Wednesday, April 21, 2010

नैतिकता पर महान वैज्ञानिक नील्‍स बोर के विचार।

नील्‍स बोर सिर्फ एक महान वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि अपने समय के महान सिद्धान्‍तकार और दार्शनिक भी थे। एक बार उन्‍होंने बताया कि अपने विद्यार्थी जीवन में वे दर्शन पर कुछ लिखने को लालायित थे। क्‍वाण्‍टम भौतिकी की एक किताब से यह उद्धरण प्रस्‍तुत कर रहा हूं :

वास्‍तव में वे (नील्‍स बोर) स्‍वतंत्र इच्‍छा की समस्‍या का गणितीय समाधान खोज रहे थे। यदि प्रकृति में सब कुछ पूर्वनिश्चित है और मनुष्‍य अपनी इच्‍छा को क्रियान्वित करने के‍ लिए स्‍वतन्‍त्र नहीं है तो कोई भी नैतिक मानदण्‍ड अर्थहीन हैं; चूंकि मनुष्‍य अपने व्‍यवहार में स्‍वतन्‍त्र नहीं है तो विवेक और नैतिकता की बात करना निराधार है। लेकिन यदि स्‍वतन्‍त्र इच्‍छा है तो शास्‍त्रीय नियतिवाद के साथ कोई कैसे इसका सामंजस्‍य कर सकता है, जिसके अनुसार प्रकृति में हर चीज विशुद्ध आवश्‍यकता द्वारा नियन्त्रित होती है।

उनकी जीवनी के सिर्फ इस तथ्य से हम शास्‍त्रीय नियतिवाद, यानी ब्रह्मांड में घटनाओं की पूर्वनिर्धारकता की अवधारणा के विध्‍वंस में उनकी भूमिका का अनुमान लगा सकते हैं।
(क्‍वाण्‍टम जगत की संभाव्‍यताएं - दानियल दानिन)

Thursday, March 11, 2010

संविधान के निर्माताओं को चार बच्‍चों की तरफ से खुला पत्र।

परम आदरणीय संविधान निर्माताओ,
सुना था कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है। हम सोचते थे बड़ा होगा तो भारी-भरकम भी होगा। मगर कितना भारी होगा इसका अहसास चन्‍द दिन पहले ही हो सका। इसमें लिखित कानून के एक छोटे से उपवाक्‍य और उसे लागू करने वाले एक अदना से कारिन्‍दे ने हमें संविधान की ताकत का ऐसा अहसास कराया कि जिन्‍दगी भर के लिए उसका भय और उसके प्रति श्रद्धा हमारे अन्तस्‍तल में समा गयी।
लोग कहते थे खुदा की इज्‍जत करो या न करो मगर कानून की इज्‍जत करो। कानून से डरो। हम सोचते थे कानून क्‍या हिटलर है जिससे डरने की जरूरत हो। पर हम नादान थे। हमें माफ करना।
पाश कहते थे 'यह किताब मर गई है'। हमने कभी फिक्र ही नहीं किया कि मरी है या जिन्‍दा है। मगर बुलाओं पाश को और हमें दिखाकर पूछो कि अगर यह किताब मर गई है तो खाकी रंग के कपड़े में इतना गुरूर कहां से आया।

हे श्रेष्‍ठजनो, हे महापुरुषो।
अगली बार जब हम परीक्षा में बैठेंगे और हमसे संविधान के बारे में पूछा जाएगा तो हम प्रत्‍यक्ष अनुभव से अर्जित समस्‍त संवेदना और आवेग के साथ उसका गुणगान करेंगे। हम उस एक-एक बुनियादी अधिकार की सोदाहरण व्‍याख्‍या करेंगे जिसकी अमिट छाप उस सर्वशक्तिमान डण्‍डे ने हमारी पीठ पर उकेरी है। हम उस डण्‍डे के आभारी है और आपके भी जिन्‍होंने उस डण्‍डे में इतनी ताकत सौंपी। हे परमपूज्‍यो, संविधान प्रदत्त शक्ति से अघाए-बौराए और कानूनी मान्‍यता के घमंड में चूर उस डण्‍डे की महिमा का बखान हम शब्‍दों में नहीं कर सकते। हम नादान हैं, हमारे पास तो सिर्फ अहसास हैं। और कानून अहसास नहीं शब्‍द मांगता है।

हे महाऋषियो,
हम तो आपके रचित संविधान के टेढ़े-मेढ़े वाक्‍यों को पढ़ भी नहीं सकते, समझना तो दूर की बात है। हमें तो उनके कॉमा और फुलस्‍टॉप से भी डर लगता है। पता नहीं कब कौन सा कॉमा और फुलस्‍टॉप हमें फिर हवालात की सैर करा दे। और हम तो शिकायत भी नहीं कर सकते। क्‍योंकि तुमने हमारे ही द्वारा इस संविधान को हमें 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्‍मार्पित' करवा दिया है। अब अगर हमारा ही कानून हमारे ऊपर लागू किया जा रहा है तो हम शिकायत करें भी तो किस मुंह से और किससे। यह दीगर बात है कि संविधान को हमसे 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्‍मार्पित' करवाने से पहले कभी हमसे और हमारे बाप-दादाओं से पूछा भी नहीं गया। हमें तो बताने की जरूरत भी नहीं समझी गई। हमें तो यह मालूम करने के लिए हवालात जाना पड़ा। तुम कितने दूरदर्शी थे महापुरुषों, तुम्‍हें हवालात की जरूरत का अहसास उसी समय हो गया था।

हे ज्ञानियों में ज्ञानी, परमज्ञानी बाबा साहेब अंबेडकर,
आपने कहा था कि यह दुनिया का सबसे बढि़या संविधान है। अगर यह संविधान भी लोगों को ठीक नहीं कर सकता तो फिर लोगों में ही कोई खराबी है। क्‍योंकि संविधान में खराबी की गुंजाइश है ही नहीं।
बाबा साहेब आपने कहा। हमने माना। साठ साल से आपका कहा रटते रहे। अब तो विश्‍वास भी हो गया। हमारी पीठ को ही कोई चुल्‍ल उठी होगी। वरना डंडे में खराबी की कोई गुंजाइश ही कहां है। डण्‍डे के लिए तो सब बराबर हैं। समानता के अधिकार की असली व्‍याख्‍या तो पुलिस का डण्‍डा ही कर सकता है। वह बरसता है तो बस बरसता ही चला जाता है जबतक कि कानून का राद्दा न जमा दे। बस नहीं बरसता तो उन लोगों पर जिनके पोस्‍टर लगते हैं। जिनकी मूर्तियां बनती हैं। जो डण्‍डे को नाप सकते हैं, तौल सकते हैं, खरीद और बेच सकते हैं।

