दक्षिण अफ्रीका में चल रहा विश्व कप फुटबॉल प्री क्वार्टर फाइनल चरण में पहुंच चुका है। कुछ टीमें क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालीफाई भी कर चुकी हैं। इस विश्व कप में अगर किसी एक व्यक्ति पर सबसे अधिक फोकस रहा है तो वह हैं अर्जेंटीना के कोच डिएगो मैराडोना। कैमरा बार-बार लौट कर उनकी तरफ आता है और उनकी अलग-अलग मुद्राओं को कैद करता रहता है। मैंराडोना का जीवन चढ़ावों-उतारों से भरा रहा है ये तो सभी जानते है फिर भी फुटबॉल प्रेमियों को मैराडोना प्यारे लगते हैं। किसी ने उनकी बुराई करते हुए एक बार उनके 'हैंड ऑफ गॉड' वाले गोल की चर्चा की। मेरे मन में बरबस यह ख्याल आया कि मैराडोना का हाथ ही तो असली 'हैंड ऑफ गॉड' है।
इस बार मैराडोना सूट में नजर आ रहे हैं, और उसकी फिटिंग भी कुछ ऐसी है कि मैराडोना जैसे व्यक्तित्व वाला आदमी ही उस तरह का सूट पहन एक ऐसे आयोजन में आ सकता है जिसपर सारी दुनिया की निगाहें हैं। वर्ना मैराडोना भी चाहें तो 'सेवाइल रो' से सूट सिलवा सकते हैं।
फुटबॉल विश्व कप में जो गेंद इस्तेमाल की जा रही है उसे नाइक कंपनी ने बनाया है और उसका नाम है 'जाबुलानी' ज़ुलु में जिसका अर्थ होता है 'आनंद मनाना' या 'खुशी देना'। पर जाबुलानी ने कइयों को दुखी कर दिया है। चूंकि खिलाड़ी इस नई गेंद से खेलने के आदी नहीं हैं इसलिए बॉल के नियंत्रण आदि को लेकर खिलाडि़यों विशेषकर गोलरक्षकों को परेशानी है। मुझे यह नहीं समझ में आता जिस गेंद का विश्व कप में इस्तेमाल किया जाना है उसको दो-तीन साल पहले ही बाज़ार में क्यों नहीं उपलब्ध करा दिया जाता है। ताकि हर टीम उसी गेंद पर अभ्यास करे। पर जबतक खेलों पर मुनाफाखोर कंपनियों का कब्जा रहेगा तब तक ऐसी चीजें होती रहेंगी।
फुटबॉल में अब लगता है कि खिलाडि़यों को गिरने की बीमारी हो गई है। विपक्षी खिलाड़ी जोर से छीं भी दे तो आजकल के फुटबालर ऐसे लोटने लगते हैं जैसे उनकी टांग टूट गई हो। इस चीज ने गेम का मज़ा कम कर दिया है। रेफरियों से होने वाली गलतियां भी थोड़ा मजा कम कर देती हैं। अगर रेफरी से गलती नहीं हुई होती और लैंपार्ड का गोल मान लिया जाता तो इंग्लैड-जर्मनी का मैच काफी रोचक बनता। हालांकि जर्मनी के मुकाबले इंग्लैंड का प्रदर्शन औसत ही रहा।
अगर खेल की बात करें तो ब्राजील, अर्जेंटीना, जर्मनी और स्पेन ने अब तक सबसे शानदार खेल दिखाया है। उनके खेल में अनुशासन और योजनाबद्धता है और सही मायनों में इन्होंने इंटेलिजेंट खेल का प्रदर्शन किया है। एशियाई देशों में दक्षिण कोरिया और जापान ने बढि़या खेल दिखाया है और अपनी गति और चुस्ती-फुर्ती से वे लंबे-लंबे खिलाडि़यों वाली यूरोपीय टीमों को टक्कर दे सकती हैं। डेनमार्क के खिलाफ फ्री किक पर जापानी खिलाडि़यों के दो गोल और एक फील्ड गोल उनके कौशल का बखान करते हैं। पर अगर मुझे सेमीफाइनल की चार टीमें चुननी हों तो मैं उपरोक्त चार को ही चुनुंगा। और इनमें भी स्पेन सबसे बढि़या टीम लग रही है। हालांकि दिल तो हमेशा ब्राजील के ही पक्ष में रहता है। अपना देश तो फुटबॉल में अभी बहुत पीछे है, तब तक हम ब्राजील को ही जितवाते रहेंगे। मजे की बात है कि इन चार सबसे अच्छी टीमों में से दो दक्षिण अमेरिका की हैं और दो यूरोप की। वर्ना ज्यादातर तो यूरोप की टीमें ही छायी रहती हैं। जिन टीमों में अनुशासन और योजनाबद्धता की कमी है और जिनकी रणनीति में कमजोरी है उनका हाल यह होता है विपक्षी के डी के पास पहुंच कर उन्हें समझ मे ही नहीं आता कि अच्छे मूव कैसे बनाएं। और इस चक्कर में सही मौका हाथ से निकल जाता है। जबकि उपरोक्त चारों टीमों के साथ ऐसी दिक्कत नहीं है। उनके खिलाड़ी फटाफट मूव बनाते हैं जैसे कि उन्होंने पहले से रिहर्सल कर रखा हो।
