनता के हिस्‍से में केवल लूट और बर्बादी है।

जनवरी 1950 को आज के दिन हमारे महान देश का महान संविधान लागू हुआ। इस संविधान की महानता यह थी कि इसे देश देश के महज 15 प्रतिशत मध्‍यवर्ग, उच्‍च मध्‍यवर्ग, अंग्रेज परस्‍त जगीरदारों, जमींदारों, नवाबों, राजाओं और व्‍यापारियों के प्रतिनिधियों ने मिलकर बनाया था। उससे भी ज्‍यादा तारीफ की बात यह थी कि दुनिया भर के संविधानों से से जोड़-जुगाड़कर तैयार किया गया यह संविधान मूलत: उन्‍हीं नियमों-कानूनों पर आधारित था जो अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे थे। कल तक अंग्रेजों की चापलूसी करते आ रहे कायर-नपुंसक राजे-रजवाड़े, क्रान्तिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही देने वाले गद्दार, जनता पर जुल्‍म करने वाले जमींदार और जागीरदार और अपने ही लोगों पर लाठी-गोली बरसाने वाली पुलिस और सेना सब पहले की तरह शासन करते रहे। लेकिन बात इतनी ही नहीं थी, हमारे महान देश की महानता तो यह थी कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर करने वाले क्रान्तिकारियों पर देश की आजादी के बाद भी कई वर्षों तक मुकदमें चलाए जाते रहे। शान्ति के दूत महात्‍मा गॉंधी को भी इस बात से कोई ऐतराज नहीं था।

यह आजादी मुट्ठी भर धनिकों की

लड़कर हासिल करनी होगी सही आजादी श्रमिकों की।

जैसा कि भगतसिंह ने कहा था आजादी के बाद गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों का शासन आ गया और जनता की बुनियादी हालत में कोई बदलाव नहीं हुआ। लूट, शोषण, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई, भूख, कुपोषण आजादी के ये तोहफे जनता की झोली में आ गिरे। आजादी के बाद कई वर्षों तक अपने ही देश की फौज अपने ही देश के किसानों और मजदूरों का खून बहाती रही। तेभागा-तेलंगाना, पुनप्रा-वायलार, मलाबार तक किसानों, मजदूरों का खून बहाने में नेहरू और पटेल की सरकार अंग्रेजों से पीछे नहीं रही। सार्विक मताधिकार का झुनझुना थमा दिया गया पर लोगों की चेतना उन्‍नत करने का कोई प्रयास नहीं किया गया जिसके कारण यह झुनझुना आज तक एक झुनझुना ही बना रह गया। ज्‍यों ज्‍यों भारतीय शासक वर्ग का जनविरोधी और पूंजीपरस्‍त चरित्र उजागर होता गया समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्‍यों का उसी तेजी से ह्रास होता गया। आजादी की लड़ाई के दौर में जो भी प्रगतिशील संस्‍कार और संस्‍थाएं खड़ी की गई थीं, पूंजी और बाजार ने उन्‍हें इस तरह पतित और भ्रष्‍ट कर दिया कि आज सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्‍त से लोगों को हैरानी तक नहीं होती है। बल्कि हैरानी तो इस बात पर होती है कि इसके बावजूद सबकुछ चल रहा है। वैसे इसके पीछे भी कोई रहस्‍य नहीं है क्‍योंकि अगर भले ही घिसते-पिटते लेकिन अगर सबकुछ चलेगा नहीं तो आखिर लूटेंगे क्‍या। यह सबकुछ चलाते रहना भी लुटेरों की एक मजबूरी है।

मजेदार बात तो यह भी है कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने वालों को विदेशी पूंजी से कोई ऐतराज नहीं है उल्‍टा वे तो विदेशी राज का बखान भी करते हैं और कहते हैं कि सरकार आप तो बहुत अच्‍छे थे आप चले क्‍यों गए, वापस चले आइए, अपनी पूंजी के टुकड़े हमारी तरफ उछालिए, हमें गुलामी की ऐसी आदत पड़ गई है कि हम अपनी मां को भी अंग्रेजी संबोधन से पुकारते हैं। हमारे देश की अरबों करोड़ों जनता अपने खून पसीने से आपको मालामाल कर देने को लालायित है.....प्‍लीज आइए और हमें लूटिए।

जिस विदेशी गुंडे के ऊपर उसके देश के और दुनिया भर के लोग थूकते और जूता मारते हैं हमारे देश का प्रधानमंत्री कहता है कि भारतीय उसे प्‍यार करते हैं।