हे परम श्रद्धेय आधुनिक परमपिताओ,
हम अज्ञानियों को क्षमा करना। हमारे अज्ञान के कारण ही तो संविधान बनाने में हमारी राय नहीं ली गई। ज्ञान खरीदने की कूव्‍वत रखने वाले 15 प्रतिशत लोगों ने यह पवित्र ग्रन्‍थ हमें सौंपा है। हमें इस जिम्‍मेदारी को समझना है। इसका बोझ अपने कन्‍धे पर उठाना और उठाये रखना ही हमारा परम कर्तव्‍य है। हमारे उद्धार का और कोई मार्ग नहीं है। बाबा साहेब की उठी हुई उंगली इसी मार्ग की तरफ इशारा करती है।

परम श्रद्धा और अन्‍धभक्ति के साथ,
-- चार अज्ञानी

(उत्तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती के पोस्‍टर को बदरंग करने के कथित आरोप में एक पुलिस अधिकारी ने चार बच्‍चों को कई दिन तक हवालात में रखा था जबकि उनकी परीक्षाएं चल रही थीं। असलियत यह थी कि अपने किसी रिश्‍तेदार के बच्‍चे का उस स्‍कूल में दाखिला न होने से जिसके वे चारों बच्‍चे छात्र थे, अधिकारी महोदय ने खुन्‍नस निकालने के लिए यह कार्रवाई की थी। पुलिस अधिकारी की इस अनैतिक कार्रवाई से संविधान के किसी भी नियम कानून का उल्‍लंघन नहीं हुआ और उसपर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई (जहां तक मुझे ज्ञात है)। प्रश्‍न यह है कि हमारे देश का यह कैसा संविधान है जो इसप्रकार की हरकत होने देता है। क्‍या इसकी कोई गारंटी है कि आगे से ऐसा नहीं होगा। संविधान के पास इन बच्‍चों को देने के लिए क्‍या स्‍पष्‍टीकरण है।)

Thursday, March 4, 2010

ज्‍योति बसु, राजकिशोर और द्वंद्ववाद...