यहां चार टीमों को चुनने से मेरा इरादा को शर्त जैसा लगाने का नहीं है। मैं इन्हें सिर्फ इंटेलिजेंट गेसेज़ मानता हूं। और इसलिए अभी अंतिम विजेता या यहां तक कि फाइनलिस्टों की भी बात नहीं कर रहा हूं। हालांकि माकूल समय आने पर उनकी भी बात की जाएगी।
अगर आपके कुछ इंटेलिजेंट गेसेज़ हों या इस खेल के बारे में कुछ कहना हो या आपकी कोई 'गट फीलिंग' हो, तो कृपया यहां ज़रूर साझा करें।
वस्तुगत यथार्थ की तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति का एक प्रयास.....क्योंकि यदि रूप ही अन्तर्वस्तु का द्योतक होता तो विज्ञान की ज़रूरत ही नहीं होती!
Monday, June 28, 2010
Thursday, June 17, 2010
यूनियन कार्बाइड (भोपाल गैस कांड) और ग्रेजि़यानो (सीईओ की मौत) - एक संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन।
घटना
यूनियन कार्बाइड - दिसंबर 2-3, 1984 की रात को अमेरिकी कंपनी की भारतीय सहायक कंपनी (यू सी आई एल) के प्लांट से जहरीली गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोगों की मौत और लाखों लोग प्रभावित।
ग्रेजि़यानो - ग्रेटर नोएडा स्थित ग्रेजियानो कंपनी के मजदूरों का आंदोलन और इस दौरान सीईओ ललित किशोर चौधरी की मौत।
घटना का कारण
यूनियन कार्बाइड - मुनाफे की हवस में शीर्ष प्रबंधन की जानकारी और आदेश पर बरती गई हर प्रकार की लापरवाही। निर्देशों की अवहेलना करते हुए बहुत अधिक मात्रा में अत्यंत जहरीली गैस का भंडारण। गैस को ठंडा करने वाले यंत्र का लंबे समय से बेकार पड़े रहना। चेतावनी देने वाले यंत्रों का काम न करना। यानी कि सारी की सारी जानबूझकर की गई लापरवाहियां।
ग्रेजियानो - अमानवीय कार्यस्थितियों, कम वेतन, छंटनी, प्रबंधन और उसके द्वारा पाले गए गुण्डों द्वारा गाली-गलौच और यूनियन बनाने की मांग पर मजदूरों ने आन्दोलन शुरू किया। कंपनी और ठेकेदारों के गुण्डों ने मजदूरों पर जानलेवा हमला किया (आजकल ये सभी उद्योगों में आम बात है)। सरिया, डंडों से मजदूरों की पिटाई की गई, सुरक्षा गार्डों ने फायरिंग भी की। लगभग 35 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस का दस्ता इस बीच पास में ही खड़ा रहा और प्रबंधन के इशारे पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि प्रबंधन अपने गुण्डों से मजदूरों को पिटवाकर अपनी ताकत दिखाना चाहता था। इस दौरान ग्रेजियानो के सीईओ ललित चौधरी को सिर पर चोट लग गई जो उनकी मौत का कारण बनी। क्या हुआ, कैसे हुआ यह किसी ने नहीं देखा। सीईओ की पत्नी के अनुसार ललित चौधरी की मौत व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा थी, मजदूरों के आंदोलन से उसका कोई संबंध नहीं था।
घटना के बाद की कार्रवाई
यूनियन कार्बाइड - कंपनी के मालिक वारेन एंडरसन को वीआईपी सरकारी मेहमान की तरह सरकारी हेलिकॉप्टर से भगा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उस समय कहा कि हम किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते हैं। कुछ अखबारों ने लिखा कि यह मजदूरों की करतूत थी। लगभग 26 साल तक कानूनी नौटंकी जिसमें जघन्य आरोपों को मामूली लापरवाही में तब्दील कर दिया गया। सजा के नाम पर प्रमुख आरोपियों को 2-2 साल की सजा हुई। सजा के साथ ही साथ जमानत भी थमा दी गई।