राष्‍ट्रीय गर्व और राष्‍ट्रीय भावना का आलम यह है कि आज के महान दिन जिस इंडिया गेट पर देश के गौरव का बखान किया जाता है वह देश की आजादी के लिए मरने वाले सेनानियों का नहीं बल्कि अंग्रेजों की भाड़े की नौकरी करने वाले सैनिकों की याद में बनाया गया है।

हमारे महान देश की महान सभ्‍यता और संस्‍कृति के स्‍तुतिगान में महापुराण लिखे जा सकते हैं। हमें दो चार श्‍लोकों और छंदों के अलावा भले कुछ न आए लेकिन हम अपने को दुनिया का गुरु कहते हैं। हमारी दो तिहाई आबादी भूखे पेट सोती है लेकिन हम सुजलाम सुफलाम धरती के निवासी हैं। हमारे सिर पर छत नहीं है लेकिन हम चांद पर महल बनाने चल पड़े हैं। हमारे लिए नारी सीता और सावित्री है तो फिर हम उसे दहेज के लिए क्‍यों न जलाएं। हम स्‍वदेशी स्‍वदेशी भी चिल्‍लाएंगे और विदेशी बैंकों में अपनी काली कमाई भी जमा करेंगे........ और अब तो हम विश्‍व महाशक्ति बनने जा रहे हैं। और ऐसा होते ही देखना हम इतिहास के पहिए को वापस घुमाकर पौराणिक काल में न पहुंचा दें तो कहना...........बच्‍चा बच्‍चा या तो राम का होगा या किसी काम का न होगा।।।

पर ऐसा होने वाला नहीं है....इतिहास का पहिया एक बार आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं घुमाया जा सकता.....और जब कोई ऐसी कोशिश करता है तो वह मानवता के लिए एक त्रासदी का ही निर्माण करता है।

इसके उलट इतिहास को आगे ले जाने वाली ताकतें भी तैयार हो रही हैं। इतिहास के अंत की घोषणाएं करने वाले आज डिप्रेशन के शिकार हैं। उनकी छक्‍के छूट रहे हैं और कल तक बड़बोलापन करने वाले आज कहीं कोने में मिमिया रहे हैं।

Wednesday, December 17, 2008

अगर दुनिया में एक ही जाति, धर्म, नस्‍ल, राष्‍ट्रीयता के लोग हों, तो क्‍या हिंसा/आतंकवाद खत्‍म हो जाएगा ।