मैं विकट दुविधा में फंस गया था। बात ही कुछ ऐसी थी कि मेरी जानकारी की कोई परिभाषा उसपर फिट ही नहीं बैठ रही थी। इसे निषेध का निषेध कहूं या विपरीत तत्‍वों की एकता। दार्शनिकों के हवाले से सुना था कि कोई चीज एक ही समय पर वह चीज हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। पर इस ज्ञान का ऐसा प्रयोग पहले कभी देखा-सुना नहीं था। हालांकि इसकी पूरी अपेक्षा थी कि यह काम कोई हिंदु‍स्‍तानी विचारक ही कर सकता था।
''ज्‍योति बाबू कम्‍युनिस्‍ट थे भी और नहीं भी''। अमूर्तन की गहराई में उतरने की अपनी अक्षमता के कारण मैंने जमीनी तर्क-वितर्क से समझने का प्रयास किया। सही बात तो यह है कि उदाहरणों और अपवादों को जाने बिना मुझे कोई परिभाषा समझ में ही नहीं आती है। वह भी तब जबकि वह इतनी मौलिक और अनूठी हो।
वैसे पिछड़े देशों के बुद्धिजीवियों को लगता है कि जबतक वे कोई मौलिक बात नहीं कहेंगे तबतक उनकी बुद्धिजीविता संदेह के घेरे में रहेगी इसलिए वे हमेशा कुछ न कुछ मौलिक कहने के दबाव में रहते हैं। वैसे ही जैसे न्‍यूज चैनल स्टिंग ऑपरेशन करने के दबाव में रहते हैं। जैसे नेपाल के माओवादियों को ही देखिए। अपने देश में क्रान्ति सम्‍पन्‍न भले ही न कर पाए हों लेकिन मार्क्‍सवाद में कुछ नया जोड़ने का ऐलान तो कर ही दिया। एक नया 'पथ' भी शोध लाए। दो वर्गों की संयुक्‍त तानाशाही का नया फॉर्मूला भी पेश कर दिया। दीगर बात है कि यह फॉर्मूला मार्क्‍सवाद/लेनिनवाद/माओवाद की किसी प्रस्‍थापना द्वारा पुष्‍ट या प्रमाणित नहीं होता। खैर इसकी फिक्र करने की जरूरत क्‍या है जरूरत तो यह है कि जब भी मुंह खोलो तो कोई मौलिक सिद्धांत ही टपकना चाहिए।
लर्मन्‍तोव ने एक जगह लिखा है कि रूसी लोगों को तबतक कोई कहानी समझ में नहीं आती जबतक कि कहानी के अंत में कोई सबक न निकलता हो। उसी तरह भारतीय बुद्धिजीवी को तबतक संतोष नहीं होता जबतक कि वह हर एक घटना को किसी मौलिक सिद्धांत से व्‍याख्‍यायित न कर ले।
खैर मुद्दा यह था कि ज्‍योति बाबू कम्‍युनिस्‍ट थे भी और नहीं भी। तो प्रश्‍न यह था कि वह कितना कम्‍युनिस्‍ट थे और कितना नहीं थे। या प्रश्‍न को और ठोस ढंग से रखें तो वे कितने प्रतिशत कम्‍युनिस्‍ट थे और कितने प्रतिशत नहीं थे। यह तो कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है कि कहीं वे स्प्लिट पर्सनाल्‍टी वाले व्‍यक्ति तो नहीं थे। और राजकिशोर जी ही यह बता सकते हैं कि वे दिन के कितने घंटे कम्‍युनिस्‍ट होते थे और कितने घंटे सज्‍जन (ध्यान रहे राजकिशोर जी ने बिना कोई प्रमाण दिए अपनी यह मूल प्रस्‍थापना भी दी है कि कम्‍युनिस्‍ट होना और सज्‍जन होना परस्‍पर अपवर्जी (म्‍युचुअली एक्‍स्‍क्‍लूसिव) गुण हैं)। कहीं ऐसा तो नहीं क‍ि वे दिन में कम्‍युनिस्‍ट होते थे रात में सज्‍जन।
मैंने इस मौलिक प्रस्‍थापना को समझने के लिए इसे ज्‍योति बाबू के अतीत पर लागू करने की तरकीब सोची। साथ ही मेरी सीमित कल्‍पना के टुच्‍चे घोड़े भी दौड़ने लगे। मैं सोचने लगा कि ज्‍योति बाबू जब कम्‍युनिस्‍ट का रूप धारण करते होंगे तो क्‍या करते होंगे और जब सज्‍जन का रूप धारण करते होंगे तो क्‍या करते होंगे। जब वे मजदूरों-किसानों के हक की बात करते थे तब क्‍या होते थे और जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनियो को अपने राज्‍य को लूटने का न्‍यौता देते विदेशों की सैर करते थे तब क्‍या होते थे। जब वे कहते थे कि सर्वहारा के पास खोने के लिए सिर्फ अपनी बेडि़यां हैं तब क्‍या होते थे और जब वे धमकाते थे कि मजदूरों की भलाई इसी में है कि वे उत्‍पादन बढ़ाने में मालिकों का साथ दें तब क्‍या होते थे। जब उनकी पार्टी कम्‍युनिस्‍टों का कत्‍लेआम करने में मदद करने वाले सलीम ग्रुप को औने-पौने दाम में जमीन का कब्‍जा दे रही थी तब वे कम्‍युनिस्‍ट थे या सज्‍जन। पश्चिम बंगाल में माकपाई काडरों की गुण्‍डागर्दी और समान्‍तर सरकार को मुख्‍यमंत्री के तौर पर संरक्षण देते हुए वे कम्‍युनिस्‍ट व्‍यवहार कर रहे थे या सज्‍जनता का।
बुद्धिजीवी ने कहा है कि कम्‍युनिज्‍म और सज्‍जनता में जब भी कोई द्वंद्व हुआ तो उन्‍होंने सज्‍जनता को चुना। मतलब यह कि वे सज्‍जन पहले थे और कम्‍युनिस्‍ट बाद में। जैसे उनके राज्‍य के एक बड़े कम्‍युनिस्‍ट नेता ने कहा कि मैं हिन्‍दू पहले हूं और कम्‍युनिस्‍ट बाद में। थोड़े ही दिन में कोई कहेगा कि मैं बंगाली पहले हूं और कम्‍युनिस्‍ट बाद में। जैसे कि लाल कृष्‍ण आडवाणी और राज ठाकरे ने कम्‍युनिज्‍म की दीक्षा ले ली हो।
अभी हाल ही में ज्‍योति बाबू की पार्टी के महासचिव ने कहा कि धर्म को मानने वालों पर कम्‍युनिस्‍ट पार्टी किसी प्रकार की रोक नहीं लगाती। माकपा जैसी पार्टी रोक लगा भी कैसे सकती है जिसके एक भूतपूर्व महासचिव ही जत्‍थेदार कम्‍युनिस्‍ट थे। जल्‍दी ही ऐसा भी हो सकता है कि माकपा का महासचिव छापा तिलक लगाए जनेऊ पहने राम-राम कहता नजर आए या यह भी हो सकता है कि वह पांच वक्‍त का नमाजी हो। भाजपा-शिवसेना का तो आधार ही खिसक जाएगा। यह तो सज्‍जनता की पराकाष्‍ठा हो जाएगी। कम्‍युनिज्‍म और सज्‍जनता का ऐसा बेजोड़ घोल हिन्‍दुस्‍तान में ही संभव है। और यदि ऐसा हुआ तो बुद्धिजीवियों की जमात से ज्‍यादा गदगद और कोई नहीं होगा।
भला इससे अच्‍छा क्‍या हो सकता है कि एक सज्‍जन कम्‍युनिस्‍ट संसद और विधानसभा का चुनाव लड़ते-लड़ते, पूंजीपतियों से आरजू-मिन्‍नत करके अठन्‍नी-चवन्‍नी मांगते-मांगते, क्राइम स्‍टोरीज पढ़ते-पढ़ते, संगीत सुनते-सुनते एक दिन टीवी-रेडियो पर देशवासियों को संदेश दे कि लो भैया समाजवाद आ गया। मूलाधार बदल गया। अब वर्गों का नामोनिशान नहीं रहेगा। मजदूर भाई और पूंजीपति भाई सब एकसाथ मिलकर समाजवाद का निर्माण करेंगे। अब वर्गों के बीच में कोई अंतरविरोध कोई झगड़ा नहीं रह गया है। हो सकता है कोई इसे समाजवाद की जगह रामराज्‍य भी कह दे। वैसे ही कई भारतीय बुद्धिजीवियों को मार्क्‍सवाद से एकमात्र कष्‍ट यही है कि वह विदेशी विचारधारा है। अगर इन बुद्धिजिवियों को किसी दिन पता चला कि धरती के गोल होने की बात भारत में नहीं किसी अन्‍य देश में खोजी गई थी तो वे फिर से धरती को चपटी मानने लगेंगे। या ऐसा भी कह सकते हैं कि बाकी देशों की धरती भले ही गोल हो मगर हमारे यहां की तो चपटी ही है। अगर गोल होती तो किसी देसी महात्‍मा ने ऐसा जरूर कहा होता।
प्रश्‍न बहुत हैं जवाब कम। हर प्रश्‍न का जवाब देना बुद्धिजीवियों का काम भी नहीं है। खासकर बड़े बुद्धिजीवियों का। वे तो मौलिक प्रस्‍थापनाएं और सूत्र देते हैं। कुछ छोटे बुद्धिजीवी उनका भाष्‍य करके तरह-तरह से उनकी व्‍याख्‍या करते हैं। व्‍याख्‍या करते-करते कुछ लोग कुछ नई मौलिक प्रस्‍थापनाएं पेश करते हैं। कुछ मौलिक नहीं करेंगे तो बुद्धिजीवी का तमगा कैसे मिलेगा।
तभी तो हमारे देश की तथाकथित कम्‍युनिस्‍ट पार्टियां कहती हैं कि आज का समय पहले जैसा नहीं रहा। आज का सर्वहारा भी पहले जैसा नहीं रहा। आज का मार्क्‍सवाद भी पहले जैसा नहीं रहा। आखिर एंगेल्‍स ने ही तो कहा था कि समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है। कम्‍युनिस्‍ट सज्‍जन में तब्‍दील हो जाता है। मार्क्‍सवाद संशोधनवाद में। वर्ग संघर्ष की जगह वर्गों में भाईचारे की भावना आ जाती है।
एक अंतिम प्रश्‍न रह जाता है : क्‍या बुद्धिजीवी भी अपने विपरीत में बदल जाता है? अगर हां, तो बदलकर वह क्‍या हो जाता है?