ग्रेजियानो - सीईओ की मौत के बाद सरकार से लेकर प्रशासनिक तंत्र और अदालत तक और उद्योगपतियों की संस्थाओं से लेकर मीडिया तक सबने एकसाथ मजदूरों पर हल्ला बोल दिया। इस मुद्दे पर सरकार ने वरिष्ठ नौकरशाहों और पूंजीपतियों की एक कमेटी बनाई। पुलिस ने मजदूरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पकड़ा, बर्बर ढंग से पीटा और 137 मजदूरों को हिरासत में लिया। 63 पर सीईओ की हत्या करने का आरोप लगाया गया। बाकियों पर बलवा करने और शांति भंग करने का आरोप लगाया गया। इस बार न्यायालय ने बड़ी मुस्तैदी से मजदूरों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। मजदूरों के साथ इंसानों जैसा बर्ताव करने का अनुरोध करने की हिमाकत करने के चलते तत्कालीन श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडीज को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा। गरीब मजदूरों के परिवार सड़क पर आ गए। मीडिया को न पहले उनकी चिंता थी न अब है।
यह केवल दो घटनाओं से संबंधित तथ्यों की एक संक्षिप्त प्रस्तुति है: निष्कर्ष निकालने का काम पाठक स्वयं करें।
ग्रेजियानों की घटना के बारे में अधिक विस्तार से जानने के लिए मेरी एक पुरानी पोस्ट देखें।
यूनियन कार्बाइड - दिसंबर 2-3, 1984 की रात को अमेरिकी कंपनी की भारतीय सहायक कंपनी (यू सी आई एल) के प्लांट से जहरीली गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोगों की मौत और लाखों लोग प्रभावित।
ग्रेजि़यानो - ग्रेटर नोएडा स्थित ग्रेजियानो कंपनी के मजदूरों का आंदोलन और इस दौरान सीईओ ललित किशोर चौधरी की मौत।
घटना का कारण
यूनियन कार्बाइड - मुनाफे की हवस में शीर्ष प्रबंधन की जानकारी और आदेश पर बरती गई हर प्रकार की लापरवाही। निर्देशों की अवहेलना करते हुए बहुत अधिक मात्रा में अत्यंत जहरीली गैस का भंडारण। गैस को ठंडा करने वाले यंत्र का लंबे समय से बेकार पड़े रहना। चेतावनी देने वाले यंत्रों का काम न करना। यानी कि सारी की सारी जानबूझकर की गई लापरवाहियां।
ग्रेजियानो - अमानवीय कार्यस्थितियों, कम वेतन, छंटनी, प्रबंधन और उसके द्वारा पाले गए गुण्डों द्वारा गाली-गलौच और यूनियन बनाने की मांग पर मजदूरों ने आन्दोलन शुरू किया। कंपनी और ठेकेदारों के गुण्डों ने मजदूरों पर जानलेवा हमला किया (आजकल ये सभी उद्योगों में आम बात है)। सरिया, डंडों से मजदूरों की पिटाई की गई, सुरक्षा गार्डों ने फायरिंग भी की। लगभग 35 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस का दस्ता इस बीच पास में ही खड़ा रहा और प्रबंधन के इशारे पर कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि प्रबंधन अपने गुण्डों से मजदूरों को पिटवाकर अपनी ताकत दिखाना चाहता था। इस दौरान ग्रेजियानो के सीईओ ललित चौधरी को सिर पर चोट लग गई जो उनकी मौत का कारण बनी। क्या हुआ, कैसे हुआ यह किसी ने नहीं देखा। सीईओ की पत्नी के अनुसार ललित चौधरी की मौत व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा थी, मजदूरों के आंदोलन से उसका कोई संबंध नहीं था।
घटना के बाद की कार्रवाई