हिंसा या आतंकवाद के लिए एक सभ्‍य समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। और जब तक समाज में हिंसा मौजूद है तबतक सभ्‍य समाज बनाया भी नहीं जा सकता है। समाज में हिंसा तब भी थी जब दुनिया का कोई धर्म पैदा नहीं हुआ था इसलिए हिंसा (या आतंकवाद जो हिंसा का ही एक रूप है) को किसी एक धर्म या सभी धर्मों से भी जोड़कर नहीं देखा जा सकता। धर्म नहीं होते तो भी हिंसा/आतंकवाद रहता। लेकिन यह कोई इतना छोटा मसला भी नहीं है कि आनन-फानन में इसके बारे में भावनात्‍मक आवेग में आकर और बिना कुछ सोचे विचारे कोई समाधान प्रस्‍तुत कर दिया जाए। सच्‍चाई यह है कि हिंसा का विरोध करने वाले यहां भी अपने निजी हितों को ही ऊपर रखते हैं।
मिसाल के लिए रतन टाटा को ही ले लीजिए। आजतक जब तक कि 'सिस्‍टम' ने रतन टाटा को तमाम वैध-अवैध तरीकों से व्‍यवसाय फैलाने, मुनाफा लूटने, श्रमिकों की मेहनत लूटने की इजाजत और खुली छूट दे रखी थी तब तक आज के युवाओं के आदर्श रतन टाटा जी को सिस्‍टम पर पूरा भरोसा था। ऐसा तो नहीं कि देश में इसके पहले कभी हिंसा हुई ही नही थी, पर रतन टाटा चुप रहे। और जब उनके अपने होटल पर हमला हुआ (ऐसा होटल जिसमें भारत की 99.5 प्रतिशत जनता घुस भी नहीं सकती थी), तो टाटाजी ने बयान दे डाला कि हमें सिस्‍टम पर भरोसा नहीं है, हम अपनी सुरक्षा स्‍वयं करेंगे (टाइम्‍स आफ इंडिया, 17 दिसंबर, 08)। बिल्‍कुल कर सकते हैं, क्‍योंकि आप ऐसी सुरक्षा अफोर्ड कर सकते हैं, पर देश की 99 प्रतिशन जनता तो नहीं अफोर्ड कर सकती। अगर यह सिस्‍टम रतन टाटा जैसे देश के 'रतन' की सुरक्षा नहीं कर सकता तो आम आदमी के बारे में कहना ही क्‍या है।
समाज में हिंसा तभी से मौजूद रही है जबसे समाज शोषकों और शोषितों में विभाजित हुआ। यह हिंसा विकृत सामाजिक व्‍यवस्‍था का एक बाइप्रोडक्‍ट है। यह समाज रूपी शरीर को लगी बीमारी का एक लक्षण भर है, यह अपने आप में पूरी बीमारी नहीं है। और यदि शरीर को ठीक करना है तो इलाज इस बीमारी के लक्षणों का नहीं बल्कि बीमारी का करना होगा।
आज समाज में जो हिंसा व्‍याप्‍त है उसके कई रूप हैं और कई कारण भी। लेकिन हिंसा का विरोध करने वाले अधिकतर लोग एक तरह की हिंसा का विरोध तो करते हैं मगर अन्‍य प्रकार की हिंसा पर चुप्‍पी साधे रहते हैं। जापान पर दो एटम बम गिरा चुका अमेरिका आज विश्‍व मंच पर शान्ति की बात करता है और गुआंतानामो बे और अबु घरेब में अमानवीय कृत्‍य अंजाम देता है। सच्‍चाई यह है कि अपने आर्थिक, राजनीतिक, व्‍यक्तिगत, धार्मिक, जातिगत, नस्‍लीय या लैंगिक स्‍वार्थपूर्ति के लिए दूसरों पर जोर-जबरदस्‍ती करना ही हर प्रकार की हिंसा का मूल स्रोत है। चूंकि पूंजीवादी समाज किसी भी तरीके से स्‍वार्थपूर्ति करने को जायज समझता है और इसी सिद्धान्‍त पर आधारित है इसलिए पूंजीवादी समाज में हिंसा भी अधिक होती है।
हर शासक वर्ग हिंसा को अपने हितों के अनुरूप परिभाषित करता है। इसलिए भारत में जहां औसतन 2 लोगों के रोज आतंकवादी गतिविधियों में मारे जाने पर भयंकर हाय तौबा मचती है उसी भारत में पुलिस हिरासत में रोज 4 लोगों के मरने और काम के दौरान होने वाली घटनाओं और बीमारियों से रोज मरने वाले 1095 लोगों के बारे में न तो मीडिया में कोई जगह मिलती है, न तो मानवतावादी ब्‍लॉगर उसपर कुछ लिखते हैं। हमारे महान देश में भूख और कुपोषण से हर दिन हजारों लोग मरते हैं, पांच वर्ष से कम आयु वाले बच्‍चों में शिशु मुत्‍यु दर 76 प्रतिशत है। लेकिन इन आंकड़ों से हमें कोई कष्‍ट नहीं होता। क्‍योंकि हमारा एजेंडा तो हिंसा को धार्मिक रंग देना और राजनीतिक लाभ हासिल करना है। पर क्‍या सिर्फ हिंसा/आतंकवाद खत्‍म हो जाने से भूख और कुपोषण भी खत्‍म हो जाएगा, मजदूरों को सरकार द्वारा तय न्‍यूनतम वेतन मिलने लगेगा, दहेज के लिए औरतों को जलाना और कन्‍या शिशुओं की भ्रूण हत्‍या खत्‍म हो जाएगी, सबको शिक्षा, रोजगार और सम्‍मान से जीने का हक मिल जाएगाए जातिगत, भाषाई और क्षेत्रीय असामनताएं दूर हो जाएंगी।

नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा..... लेकिन इतना जरूर है कि अगर ये सब बुराइयां खत्‍म की जाएं या इस दिशा में प्रयास किया जाए तो हिंसा या आतंकवाद जरूर खत्‍म हो जाएगा या बहुत कम रह जाएगा।

ब्‍लाग की एक पोस्‍ट में इस समस्‍या के सभी पहलुओं पर नहीं लिखा जा सकता। इस मुद्दे पर अधिक विस्‍तार से पढ़ने के लिए राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित एक पुस्तिका 'आतंकवाद के बारे में : विभ्रम और यथार्थ' अवश्‍य देखें।