Wednesday, January 20, 2010

गुण्‍डागर्दी ही इनकी राष्‍ट्रीय संस्‍कृति है।

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में जनचेतना के पुस्‍तक प्रदर्शनी वाहन पर राष्‍ट्रीय संस्‍कृति के स्‍वयंभू ठेकेदारों के कायराना हमले ने एक बार फिर से उनकी असलियत उजागर कर दी है। वैसे भयानक अमानवीय कृत्‍यों को अंजाम देने वालों की तारीफ में यह वाकया बहुत मामूली महत्‍व रखता है।
राष्‍ट्रीय संस्‍कृति के स्‍वयंभू ठेकेदारों की सबसे बड़ी संस्‍कृति यह है कि यहां दिमाग का प्रयोग वर्जित है। दिमाग का प्रयोग केवल ऊपर के पदाधिकारी करते हैं और वह भी तर्क या बहस करने के लिए नहीं केवल अमानवीय कृत्‍यों को अंजाम देने के नए-नए तरीके विकसित करने के लिए। निचले स्‍तर के कार्यकर्ताओं को केवल हुक्‍म की तामील करनी होती है।
ऐसा करने के लिए पढ़ने लिखने की कोई जरूरत ही नहीं है। सारा ज्ञान तो भगवान श्रीकृष्‍ण गीता में कह ही गए है। वैसे भी आम आदमी को ज्ञान की जरूरत ही कहां है। बस भूत,पिशाच भगाने के लिए हनुमान चालीसा रट लो, और सुख-संपत्ति के लिए कुछ अन्‍य प्रकार की रचनाओं का जाप कर लो, इतने से ही बैकुण्‍ठ पार लग जाएगा।
तो फिर जिंदगी और समाज को बदलने वाली किताबों की जरूरत ही क्‍या है। लोगों को नींद से झकझोरकर जगा देने वाली किताबों की जरूरत ही क्‍या है। लोगों को जिंदगी की असलियत बताने वाली और 'बेहतर जिंदगी का रास्‍ता' दिखाने वाली 'बेहतर किताबों' की जरूरत ही क्‍या है। आम लोगों को जीने का ढंग सिखाने वाली किताबों की जरूरत ही क्‍या है।
लिहाजा 'रामराज्‍य' की प्राप्ति के लिए प्रयासरत 'अप'संस्‍कृति के स्‍वयंभू ठेकेदारों ने हिंदी पट्टी में बड़े पैमाने पर प्रग‍तिशील साहित्‍य वितरित करने वाली संस्‍था जनचेतना के पुस्‍तक प्रदर्शनी वाहन पर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एक बार फिर हमला किया।
इस हमले का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यही है कि यह जनचेतना की मुहिम और समाज में आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी किताबों का प्रचार प्रसार करने की जरूरत रेखांकित होती है।
आज हर प्रकार के ढोंगी पाखंडी बाबाओं की और हर प्रकार की धार्मिक पुस्‍तकें, सीडी, कैसेट धड़ल्‍ले से बाजारों में बिक रहे हैं। लोगों की चेतना को कुंद करने वाली नशे की खुराक जैसे ये साहित्‍य जितनी आसानी से सुलभ हैं उतने प्रेमचंद या भगतसिहं नहीं हैं। हर प्रकार के पाखंडों, कुरीतियों, यहां तक कि धर्म के आवरण में लिपटी अश्‍लील कहानियां भी बड़े पैमाने पर लोगों को उपलब्‍ध कराई जा रही हैं और इन्‍हें राष्‍ट्रीय संस्‍कृति का जामा पहनाया जाता है।
जाहिर है कि ऐसा करने वालों को इंसान की तरह जीने और संघर्ष और सृजन की बात करने वाले साहित्‍य से खतरा महसूस होता है और भीड़ की ताकत के साथ मौका देखकर वे कायराना हमले भी करने से बाज नहीं आते।
सोचिए कि 'रामराज्‍य' में क्‍या होगा।

Sunday, October 18, 2009

सामाजिक सरोकारों के लिए जेल पहुंचा पत्रकार .....इस विलुप्‍त होती नस्‍ल को आपके समर्थन की जरूरत है।

दिल्‍ली और नोएडा-गाजियाबाद के सामाजिक सरोकार रखने वाले सभी पत्रकारगण तपीश मेंदोला के नाम से परिचित होंगे। अगर आपको याद न हो तो बता दें कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान इसी नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता के अथक प्रयासों की बदौलत दिल्‍ली, नोएडा और गाजियाबाद में बड़े पैमाने पर गरीबों के बच्‍चों के गुमशुदा होने और पुलिस-प्रशासन की तरफ से उन्‍हें कोई मदद न मिलने उल्‍टा लापता बच्‍चों के गरीब मां-बाप को ही डराने, धमकाने और अपमानित करने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनीं। अनेक अखबारों और न्‍यूज चैनलों ने तपिश का इंटरव्‍यू भी लिया और दिखाया और कईयों ने उनकी मदद से लेकिन उनका या उनके संगठन नौजवान भारत सभा का नाम लिए बगैर प्रस्‍तुतियां कीं।