यूनियन कार्बाइड - कंपनी के मालिक वारेन एंडरसन को वीआईपी सरकारी मेहमान की तरह सरकारी हेलिकॉप्टर से भगा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उस समय कहा कि हम किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते हैं। कुछ अखबारों ने लिखा कि यह मजदूरों की करतूत थी। लगभग 26 साल तक कानूनी नौटंकी जिसमें जघन्य आरोपों को मामूली लापरवाही में तब्दील कर दिया गया। सजा के नाम पर प्रमुख आरोपियों को 2-2 साल की सजा हुई। सजा के साथ ही साथ जमानत भी थमा दी गई।
ग्रेजियानो - सीईओ की मौत के बाद सरकार से लेकर प्रशासनिक तंत्र और अदालत तक और उद्योगपतियों की संस्थाओं से लेकर मीडिया तक सबने एकसाथ मजदूरों पर हल्ला बोल दिया। इस मुद्दे पर सरकार ने वरिष्ठ नौकरशाहों और पूंजीपतियों की एक कमेटी बनाई। पुलिस ने मजदूरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पकड़ा, बर्बर ढंग से पीटा और 137 मजदूरों को हिरासत में लिया। 63 पर सीईओ की हत्या करने का आरोप लगाया गया। बाकियों पर बलवा करने और शांति भंग करने का आरोप लगाया गया। इस बार न्यायालय ने बड़ी मुस्तैदी से मजदूरों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। मजदूरों के साथ इंसानों जैसा बर्ताव करने का अनुरोध करने की हिमाकत करने के चलते तत्कालीन श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडीज को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा। गरीब मजदूरों के परिवार सड़क पर आ गए। मीडिया को न पहले उनकी चिंता थी न अब है।
यह केवल दो घटनाओं से संबंधित तथ्यों की एक संक्षिप्त प्रस्तुति है: निष्कर्ष निकालने का काम पाठक स्वयं करें।
ग्रेजियानों की घटना के बारे में अधिक विस्तार से जानने के लिए मेरी एक पुरानी पोस्ट देखें।
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भोपाल त्रासदी
Thursday, June 10, 2010
आज अगर नीरो होता...
इतिहास ने स्वयं को दोहराया तो जरूर पर जहां त्रासदी संहारक थी वहीं प्रहसन इतिहास की एक शर्मनाक प्रतीक घटना बनकर सामने आया है। 26 साल पहले हुई त्रासदी को अंजाम देने वालों को एक लंबी, उबाऊ और कष्टप्रद नौटंकी के बाद सजा के नाम पर तोहफे बांटे जा रहे हैं। 26 साल पहले इंसानियत रोई थी, आज वो शर्मसार है।
क्या लिखूं कुछ सूझ नहीं रहा है। पड़ोस के घरों से टीवी पर चल रहे किसी लाफ्टर शो के जजों और दर्शकों की अर्थहीन हंसी सोचने की प्रक्रिया को बाधित कर रही है। हां इस शर्मनाक घड़ी में भी लाफ्टर शो देखने वालों की कमी नहीं है। गनीमत है कि कोर्ट का यह फैसला आईपीएल के बीत जाने के बाद आया है वर्ना मीडिया वाले भी इस मुद्दे पर इतना समय जाया न करते।
15000 लोगों को कत्ल करने वाले को जनता के प्रतिनिधियों ने सरकारी हेलिकॉप्टर से भगा दिया। जनता की फिक्र करने वाली कोर्ट ने 26 साल तक भुक्तभोगियों को घाट-घाट का पानी पिलाया। आज एक तरफ जहां अपराधियों को प्रसाद बांटे जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ उसी पार्टी की सरकार न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल तैयार कर रही है जिसमें भविष्य के ऐसे अपराधियों को हल्के में छोड़ देने के लिए कानूनी उपाय किए जा रहे हैं। एक जनप्रतिनिधि (कानून मंत्री) दिलासा दे रहे हैं कि केस बंद नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ से यह भी कह रहे हैं कि सरकार ने एंडरसन मामले में सीबीआई पर दबाव नहीं डाला था। 19 साल बाद रुचिका को तो न्याय लगता है मिल गया, पर भोपाल के लाखों लोगों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है।