Tuesday, December 16, 2008

सरकार यानी पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी

एक ट्रेंड के तौर पर यह पहले से ही नजर आने लगा था लेकिन जो लोग प्रवृत्तियों और रुझानों को पर्याप्‍त तथ्‍यों के प्रकाश में ही समझ पाते हैं अब तो उनके सामने भी यह लगातार अधिक से अधिक साफ होता जा रहा है कि पूंजीवादी जनतंत्र के इस तमाशे में वही सफल हो सकता है जिसकी झोली में सबसे अधिक पूंजी हो।
पांच राज्‍यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मीडिया में (टाइम्‍स आफ इंडिया) बहुत प्रमुखता से यह खबर प्रकाशित हुई कि इन विधानसभा चुनावों में ज्‍यादातर उम्‍मीदवार और सफल प्रत्‍याशी करोड़ों के स्‍वामी हैं। दिल्‍ली विधानसभा के लगभग सारे ही विधायक लखपति या करोड़पति हैं। पांचों राज्‍यों जिनमें अभी विधानसभा चुनाव हुए हैं में देखें तो 40 प्रतिशत सीटें करोड़पति प्रत्‍याशियों ने जीती हैं। 5 लाख प्रतिवर्ष से कम आय वाले 3 प्रतिशत से भी कम उम्‍मीदवारों ने चुनाव में सफलता प्राप्‍त की। दिल्‍ली विधानसभा में औसत निकालें तो प्रत्‍येक विधायक के पास 2.86 करोड़ की संपत्ति है। यही बीजेपी और कांग्रेस के विधायकों का भी औसत है। वहीं छत्तीसगढ़ विधानसभा का हर दूसरा विधायक 3 करोड़ की परिसंपत्तियों का मालिक है।
सिर्फ तथ्‍यों की ही बात करें तो आंकड़ें बताते हैं कि यदि आपके पास 5 करोड़ से अधिक की संपत्ति है तो आपके चुनाव जीतने की संभावना 50 प्रतिशत हो जाती है। कम आय वालों के लिए यह संभावना उनकी आय के हिसाब से ही कम होती जाती है।
यह ट्रेंड कोई नई बात नहीं है लेकिन मीडिया में इसको अब जगह मिली क्‍योंकि अब आंकड़े इतने सनसनी फैलाने वाले हो गए हैं कि इन्‍हें पहले पन्‍ने पर देकर अखबार की रेटिंग बढ़ाई जा सकती है। वर्ना यह तो सभी जानते हैं कि संसद और विधानसभाओं में हर पूंजीपति की अपनी एक लॉबी होती है और यह भी सब जानते हैं कि कौन सांसद या विधायक किस पूंजीपति के हित साधता है। यह अनायास नहीं है कि अनिल अंबानी और विजय माल्‍या जैसे पूजीपति स्‍वयं सांसद बनते हैं। अब इसमें कुछ समझने लायक नहीं बचा है कि हमारे सम्‍मानित सांसद और विधायक या तो स्‍वयं पूंजीपति हैं या पूंजीपति बनने की राह पर हैं और इसलिए इससे यह एक सरल सा निष्‍कर्ष भी निकलता है कि उनके हित पूंजीपतियों के हितों के साथ्‍ा नत्‍थी हैं। चाहे वे किस भी जाति धर्म के हों लेकिन उनका वर्ग एक है - पूंजीपति वर्ग। और उनका काम भी एक ही है अपने वर्ग की उन्‍नति के बारे में सोचना और काम करना।
समानता, स्‍वतंत्रता और भाईचारे के जिस नारे के साथ पूंजीपति वर्ग सत्ता में आया था उसका मतलब सिर्फ यह रह गया है कि पूंजीपतियों के बीच की समानता, देश और देश की जनता को लूटने की स्‍वतंत्रता और इस लूट के निजाम को बनाए रखने के लिए शोषकों का आपसी भाईचारा। देश की तीन चौथाई आबादी के लिए समानता, स्‍वतंत्रता और भाईचारे की पोल तभी खुल जाती है जब चौराहे पर खाकी वर्दी डाले कोई पुलिसवाला उसको जब-तब मां-बहन की सुना देता है। आम आदमी चोर बदमाशों से उतना नहीं डरता जितना कि पुलिस से। ऐसा इसलिए नहीं है क्‍योंकि नौकरशाही में कुछ भ्रष्‍ट लोग आ गए हैं बल्कि इसलिए है क्‍यों‍कि नौकरशाही लोगों की सेवा के लिए है ही नहीं। नौकरशाही का काम तो पूंजीपति वर्ग के हितों की हिफाजत करना और उसके पक्ष में न्‍याय-कानून का प्रयोग करना है। बाकी जनता के लिए तो कोर्ट कचहरी और सरकारी दफ्तर बस दिखावे की चीजें हैं।
कहने की कोई जरूरत नहीं कि देश की संसद और विधानसभाएं आम लोगों के हितों की रक्षा नहीं करते और न ही आम जनता को उनसे कोई अपेक्षाएं पालनी चाहिए। पूंजीवादी धनतंत्र में पूंजी का नंगा खेल अब उस हद तक बढ़ चुका है (और इसे बढ़ते ही जाना है) कि इस व्‍यवस्‍था को सुधारने की कोई उम्‍मीद बाकी नहीं रह गई है।