तपिश और नौजवान भारत सभा तथा सहयोगी संगठनों के प्रयासों की बदौलत गुमशुदा बच्‍चों के मामले पर दिल्‍ली हाइकोर्ट में सुनवाई चल रही है और कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में पुलिस-प्रशासन को काफी लताड़ भी पिलाई है।

फिलहाल तपिश और उनके दो और नौजवान साथी एक अन्‍य मजदूर के साथ जेल में बंद हैं, उनका जुर्म यह है कि उन्‍होंने एक बेहद मानवीय और कानूनी मसले पर कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए गोरखपुर के मजदूर आंदोलन का साथ दिया और उसमें अग्रणी भूमिका निभाई। कदम कदम पर फैक्‍ट्री मालिकों और जिला प्रशासन द्वारा विश्‍वासघात करने के बावजूद ढाई तीन महीने से चल रहे इस जुझारू आंदोलन में मजदूरों की तरफ से कोई उकसावे या हिंसा की घटना अभी तक सामने नहीं आयी है, हालांकि मालिकों और प्रशासन की तरफ से इस तरह की गति‍विधियां लगातार जारी रही हैं। मालिकों ने अपने गुंडों के साथ मिलकर मजदूरों और उनके नेताओं पर जानलेवा हमला भी किया जिसमें स्‍वयं एक फैक्‍ट्री के मालिक ने रिवाल्‍वर से मारकर मारकर एक नौजवान प्रमोद का सिर फोड़ दिया। पर लोकत़ंत्र का खेल यह कि स्‍वयं इन नौजवानों और मजदूरों के खिलाफ ही कई प्रकार की धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया।

आंदोलन के दबाव में आने के बाद जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई 12 वा‍र्ताएं फैक्‍ट्री मालिकों के असहयोग या अनुपस्थिति के कारण असफल सिद्ध हो चुकी हैं। इसके बाद अनशन पर बैठे मजूदरों को डराने धमकाने का पुलिसिया नाटक लगातार चल रहा था कि 15 अक्‍टूबर को बातचीत के बहाने मजदूर आंदोलन के तीन अग्रणी साथियों तपिश, प्रशांत और प्रमोद को प्रशासन ने बातचीत के बहाने एडीएम के कार्यालय बुलाया गया।

प्रशासन की नेकनीयत पर भरोसा करके वार्ता के लिए पहुंचे तीनों नौजवानों के साथ एडीएम के कार्यालय में सिटी मजिस्‍ट्रेट, एडीएम सिटी और कैंट थाने के इंस्‍पेक्‍टर और कुछ और पुलिस वालों ने बेरहमी से मारपीट की। फैक्‍ट्री मालिकों के लठैत की भूमिका में आ चुके प्रशासन ने लोकतंत्र का नकाब उतारकर पूरी नंगई के साथ बेरहम सलूक किया। बताने के बावजूद ह्रदय रोगी प्रशांत पर भी इन सरकारी दरिंदों ने अपना कहर बरपा किया और 17 अक्‍टूबर की शाम तक उन्‍हें डाक्‍टरी मदद नहीं दी गई थी। हालांकि पुलिस उनपर कोई गंभीर धारा नहीं लगा सकी बावजूद इसके उन्‍हें जमानत नहीं दी गई है और 22 अक्‍टूबर तक के लिए जेल भेज दिया गया है।

मुद्दा यह है कि अपने संविधानप्रदत्त जायज और बेहद छोटी मांगों के लिए भी यदि ऐसी ज्‍यादतियों का शिकार होना पड़े तो शायद शरीफ नागरिकों के सोचने का भी वक्‍त आ गया है कि यह लोकतंत्र है या निरंकुश तानाशाही। यह बात सिर्फ तपिश और उनके साथियों या गोरखपुर के मजदूर आंदोलन की नहीं है बल्कि यही हाल पूरे देश में है और 99.9 प्रतिशत मामलों में यही होता है। आज अगर हम चुप बैठे तो कल को यही हमारे साथ भी होगा और तब कोई बोलने वाला नहीं होगा।

मीडिया के सामाजिक सरोकारों पर बेहद गंभीर चर्चाएं करने वाले साथियों से मैं कहना चाहूंगा कि अब उससे आगे बढ़कर कुछ करने का समय आ गया है। सामाजिक सरोकार रखने वाला एक जुझारू पत्रकार अपने दो और नौजवान साथियों और एक मजदूर साथी के साथ जेल में बंद है क्‍योंकि उसने वह किया जो हम सबको करना चाहिए। सामाजिक सरोकार रखने वाले पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की विलुप्‍त होती प्रजाति के जो लोग भी शेष बचे हैं उनसे मेरी अपील है कि इस मुद्दे पर आगे आएं और अपना सहयोग-समर्थन दें।

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सत्‍यम : 9910462009 ईमेल: satyamvarma@gmail.com
संदीप : 9350457431

Sunday, September 13, 2009

हड़ताल 'अपराध' नहीं पवित्र धर्म है।

जेट एअरवेज़ के पायलटों की हड़ताल के संदर्भ में 11 सिंतंबर 09 के अपने संपादकीय 'हड़ताल का अपराध' में नई दुनिया अखबार यह प्रश्‍न करता है कि 'हड़ताल करने वालों को कड़ा दंड देने के लिए व्‍यापक जनसमर्थन और बहुमत के बल पर कानून बनाने की आवश्‍यकता हो गई है। हड़तालों पर कड़े अंकुश के लिए क्‍या घिसे-पिटे पुराने कानूनों में फेरबदल पर विचार करने का सही वक्‍त नहीं आ गया है?'