अचानक जोरदार हंसी से पूरा मुहल्ला गूंज उठता है। किसी प्रतिस्पर्धी ने एक द्धिअर्थी चुटकुला सुनाया है। सेंसर बोर्ड के अलावा बाकी दुनिया को इस चुटकुले का एक ही अर्थ समझ में आएगा। इस चुटकुले पर सबसे जोर से हंसने वाला भी एक जनप्रतिधि है। ऐसा लगता है कि उसने सारी दुनिया की हंसी पर कब्जा कर लिया है और हंसे चले जाता है। उसकी हंसी में कभी बेशर्मी तो कभी अश्लीलता झलकती है। जनता के पास हंसने का कोई कारण ही नहीं बचा है। इसलिए आजकल हंसी को व्यायाम बना दिया गया है। एक ज्ञानी कहता है रोज इतनी देर हंसा करो (चाहे हिरोशिमा पर बम गिरे चाहे भोपाल में गैस रिसने से लोग मरें) नहीं तो फलाने-फलाने रोग हो जाएगा। कुछ लोग डर के मारे हंसते हैं। वे हंसी अफोर्ड कर सकते हैं, जनता नहीं कर सकती। जनता तो सिर्फ अपने ऊपर हंस सकती है। जनता केवल बेबसी की हंसी हंस सकती है, अपना चू..या कटते हुए देख कर हंस सकती है।
आज नीरो होता तो शायद भोपाल के किसी घर में टीवी पर लाफ्टर शो देख रहा होता।
क्या लिखूं कुछ सूझ नहीं रहा है। पड़ोस के घरों से टीवी पर चल रहे किसी लाफ्टर शो के जजों और दर्शकों की अर्थहीन हंसी सोचने की प्रक्रिया को बाधित कर रही है। हां इस शर्मनाक घड़ी में भी लाफ्टर शो देखने वालों की कमी नहीं है। गनीमत है कि कोर्ट का यह फैसला आईपीएल के बीत जाने के बाद आया है वर्ना मीडिया वाले भी इस मुद्दे पर इतना समय जाया न करते।
15000 लोगों को कत्ल करने वाले को जनता के प्रतिनिधियों ने सरकारी हेलिकॉप्टर से भगा दिया। जनता की फिक्र करने वाली कोर्ट ने 26 साल तक भुक्तभोगियों को घाट-घाट का पानी पिलाया। आज एक तरफ जहां अपराधियों को प्रसाद बांटे जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ उसी पार्टी की सरकार न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल तैयार कर रही है जिसमें भविष्य के ऐसे अपराधियों को हल्के में छोड़ देने के लिए कानूनी उपाय किए जा रहे हैं। एक जनप्रतिनिधि (कानून मंत्री) दिलासा दे रहे हैं कि केस बंद नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ से यह भी कह रहे हैं कि सरकार ने एंडरसन मामले में सीबीआई पर दबाव नहीं डाला था। 19 साल बाद रुचिका को तो न्याय लगता है मिल गया, पर भोपाल के लाखों लोगों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है।
अचानक जोरदार हंसी से पूरा मुहल्ला गूंज उठता है। किसी प्रतिस्पर्धी ने एक द्धिअर्थी चुटकुला सुनाया है। सेंसर बोर्ड के अलावा बाकी दुनिया को इस चुटकुले का एक ही अर्थ समझ में आएगा। इस चुटकुले पर सबसे जोर से हंसने वाला भी एक जनप्रतिधि है। ऐसा लगता है कि उसने सारी दुनिया की हंसी पर कब्जा कर लिया है और हंसे चले जाता है। उसकी हंसी में कभी बेशर्मी तो कभी अश्लीलता झलकती है। जनता के पास हंसने का कोई कारण ही नहीं बचा है। इसलिए आजकल हंसी को व्यायाम बना दिया गया है। एक ज्ञानी कहता है रोज इतनी देर हंसा करो (चाहे हिरोशिमा पर बम गिरे चाहे भोपाल में गैस रिसने से लोग मरें) नहीं तो फलाने-फलाने रोग हो जाएगा। कुछ लोग डर के मारे हंसते हैं। वे हंसी अफोर्ड कर सकते हैं, जनता नहीं कर सकती। जनता तो सिर्फ अपने ऊपर हंस सकती है। जनता केवल बेबसी की हंसी हंस सकती है, अपना चू..या कटते हुए देख कर हंस सकती है।