Sunday, November 30, 2008

सर्वहारा के महान शिक्षक फ्रेडरिक एंगेल्‍स (जन्‍मदिन 28 नवंबर) की याद में

गत 28 नवंबर को सर्वहारा वर्ग के महान शिक्षक और सर्वहारा वर्ग को उसकी मुक्ति के सिद्धान्‍त से लैस करने वाले तथा आधुनिक वैज्ञानिक समाज का विज्ञान विकसित करने में योगदान देने वाले महा मनीषी फ्रेंडरिक एंगेल्‍स का जन्‍मदिन था।
एंगेल्‍स का जन्‍म 28 नवंबर 1820 को प्रशा के राइन प्रांत के बारमेन नामक स्‍थान पर हुआ था। उनके पिता कारखोनेदार थे और घरवाले उन्‍हें भी इसी पेशे में धकेलना चाहते थे लेकिन एंगेल्‍स की रूचि विज्ञान और राजनिति शास्‍त्र के अध्‍ययन में थी। छोटी उम्र में ही वे हेगेल के क्रान्तिकारी विचार से प्रभावित थे कि ब्रह्मांड लगातार परिवर्तन और विकास की सतत प्रक्रिया से गुजर रहा है। एंगेल्‍स को उस समय की नौकरशाही की निरंकुशता से नफरत थी और वे जर्मनी के तरुण वामपंथी हेगेलवादियों के संपर्क में आए जो उस व्‍यवस्‍था को बदलना चाहते थे। प्रश्‍न यह था कि यदि हर चीज बदलती है तो निरंकुश राज्‍यव्‍यवस्‍था जो महज कुछेक लोगों को सुख सुविधाएं प्रदान करती है जबकि जनता की भारी आबादी को नरक जैसे हालात में जीने को मजबूर करती है उसे भी बदलना चाहिए।
लेकिन अभी एंगेल्‍स समाजवादी नहीं बने थे। 1844 में उनकी मुलाकात कार्ल मार्क्‍स से हुई और उसके बाद उनकी मित्रता अटूट बनी रही। यह विचारों पर आधारित एक उन्‍नत धरातल की मित्रता थी। मार्क्‍स और एंगेल्‍स ने सबसे पहले यह दिखलाया कि मेहनतकश वर्ग और उसकी मांगें वर्तमान आर्थिक व्‍यवस्‍था का अनिवार्य परिणाम हैं। उन्‍होंने पहली बार इस सिद्धान्‍त का निरूपण किया कि समाजवाद कोई कल्‍पना नहीं बल्कि एक सुसंगत विज्ञान है और प्रकृति के सभी नियम इसकी पुष्टि करते हैं। और मानव समाज को विनाश से बचाना कुछेक सह्रदय व्‍यक्तियों के बस का काम नहीं है बल्कि मेहनतकश वर्ग का संगठित संघर्ष ही मानवता को समस्‍त कष्‍टों से मुक्‍त कर सकता है। मानवजाति का अबतक का लिखित इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है जिसमें एक वर्ग बल के द्वारा दूसरे पर अपना प्रभुत्‍व कायम करता है और ऐसा तबतक चलता रहेगा जब तक कि वर्ग संघर्ष और वर्ग सत्ता का बुनियादी कारण यानि निजी संपत्ति की व्‍यवस्‍था बनी रहेगी। वर्ग संघर्ष ही मानव समाज को आगे बढ़ाने की कुंजी है।
1848 में सिर्फ 28 वर्ष की आयु में मार्क्‍स के साथ मिलकर एंगेल्‍स ने सर्वहारा वर्ग की पार्टी, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का घोषणापत्र तैयार किया और इस सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया कि वर्ग समाज से वर्ग विहीन (कम्‍युनिस्‍ट) समाज में प्रवेश करने से पहले मानवता को एक लंबे संक्रमण के दौर से गुजरना होगा जिसमें मेहनत करने वाली बहुलांश आबादी का मेहनत की लूट करने वाली शोषक आबादी पर तानाशाही होगी। तब से लेकर आजतक यह पुस्‍तक सर्वहारा वर्ग की सबसे अच्‍छी दोस्‍त और मार्गदर्शिका बनी रही है। दुनिया की समस्‍त भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है और यह दुनिया की सबसे अधिक बिकने वाली पुस्‍तकों में से एक है।
एंगेल्‍स की तीक्ष्‍ण मेधा और उनकी विदग्‍धता ने अपने समय के सभी बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया। विज्ञान और दर्शन के अतिरिक्‍त साहित्‍य और कला के क्षेत्र में भी उन्‍होंने अमूल्‍य योगदान किया। अपने पूरे जीवनकाल में (मृत्‍यु 5 अगस्‍त 1895) वे न सिर्फ लिखते पढ़ते ही रहे बल्कि सर्वहारा के संघर्षों में भी लगातार भागीदारी करते रहे और सर्वहारा क्रान्ति के विज्ञान को पथभ्रष्‍ट करने वाले बुद्धिजीवियों के खिलाफ अंतहीन संघर्ष करते रहे। मार्क्‍स की मृत्‍यु के बाद वे आधुनिक सर्वहारा वर्ग के सबसे विद्वान शिक्षक और नेता थे। लेकिन उन्‍होंने हमेशा अपने आप को मार्क्‍स का सहायक ही माना हालांकि मार्क्‍स की अनेक रचनाएं एंगेल्‍स के प्रत्‍यक्ष या परोक्ष योगदान के बिना पूरी नहीं हो पातीं।
मार्क्‍स और एंगेल्‍स की सबसे उन्‍नत दर्जे की वैचारिक मित्रता की याद में पूरे विश्‍व का सर्वहारा वर्ग 28 नवंबर को मित्रता दिवस के रूप में मनाता है। (शोषक वर्ग के नुमाइंदे इसे किसी और दिन मनाते हैं)सर्वहारा वर्ग को क्रान्ति के विज्ञान से लैस करने और जीवनपर्यन्‍त उसका मार्गदर्शन करने के लिए पूरी दुनिया का मेहनतकश समुदाय और उसके समर्थक फ्रेडरिक एंगेल्‍स को दिल से याद करते हैं और उनके प्रति सम्‍मान व्‍यक्‍त करते हैं।
दुनिया के मजदूरो एक हो
सर्वहारा के पास खोने के लिए सिर्फ अपनी बेड़ि‍‍यां हैं जीतने के लिए पूरी दुनिया है