आउटलुक पत्रिका के संभवत: जुलाई 09 के अंक में एक लेख में लंदन के ट्यूब ट्रेनों की हड़ताल के विषय में लेखक कहता है कि इस हड़ताल से सबसे अधिक दिक्‍कत 'आम आदमी' को हुई।

हो सकता है आप भी कहें कि उपरोक्‍त दोनों बातें सच ही तो हैं। आखिर हडतालों के कारण लोगों को तमाम असुविधाएं होती हैं, बहुत से जरूरतमंद लोग अत्‍यावश्‍यक सेवाओं से वंचित रह जाते हैं, काम और व्‍यवसाय का नुकसान होता है, सरकारी और गैरसरकारी तथा राष्‍ट्रीय संपत्ति को नुकसान होता है, उत्‍पादक गतिविधियां ठप्‍प हो जाती हैं और उत्‍पादक श्रम बेकार चला जाता है। और शायद आप प्रत्‍यक्ष या परोक्ष ढंग से यह भी कहने या जताने से न चू‍कें कि यह सब नाहक ही होता है और यह शैतानी तबियत वाले चंद निठल्‍ले लोगों के दिमाग की उपज होती है।
और बहुत हद तक यह भी संभव है कि आप शायद अपने ये इंप्रेशन हड़ताल के कारण को जानने-समझने के पहले ही बना चुके हों।

कोई चीज सिर्फ इसलिए गलत नहीं हो जाती क्‍योंकि कुछ लोग उसका इस्‍तेमाल गलत ढंग से या गलत उद्देश्‍य के लिए करते हैं। पायलटों को लाखों रुपये वेतन और भत्तों में मिलते हैं और उनकी ड्यूटी भी अपेक्षाकृत आरामदायक होती है केवल इसलिए हड़ताल एक गलत हथियार नहीं हो जाता। हड़ताल किसी स्थिति के असहनीय हो जाने पर अपना विरोध जताने और दबाव बनाने का एक तरीका है, और किसी भी अन्‍य तरीके की तरह इसके सही या गलत होने का फैसला हड़ताल के मूल कारण की पड़ताल किए बिना नहीं किया जा सकता।

हड़ताल का नाम सुनते ही आउटलुक के लेख के लेखक की तरह कई लोगों का 'आम आदमी'-प्रेम उमड़कर बाहर आने लगता है। पर ये बेचारे अतिभावुक मासूम लोग ये नहीं सोचते कि हड़ताल करने वाले भी आम लोग ही होते हैं (हालांकि हमेशा ऐसा नही होता मगर ज्‍यादातर तो होता ही है)। अगर खास होते तो हड़ताल कर ही क्‍यों रहे होते। (खास लोग लॉबीइंग करते हैं दबाव डालते हैं, हड़ताल नहीं करते)। खास लोगों को हड़ताल करने की जरूरत ही नहीं होती। आप कभी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि ये हड़ताली आम लोग हड़ताल कर ही क्‍यों रहे हैं। आप कभी ये जानने की कोशिश भी नहीं करते कि शायद शांतिप्रिय तरीकों के असफल हो जाने के बाद ही हड़ताल की जरूरत पड़ी हो, शायद हड़तालियों के साथ अन्‍याय हुआ हो, शायद अकेले-अकेले उनकी आवाज दबाई जा रही हो और इसलिए उन्‍हें समूह की शक्ति से अपनी आवाज जोर से उठाने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया हो। पर हो सकता है कि आप 'आम आदमी' के दुख में इतने दुबलाए जा रहे हों कि आपके मन में ये प्रश्‍न उठते ही न हों।
क्‍या आपको मालूम है ऐसा क्‍यों है?
चौंकिए मत ऐसा इसलिए है क्‍योंकि आपने अपने आप को ही आम आदमी समझ लिया है। इस्‍त्री किए कपड़े पहने, लंच पैक थामे, प्रोमोशन, बीमा, फ्लैट और कार की किश्‍त, मुन्‍नू को इजीनियरिंग कालेज में एडमिशन दिलाने के लिए डोनेशन, मुन्‍नी के दहेज के लिए रकम, अर्थव्‍यस्‍था के ढहने के कारण शेयरों के गिरते भाव.... आदि आदि में आप इतने बेहाल-परेशान रहते हैं कि आपको लगता है कि आप से ज्‍यादा 'आम' दुनिया में और कोई है ही नहीं। और ऊपर से ये हड़ताल करने वाले उफ्फ.... स्‍साले!! काम के न काज के, दुश्‍मन (आपके)अनाज के!!!
यह भी हो सकता है कि आप डीटीसी की बस के बजाय ए सी कार में बैठे हों और तब तो बस पूछिए मत। दीज़ ब्‍लडी इंडियंस, गुड फॉर नथिंग। इनको तो कोई तानाशाह ही ठीक कर सकता है।
जाहिर सी बात है कि मन ही मन वो तानाशाह भी आप स्‍वयं को ही समझते हैं। या आपको लगता है कि वो तानाशाह आपका पास का नहीं तो आपका दूर का रिश्‍तेदार तो होगा ही।

हडतालों के साथ एक और मजेदार मिथक यह है कि सिर्फ कर्मचारी ही हड़ताल करते हैं।
अगर यह सच है तो संसद और विधानसभाओं में विरोध स्‍वरूप सदन से वॉक आऊट करना और सार्वजनिक संपत्ति का लाखों-करोड़ों रुपया वारा न्‍यारा करना क्‍या हड़ताल का रूप नहीं है।

और पूंजीपतियों की हड़ताल के बारे में क्‍या ख्‍याल है।

जो पूजीपति निवेश करने के लिए और मनमाफिक मुनाफा पीटने के लिए तमाम तरह की शर्तें लगाते हैं धमकियां देते हें, ब्‍लैकमेल करते हैं यहां तक कि अपनी गलतियों के कारण दीवाला निकल जाने पर पूरे रौब के साथ बेल आउट पैकेज की मांग करते हें क्‍या वो हड़ताल नहीं है और क्‍या उससे 'आम आदमी' को परेशानी नहीं होती है। जहां कर्मचारियों की मांगे बेहद छोटी और काफी हद तक जायज होती हैं वहीं सरकार के सामने पूंजीपतियों की शर्तें देखिए और आप स्‍वयं अंदाजा लगाइये।
- सस्‍ती जमीन दो नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- बिजली पानी सस्‍ता दो और बिजली पानी के लाखों करोड़ों रुपये के बकाया बिलों के भुगतान की बात भी मत करो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- करों में तमाम तरह की छूट दो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- पुलिस और सरकारी अधिकारियों से कहो कि घूस भले लें लेकिन ज्‍यादा सख्‍ती नहीं करें, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- श्रम कानूनों में ढील दो, जो मौजूदा कानून हैं उनको भी लागू मत करो, कर्मचारियों-मजदूरों का खून पसीना निचोड़ने की पूरी आजादी दो, जब बात हमारे गुडों की जद से बाहर हो जाए तो उनसे हमें बचाने और उनकी अक्‍ल ठिकाने लगाने के लिए पुलिसिया सुरक्षा का वायदा करो और यूनियन बनाने की आजादी तो बिल्‍कुल मत दो, नहीं तो हम निवेश नहीं करेंगे।
- कानून व्‍यवस्‍था को ऐसी बनाओं की हम चाहें तो कोर्ट कचहरी के चक्‍कर लगवा-लगवाकर कर्मचारियों का जूता घिसवा डालें। अगर कोई केस करे भी तो बाप के केस का फैसला उसके बेटे के बुढ़ा जाने पर ही हो। और अगर कर्मचारी जीत भी जाए तो जुर्माना इतना कम हो कि बेचारा केस जीतकर भी ठगा सा महसूस करे।

- आदि आदि आदि ...... (इस सूची का कोई अंत नहीं है.)