आज नीरो होता तो शायद भोपाल के किसी घर में टीवी पर लाफ्टर शो देख रहा होता।
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Wednesday, April 21, 2010
नैतिकता पर महान वैज्ञानिक नील्स बोर के विचार।
नील्स बोर सिर्फ एक महान वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि अपने समय के महान सिद्धान्तकार और दार्शनिक भी थे। एक बार उन्होंने बताया कि अपने विद्यार्थी जीवन में वे दर्शन पर कुछ लिखने को लालायित थे। क्वाण्टम भौतिकी की एक किताब से यह उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं :
वास्तव में वे (नील्स बोर) स्वतंत्र इच्छा की समस्या का गणितीय समाधान खोज रहे थे। यदि प्रकृति में सब कुछ पूर्वनिश्चित है और मनुष्य अपनी इच्छा को क्रियान्वित करने के लिए स्वतन्त्र नहीं है तो कोई भी नैतिक मानदण्ड अर्थहीन हैं; चूंकि मनुष्य अपने व्यवहार में स्वतन्त्र नहीं है तो विवेक और नैतिकता की बात करना निराधार है। लेकिन यदि स्वतन्त्र इच्छा है तो शास्त्रीय नियतिवाद के साथ कोई कैसे इसका सामंजस्य कर सकता है, जिसके अनुसार प्रकृति में हर चीज विशुद्ध आवश्यकता द्वारा नियन्त्रित होती है।
उनकी जीवनी के सिर्फ इस तथ्य से हम शास्त्रीय नियतिवाद, यानी ब्रह्मांड में घटनाओं की पूर्वनिर्धारकता की अवधारणा के विध्वंस में उनकी भूमिका का अनुमान लगा सकते हैं।
(क्वाण्टम जगत की संभाव्यताएं - दानियल दानिन)
वास्तव में वे (नील्स बोर) स्वतंत्र इच्छा की समस्या का गणितीय समाधान खोज रहे थे। यदि प्रकृति में सब कुछ पूर्वनिश्चित है और मनुष्य अपनी इच्छा को क्रियान्वित करने के लिए स्वतन्त्र नहीं है तो कोई भी नैतिक मानदण्ड अर्थहीन हैं; चूंकि मनुष्य अपने व्यवहार में स्वतन्त्र नहीं है तो विवेक और नैतिकता की बात करना निराधार है। लेकिन यदि स्वतन्त्र इच्छा है तो शास्त्रीय नियतिवाद के साथ कोई कैसे इसका सामंजस्य कर सकता है, जिसके अनुसार प्रकृति में हर चीज विशुद्ध आवश्यकता द्वारा नियन्त्रित होती है।
उनकी जीवनी के सिर्फ इस तथ्य से हम शास्त्रीय नियतिवाद, यानी ब्रह्मांड में घटनाओं की पूर्वनिर्धारकता की अवधारणा के विध्वंस में उनकी भूमिका का अनुमान लगा सकते हैं।
(क्वाण्टम जगत की संभाव्यताएं - दानियल दानिन)
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Thursday, March 11, 2010
संविधान के निर्माताओं को चार बच्चों की तरफ से खुला पत्र।
परम आदरणीय संविधान निर्माताओ,
सुना था कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है। हम सोचते थे बड़ा होगा तो भारी-भरकम भी होगा। मगर कितना भारी होगा इसका अहसास चन्द दिन पहले ही हो सका। इसमें लिखित कानून के एक छोटे से उपवाक्य और उसे लागू करने वाले एक अदना से कारिन्दे ने हमें संविधान की ताकत का ऐसा अहसास कराया कि जिन्दगी भर के लिए उसका भय और उसके प्रति श्रद्धा हमारे अन्तस्तल में समा गयी।
लोग कहते थे खुदा की इज्जत करो या न करो मगर कानून की इज्जत करो। कानून से डरो। हम सोचते थे कानून क्या हिटलर है जिससे डरने की जरूरत हो। पर हम नादान थे। हमें माफ करना।
पाश कहते थे 'यह किताब मर गई है'। हमने कभी फिक्र ही नहीं किया कि मरी है या जिन्दा है। मगर बुलाओं पाश को और हमें दिखाकर पूछो कि अगर यह किताब मर गई है तो खाकी रंग के कपड़े में इतना गुरूर कहां से आया।