Wednesday, October 22, 2008

ग्रेजियानो की घटना : छद्म मानवतावादियों के मुंह पर तमाचा मारती सच्‍चाईयां

ग्रेजियानो की घटना पर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जांच-पड़ताल से उभरे तथ्‍य।

22 सितम्बर की घटना और उसकी पृष्ठभूमि

सरलीकोन ग्रेज़ियानो ट्रांसमिशन इण्डिया इटली की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सबसिडियरी है। यहां बड़ी मशीनों के गियर, एक्सेल आदि बनाये जाते हैं। इसके अधिकांश उत्पाद अमेरिका-इटली के बाजारों में बिकते हैं। 2003 में 20 करोड़ से कम की पूंजी से शुरू की गयी इस कम्पनी की पूंजी 2008 में बढ़कर 240 करोड़ रुपये हो चुकी है। यह ज़बर्दस्त मुनाफ़ा मज़दूरों के भयंकर शोषण की बदौलत ही सम्भव हुआ था।

फैक्ट्री में 12-12 घण्टे की दो शिफ्टों में दिनों-रात काम होता था। ओवरटाइम अनिवार्य था और कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जाती थी। इसे मानने से इंकार करने वाले मज़दूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था। शुरू में 350 स्थायी मज़दूरों को आपरेटर-कम-सेटलर के तौर पर रखा गया था और 80 अप्रेंटिस/ट्रेनी थे। करीब 500 मज़दूर लेबर कांट्रैक्टरों के मातहत काम करते थे। पिछले कुछ सालों से बिना कारण बताये मज़दूरों की बीच-बीच में छँटनी की जा रही थी। उनको कोई ज्वॉयनिंग लेटर नहीं दिया जाता था। गलत ढंग से कार्ड पंच करके उनके वेतन और ओवरटाइम से भारी कटौती की जा रही थी। सवाल उठाने पर मैनेजरों की मार-गाली इनाम में मिला करती। इन हालात से तंग आकर पहले-पहल मज़दूरों ने नवम्बर 2007 में यूनियन बनाने की कोशिश शुरू की। इसकी भनक लगते ही कम्पनी ने 3 मज़दूरों के फैक्ट्री में घुसने पर रोक लगा दी और एक को बर्खास्त कर दिया। कानुपर स्थित रजिस्ट्रार कार्यालय ने भी कम्पनी मैनेजमेण्ट की शह पर तरह-तरह के हथकण्डों से यूनियन के गठन को लटकाये रखा।