तो क्‍या यह भी एक तरह का हड़ताल नहीं है। और क्‍या नई दुनिया और उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले इसे भी 'अपराध' मानते हैं।

पुनश्‍च : नई दुनिया के संपादक लिखते हैं कि '...जब पूरी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्‍यवस्‍था तथा जनता अपने आर्थिक विकास की गति पर गौरव करते हुए प्रगति के शिखर पर पहुंचने की आकांक्षा रखती है, तब सरकार हड़ताल जैसे गलत हथियारों के इस्‍तेमाल की छूट क्‍यों दे रही है'। अब पता नहीं संपादक जी ने देश के 20 रुपया रोज से कम पर जीने वाले देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी को उस 'जनता' में शामिल किया है या नहीं जो आर्थिक विकास पर गौरव कर रही है। यही प्रश्‍न भारत के हर चौथे भूखे नागरिक, और कुपोषण के शिकार पांच वर्ष से कम आयु के बच्‍चों की लगभग आधी आबादी की तरफ से भी पूछी जा सकती है कि वे 'जनता' में शामिल हैं या नहीं और 'गौरव' करने का हक उन्‍हें भी है या नहीं।

ब्‍लॉग की एक पोस्‍ट के लिए इस विषय पर फिलहाल इतना ही...।

Monday, July 13, 2009

मीडिया में आई गिरावट पर मीडिया वालों की चिंता का सार क्‍या है...।

आजकल मीडिया में स्‍वयं मीडिया की आलोचना छायी हुई है। मीडिया के गिरते स्‍तर पर मीडिया से जुड़े तमाम लोग विचार-विमर्श कर रहे हैं। सरकार भी मीडिया पर नियंत्रण लगाने के मूड मे दीख रही है और अगर सरकार जल्‍दी करती नहीं दीख रही है तो इसका बस एक ही कारण है कि अपनी तमाम गिरावट के बावजूद मीडिया सरकार के लिए उपयोगी ही साबित हो रहा है, वह स्‍वयं अपने तईं वह सारे काम कर रहा है जो वर्तमान दौर में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के लिहाज से प्रासंगिक है। मोटा-मोटी यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया का जिस हद तक पतन होता जाएगा उस हद तक वह आम जनता के लिए नुकसानदेह और सरकार के लिए फायदेमंद होता जाएगा।

यहीं यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर मीडिया के पतन पर इतना शोर क्‍यों।

इस प्रश्‍न का जवाब एक दूसरे प्रश्‍न के जवाब में निहित है कि मीडिया के पतन पर चिन्‍ता व्‍यक्‍त करने वाले लोग कौन हैं और उनकी चिन्‍ता का सार क्‍या है।

व्‍यक्तियों से पहले विचारों की बात करना सही तरीका होगा क्‍योंकि अं‍तत: व्‍यक्तियों का महत्‍व उनके नामों से नहीं बल्कि उनके विचारों से ही तय होता है और विचारहीन मनुष्‍य जैसी कोई चीज नहीं होती।

मीडिया के पतन पर स्‍यापा करने वाले ज्‍यादातर लोग स्‍वयं मीडिया की इस पतनकथा के प्रत्‍यक्षदर्शी रहे हैं। यह कहना भी अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि इन तमाम प्रत्‍यक्षदर्शियों में से ज्‍यादातर मीडिया में आई इस गिरावट के हमसफर रहे हैं, कुछ इस गिरावट के लिए जिम्‍मेदार रहे हैं तो कुछ मूकदर्शक और कुछ अन्‍य इसके लाभार्थी रहे हैं।

आज वे मीडिया में आई गिरावट पर आश्‍चर्यव्‍यक्‍त कर रहे हैं तो यह अपने आप में एक आश्‍चर्य की बात है क्‍योंकि मीडिया में मूल्‍यों का ह्रास किसी दुर्घटना का दुष्‍परिणाम नहीं बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है जो लगातार उनकी आंखों के सामने घटती रही है।

आज मीडिया के जनपक्षधर न रह जाने की बात की जाती है पर इस बिन्‍दु पर विचार पर विचार नहीं किया जाता कि मीडिया अपने आप में कोई चिंतनशील प्राणी नहीं है। वह कितना जनपक्षधर है यह इस बात से तय होता है कि मीडिया से जुड़े लोग कितने जनपक्षधर रह गये हैं। मीडिया समाज से इतर कोई चीज नहीं है। वह समाज को प्रभावित भी करता है और समाज से प्रभावित भी होता है। समाज में जिन मूल्‍यों का बोलबाला होगा, समाज में जिन विचारों, लोगों और व्‍यवस्‍थाओं का प्रभुत्‍व होगा उसी की छाप उस समय के मीडिया पर रहेगी। आज मीडिया की चर्चा एक स्‍वायत्त स्‍वतंत्र निकाय के रूप मे की जा रही है, अन्‍य सामाजिक शक्तियों के साथ उसके अंतरसंबंधों का विश्‍लेषण नहीं किया जाता।

मीडिया की वर्तमान हालत पर चिंता व्‍यक्‍त करने वाले लेखों का विश्‍लेषण सतही, पूरा सत्‍य नहीं बल्कि सत्‍यांश, अपने को किनारे रखकर किया गया और ऐतिहासिक समझ के अभाव से परिपूर्ण नजर आता है।