दिसम्बर 2007 में मैनेजमेण्ट के रवैये के विरुद्ध आन्दोलन करने पर 100 और मज़दूरों को बाहर कर दिया गया। लम्बे आन्दोलन के बाद 24 जनवरी, 2008 को कम्पनी ने साप्ताहिक छुट्टी और 1200 रु. वेतनवृद्धि की बात मान ली। लेकिन इस समझौते के तुरन्त बाद कम्पनी ने स्थानीय ठेकेदारों के मातहत 400 नये मज़दूर ठेके पर रख लिये जो फैक्ट्री परिसर के भीतर ही रहते थे। 400 मज़दूरों के इस ''कैप्टिव फोर्स'' के दम पर इन ठेकेदारों ने पहले से काम कर रहे मज़दूरों को धमकाना शुरू कर दिया। इन ठेकेदारों ने मज़दूरों को आतंकित करने और उनके आन्दोलन से निपटने के लिए फैक्ट्री परिसर में लोहे की छड़ें, लाठियां और दूसरे हथियार भी इकट्ठा कर रखे थे। इसके साथ ही 150 सिक्योरिटी गार्डों के रूप में एक ठेकेदार के तहत गुण्डों की पूरी बटालियन खड़ी कर ली गयी।

400 नये भर्ती किये गये ठेका मज़दूर चूँकि 3 महीनों के दौरान मशीन ऑपरेट करना सीख गये थे इसीलिए चरणबद्ध तरीके से मज़दूरों को निकाला जाने लगा। 5 मई को कम्पनी ने 5 मज़दूरों की छँटनी कर दी। इन मज़दूरों को निकाले जाने का विरोध कर रहे 27 परमानेण्ट मज़दूरों को सस्पेण्ड कर दिया गया। इसके एक हफ्ते बाद ही 30 और मज़दूर निकाल बाहर किये गये। एकदम स्पष्ट था कि कम्पनी सोची-समझी रणनीति के तहत योजनाबद्ध तरीके से पुराने मज़दूरों से छुटकारा पाना चाह रही थी। मैनेजमेण्ट ने वर्कशाप के भीतर रिवर्स एग्ज़ॉस्ट पंखे बन्द करा दिये जिससे भीतर गर्मी बेहद बढ़ गयी। चारों ओर क्लोज़ सर्किट कैमरे लगा दिये गये थे और जो भी मज़दूर थोड़ी देर भी ढीला पड़ता दिखता उसे बाहर कर दिया जाता। मज़दूरों ने संबंधित अधिकारियों से शिकायत भी की लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

मज़दूरों ने डीएलसी और जिलाधिकारी के कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया। श्रममन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री को अपनी समस्या से अवगत कराया। उन्होंने इटली दूतावास तक अपनी बात पहुँचायी। लेकिन उनकी आवाज बहरे कानों पर पड़ रही थी। मज़दूरों को अलग-थलग पड़ता देख कम्पनी मैनेजमेण्ट ने दम्भ के साथ घोषणा की कि अगर प्रधानमन्त्री भी कहें तो भी तुम लोगों को काम पर वापस नहीं लेंगे। 2 जुलाई के दिन मैनेजमेण्ट ने बाकी बचे 192 मज़दूरों को भी काम से निकाल दिया। वस्तुत: कंपनी को इस दिन श्रमायुक्त के समक्ष हुए समझौते के अनुसार मज़दूरों को काम पर वापस रखना था! इस तरह कुल 254 मज़दूरों को सड़क पर धकेल दिया गया। कई महीनों से बेरोजगार मज़दूरों के सामने भुखमरी की नौबत पैदा हो गयी। कई लोगों को अपने घर का सामान तक बेचना पड़ा। मज़दूर ही नहीं श्रम विभाग के अधिकारियों तक का कहना है कि समझौते पर कई बार सहमत होने के बावजूद कम्पनी में वापस पहुँचते ही मैनेजमेण्ट के लोग उसे लागू करने से मुकर जाते थे।

22 सितम्बर को क्या हुआ?

एक बार फिर मज़दूरों ने श्रम विभाग का दरवाजा खटखटाया। मैनेजमेण्ट ने साफ तौर पर कहा कि 22 सितम्बर तक सभी मज़दूर कम्पनी में आकर माफीनामा लिखें तभी आगे की बात की जायेगी। मजबूर होकर मज़दूर 22 सितम्बर की सुबह 9 बजे फैक्ट्री गेट पर पहुँचे। उन्हें 3 घण्टे इन्तजार कराया गया। 12 बजे के बाद मज़दूरों को भीतर टाइम ऑफिस में बुलवाया गया जहां हथियारबंद सिक्योरिटी गार्ड और स्थानीय गुण्डे पहले से तैनात थे। वहां मौजूद एक मैनेजर ने मज़दूरों से कहा कि वे कम्पनी को हुए नुकसान और तोड़फोड़ के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हुए माफीनामे पर दस्तखत करें तभी उन्हें वापस लिया जायेगा। इस पर एक मज़दूर ने प्रतिवाद करते हुए कहा ''जब हम लोगों ने कोई तोड़फोड़ की ही नहीं तो माफीनामे में ऐसा क्यों लिखें?'' इस पर अनिल शर्मा नाम के एक टाइम ऑफ़िसर ने मज़दूर को थप्पड़ मार दिया। दोनों में झगड़ा हुआ और सिक्योरिटी वालों ने मज़दूरों को पीटना शुरू कर दिया।