आज के मीडिया को आज के विशिष्‍ट ऐतिहासिक दौर से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब समाज में ही प्रगति पर प्रतिक्रिया हावी है, और आज जब ज्‍यादा नहीं बल्कि 60 साल पहले के राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता आंदोलन के दौर के मूल्‍य भी क्षरित हो गये हैं तो हम गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद और राधा मोहन गोकुलजी जैसे पत्रकारों की उम्‍मीद कैसे कर सकते हैं।

आज के मीडिया के स्‍वामित्‍व के स्‍वरूप, उसके उत्‍पादन के स्‍वरूप और उसका उत्‍पादन करने वाले लोग तथा उसके उपभोग के स्‍वरूप पर विचार करने के बाद और मीडिया मालिकों और मीडियाकर्मियों और मीडियाकर्मियों और आम लोगों के बीच के संबंधों पर विचार करने के बाद यह समझने के लिए बहुत अक्‍ल की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि आज का मीडिया ऐसा ही हो सकता है।

सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं का स्‍वरूप बहुत हद तक इस बात से तय होता है कि समाज के प्रभावशाली तबकों के हितों के अनुसार चीजें कैसी होनी चाहिए।

असली मुद्दों के बजाय गौड़ मुद्दों की तरफ लोगों का ध्‍यान भटकाना, लोगों को अतार्किक और अवैज्ञानिक बनाना, विचारों के बजाय वस्‍तुओं और विश्‍लेषण की दृष्टि देने के बजाय तथ्‍यों पर जोर देना, पहलकदमी संगठित करने के बजाय लोगों को निष्क्रिय श्रोता बनाना क्‍या ये ही वे चीजें नहीं हैं जो किसी भी दौर के शासक वर्ग की जरूरत होती हैं। लोग अपनी दाल-रोटी के बजाय राखी सावंत के स्‍वयंवर में ज्‍यादा दिलचस्‍पी लें क्‍या आज के मालिक वर्ग की इसके अलावा कोई और चाहत हो सकती है। और क्‍या आज का मीडिया बिल्‍कुल यही काम नहीं कर रहा है। और क्‍या नामी-गिरामी मीडिया वालों को लाखों का पैकेज और अन्‍य सुख-सुविधाएं यही काम करने के लिए नहीं दी जा रही हैं।

खैर मैं जिस मुद्दे की तरफ फिलहाल आना चाहता हूं वह यह है कि मीडिया की हालत पर स्‍यापा करने वालों या यहां तक कि उसकी आलोचना करने वालों की चिंता/आलोचना का सार क्‍या है।

हमारे चिंतकों और सरकार की मुख्‍य चिंता यह है कि जिस तेजी से मीडिया अपने रसातल की ओर जाता रहा है उससे कहीं उसकी विश्‍वसनीयता ही संदेह के घेरे में न आ जाए क्‍योंकि यदि ऐसा हो गया तो जनमानस पर अपने विचारों का प्रभाव कैसे डाला जा सकेगा। एक मायने में यह‍ चिंता सही भी है क्‍योंकि आजकल मीडिया में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है वह बुर्जुआ मानदंडों से भी बेहद घटिया स्‍तर का है। अखबारों के संपादकीय पृष्‍ठों की सामग्री का स्‍तर बेहद गिर गया है और पूरा लेख पढ़ने के बाद उसमें से कोई काम की बात कोई तार्किक समझदारी या विश्‍लेषण ढूंढ पाना मुश्किल होता है। कुछ स्‍वनामधन्‍य प्रतिष्ठित स्‍तंभकार अपनी चवन्‍नी चलाए जा रहे हैं। ज्‍यादातर लेखों का कोई आपरेटिव पार्ट ही नहीं होता है और यह समझना मुश्किल होता है कि लेख लिखा ही क्‍यों गया था। लगता है कि हमारे माननीय पत्रकारों, विचारकों ने सोचना-समझना, चिंतन करना और यहां तक कि पढ़ना-लिखना भी बंद कर दिया है। दो-चार डेटा, पुरानी पढ़ाई से हासिल दो-चार तर्क, दो-चार शब्‍दों की बाजीगरी और हो गया लेख तैयार। न्‍यूज और विज्ञापन का फर्क मिटता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महिमागान करने वाला मीडिया यह नहीं बताता कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिल जाना ही पूरा जनवाद नहीं होता। आज का मीडिया कहीं एकदम साफ झूठ बोल रहा है तो कहीं सत्‍यांश, कहीं वह जितना कहता है उससे कहीं ज्‍यादा छुपाता है तो कहीं वह निष्‍पक्षता की आड़ में स्‍पष्‍टत: जनविरोधी और प्रतिक्रियावादी प्रचार का माध्‍यम बना हुआ है।

मीडिया की दुर्गति पर चिंतित ज्‍यादतर विचारकों की चिंता उसके जनपक्षधर चरित्र की नहीं बल्कि उसकी स्‍तरहीन सामग्री को लेकर है। लेकिन मीडिया की बीमार हालत का उनका रोग-निदान जितना सतही और आंशिक है उनकी सलाह उतनी ही निष्‍प्रभावी है। कुल मिलाकर उनकी बातों का सार यह है कि मीडिया की विभिन्‍न भूमिकाओं के बीच संतुलन स्‍थापित किया जाए, कुछ कुछ सुधार करके चीजों को ठीक कर लिया जाए, न्‍यूज और विज्ञापन के बीच संतुलन बनाया जाए और मुनाफे के उद्यम के साथ-साथ मीडिया की विश्‍वसनीयता पर आंच भी न आने दी जाए। पूंजीपतियों के स्‍वामित्‍व वाले मीडिया के विकल्‍प का कोई खाका उनके पास नहीं है। उनकी गरमा-गरम आलोचना में किसी सार्थक पहल की दिशा नहीं है नौजवान मीडियाकर्मियों को वे इसी प्रणाली में फिट हो जाने के अलावा कोई दूसर मार्ग नहीं दिखा सकते। आखिर इसी मीडिया ने उन्‍हें शोहरत और सहूलियतें दी हैं इसलिए इसके स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता तो उन्‍हें होती ही है, यह दीगर बात है कि इसका इलाज करने में वे असमर्थ हैं।