भीतर से हल्ला-गुल्ला सुनकर बाहर मौजूद मज़दूर भीतर दौड़ पड़े। मज़दूरों को रोकने के लिए एक मैनेजर ने सिक्योरिटी गार्डों और गुण्डों को मज़दूरों पर हमला करने का आदेश दे दिया। एक सिक्योरिटी गार्ड ने मज़दूरों पर गोली भी चलायी। इस मारपीट में 34 मज़दूर घायल हो गये। इस दौरान बिसरख थाने के एस.एच.ओ. जगमोहन शर्मा पुलिस बल के साथ मौजूद रहे लेकिन मालिकान की शह पर उन्होंने कुछ नहीं किया। बाद में पुलिस ने दोनों तरफ के लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन मैनेजमेण्ट के लोगों को तो छोड़ दिया गया जबकि मज़दूरों को जेल भेज दिया गया।

इसी अफरा-तफरी में सीईओ एल.के. चौधरी के सिर में भी चोट लगी और अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चौधरी के परिजनों का कहना है कि उनकी हत्या किसी व्यावसायिक रंजिश के तहत की गयी है, मज़दूरों ने उन्हें नहीं मारा।

लेकिन नियमित कर्मचारियों की छुट्टी करने पर आमादा मैनेजमेण्ट को एक बहाना मिल गया। स्थानीय उद्योगपति, कारपोरेट मीडिया, नौकरशाही सब मिलकर मज़दूरों को बदनाम करने और दोषी ठहराने में जुट गये। 63 मज़दूरों पर सीईओ की हत्या की साजिश रचने और उन्हें मारने का इल्जाम लगाया गया जबकि 72 अन्य पर बलवा करने और शान्ति भंग करने की धाराएं लगा दी गयीं। कई दिनों तक प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ऐसी ख़बरें आती रहीं कि ''मज़दूरों ने बर्बरतापूर्वक पीट-पीटकर सी.ई.ओ. की हत्या कर दी''

घटना के तुरन्त बाद उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार उद्योगपतियों के पक्ष में सक्रिय हो गयी। 26 सितम्बर को दिल्ली में बुलायी गयी विशेष बैठक में मायावती ने पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को मज़दूरों के साथ सख्ती से निपटने के निर्देश दिये। मुख्य सचिव और एडीजी (कानून-व्यवस्था) ने नोएडा में कैम्प ऑफिस बनाकर उद्योगपतियों के ''दुखड़े'' सुनना शुरू कर दिया। किसी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मज़दूरों की क्या शिकायतें हैं। सरकार के रवैये से ऐसा लगता है जैसे ''औद्योगिक अशान्ति'' के सारे मामले महज़ कानून-व्यवस्था के मसले हैं और इसके लिए मज़दूर ही दोषी हैं। इन्हीं से निपटने के लिए सरकार ने आनन-फानन में नोएडा के औद्योगिक इलाकों के लिए तीन नये डीएसपी भी तैनात कर दिये। श्रम कार्यालय को लगभग दरकिनार करते हुए सरकार ने ''औद्योगिक सम्बन्ध समिति'' का गठन करके औद्योगिक विवादों के सम्बन्ध में तमाम कार्यकारी अधिकार उसे सौंप दिये हैं। इस समिति में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों के सी.ई.ओ. के अलावा जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं। मालिकान के हौसले इतने बुलन्द हैं कि ग्रेटर नोएडा एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज़ के अध्यक्ष के मुताबिक सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया है कि श्रम कार्यालय द्वारा किसी भी उद्योगपति के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने से पहले उन्हें सूचना दी जायेगी। बिल्कुल साफ है कि केन्द्र की यूपीए सरकार और उ.प्र. की मायावती सरकार राजनीति के मैदान में एक-दूसरे से चाहे जितना झगड़ें, श्रम-शक्ति को लूटने में देशी-विदेशी पूंजीपतियों के लठैत बनकर उनकी मदद के लिए किसी भी हद तक चले जाने के मामले में दोनों में कोई अंतर नहीं है।

कुछ सामाजिक तथा मज़दूर संगठन ग्रेजियानो के मज़दूरों को न्‍याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए तथा इस मुहिम से जुड़ने के लिए संपर्क करें:

tapish.m@gmail.com

grazianoworkerssolidarity@yahoo.com

फोन : तपिश - 9891993332