हे श्रेष्ठजनो, हे महापुरुषो।
अगली बार जब हम परीक्षा में बैठेंगे और हमसे संविधान के बारे में पूछा जाएगा तो हम प्रत्यक्ष अनुभव से अर्जित समस्त संवेदना और आवेग के साथ उसका गुणगान करेंगे। हम उस एक-एक बुनियादी अधिकार की सोदाहरण व्याख्या करेंगे जिसकी अमिट छाप उस सर्वशक्तिमान डण्डे ने हमारी पीठ पर उकेरी है। हम उस डण्डे के आभारी है और आपके भी जिन्होंने उस डण्डे में इतनी ताकत सौंपी। हे परमपूज्यो, संविधान प्रदत्त शक्ति से अघाए-बौराए और कानूनी मान्यता के घमंड में चूर उस डण्डे की महिमा का बखान हम शब्दों में नहीं कर सकते। हम नादान हैं, हमारे पास तो सिर्फ अहसास हैं। और कानून अहसास नहीं शब्द मांगता है।
हे महाऋषियो,
हम तो आपके रचित संविधान के टेढ़े-मेढ़े वाक्यों को पढ़ भी नहीं सकते, समझना तो दूर की बात है। हमें तो उनके कॉमा और फुलस्टॉप से भी डर लगता है। पता नहीं कब कौन सा कॉमा और फुलस्टॉप हमें फिर हवालात की सैर करा दे। और हम तो शिकायत भी नहीं कर सकते। क्योंकि तुमने हमारे ही द्वारा इस संविधान को हमें 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' करवा दिया है। अब अगर हमारा ही कानून हमारे ऊपर लागू किया जा रहा है तो हम शिकायत करें भी तो किस मुंह से और किससे। यह दीगर बात है कि संविधान को हमसे 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' करवाने से पहले कभी हमसे और हमारे बाप-दादाओं से पूछा भी नहीं गया। हमें तो बताने की जरूरत भी नहीं समझी गई। हमें तो यह मालूम करने के लिए हवालात जाना पड़ा। तुम कितने दूरदर्शी थे महापुरुषों, तुम्हें हवालात की जरूरत का अहसास उसी समय हो गया था।
हे ज्ञानियों में ज्ञानी, परमज्ञानी बाबा साहेब अंबेडकर,
आपने कहा था कि यह दुनिया का सबसे बढि़या संविधान है। अगर यह संविधान भी लोगों को ठीक नहीं कर सकता तो फिर लोगों में ही कोई खराबी है। क्योंकि संविधान में खराबी की गुंजाइश है ही नहीं।
बाबा साहेब आपने कहा। हमने माना। साठ साल से आपका कहा रटते रहे। अब तो विश्वास भी हो गया। हमारी पीठ को ही कोई चुल्ल उठी होगी। वरना डंडे में खराबी की कोई गुंजाइश ही कहां है। डण्डे के लिए तो सब बराबर हैं। समानता के अधिकार की असली व्याख्या तो पुलिस का डण्डा ही कर सकता है। वह बरसता है तो बस बरसता ही चला जाता है जबतक कि कानून का राद्दा न जमा दे। बस नहीं बरसता तो उन लोगों पर जिनके पोस्टर लगते हैं। जिनकी मूर्तियां बनती हैं। जो डण्डे को नाप सकते हैं, तौल सकते हैं, खरीद और बेच सकते हैं।
हे परम श्रद्धेय आधुनिक परमपिताओ,
हम अज्ञानियों को क्षमा करना। हमारे अज्ञान के कारण ही तो संविधान बनाने में हमारी राय नहीं ली गई। ज्ञान खरीदने की कूव्वत रखने वाले 15 प्रतिशत लोगों ने यह पवित्र ग्रन्थ हमें सौंपा है। हमें इस जिम्मेदारी को समझना है। इसका बोझ अपने कन्धे पर उठाना और उठाये रखना ही हमारा परम कर्तव्य है। हमारे उद्धार का और कोई मार्ग नहीं है। बाबा साहेब की उठी हुई उंगली इसी मार्ग की तरफ इशारा करती है।
परम श्रद्धा और अन्धभक्ति के साथ,
-- चार अज्ञानी
(उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के पोस्टर को बदरंग करने के कथित आरोप में एक पुलिस अधिकारी ने चार बच्चों को कई दिन तक हवालात में रखा था जबकि उनकी परीक्षाएं चल रही थीं। असलियत यह थी कि अपने किसी रिश्तेदार के बच्चे का उस स्कूल में दाखिला न होने से जिसके वे चारों बच्चे छात्र थे, अधिकारी महोदय ने खुन्नस निकालने के लिए यह कार्रवाई की थी। पुलिस अधिकारी की इस अनैतिक कार्रवाई से संविधान के किसी भी नियम कानून का उल्लंघन नहीं हुआ और उसपर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई (जहां तक मुझे ज्ञात है)। प्रश्न यह है कि हमारे देश का यह कैसा संविधान है जो इसप्रकार की हरकत होने देता है। क्या इसकी कोई गारंटी है कि आगे से ऐसा नहीं होगा। संविधान के पास इन बच्चों को देने के लिए क्या स्पष्टीकरण है।)
सुना था कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है। हम सोचते थे बड़ा होगा तो भारी-भरकम भी होगा। मगर कितना भारी होगा इसका अहसास चन्द दिन पहले ही हो सका। इसमें लिखित कानून के एक छोटे से उपवाक्य और उसे लागू करने वाले एक अदना से कारिन्दे ने हमें संविधान की ताकत का ऐसा अहसास कराया कि जिन्दगी भर के लिए उसका भय और उसके प्रति श्रद्धा हमारे अन्तस्तल में समा गयी।
लोग कहते थे खुदा की इज्जत करो या न करो मगर कानून की इज्जत करो। कानून से डरो। हम सोचते थे कानून क्या हिटलर है जिससे डरने की जरूरत हो। पर हम नादान थे। हमें माफ करना।
पाश कहते थे 'यह किताब मर गई है'। हमने कभी फिक्र ही नहीं किया कि मरी है या जिन्दा है। मगर बुलाओं पाश को और हमें दिखाकर पूछो कि अगर यह किताब मर गई है तो खाकी रंग के कपड़े में इतना गुरूर कहां से आया।
हे श्रेष्ठजनो, हे महापुरुषो।
अगली बार जब हम परीक्षा में बैठेंगे और हमसे संविधान के बारे में पूछा जाएगा तो हम प्रत्यक्ष अनुभव से अर्जित समस्त संवेदना और आवेग के साथ उसका गुणगान करेंगे। हम उस एक-एक बुनियादी अधिकार की सोदाहरण व्याख्या करेंगे जिसकी अमिट छाप उस सर्वशक्तिमान डण्डे ने हमारी पीठ पर उकेरी है। हम उस डण्डे के आभारी है और आपके भी जिन्होंने उस डण्डे में इतनी ताकत सौंपी। हे परमपूज्यो, संविधान प्रदत्त शक्ति से अघाए-बौराए और कानूनी मान्यता के घमंड में चूर उस डण्डे की महिमा का बखान हम शब्दों में नहीं कर सकते। हम नादान हैं, हमारे पास तो सिर्फ अहसास हैं। और कानून अहसास नहीं शब्द मांगता है।
हे महाऋषियो,
हम तो आपके रचित संविधान के टेढ़े-मेढ़े वाक्यों को पढ़ भी नहीं सकते, समझना तो दूर की बात है। हमें तो उनके कॉमा और फुलस्टॉप से भी डर लगता है। पता नहीं कब कौन सा कॉमा और फुलस्टॉप हमें फिर हवालात की सैर करा दे। और हम तो शिकायत भी नहीं कर सकते। क्योंकि तुमने हमारे ही द्वारा इस संविधान को हमें 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' करवा दिया है। अब अगर हमारा ही कानून हमारे ऊपर लागू किया जा रहा है तो हम शिकायत करें भी तो किस मुंह से और किससे। यह दीगर बात है कि संविधान को हमसे 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' करवाने से पहले कभी हमसे और हमारे बाप-दादाओं से पूछा भी नहीं गया। हमें तो बताने की जरूरत भी नहीं समझी गई। हमें तो यह मालूम करने के लिए हवालात जाना पड़ा। तुम कितने दूरदर्शी थे महापुरुषों, तुम्हें हवालात की जरूरत का अहसास उसी समय हो गया था।
हे ज्ञानियों में ज्ञानी, परमज्ञानी बाबा साहेब अंबेडकर,
आपने कहा था कि यह दुनिया का सबसे बढि़या संविधान है। अगर यह संविधान भी लोगों को ठीक नहीं कर सकता तो फिर लोगों में ही कोई खराबी है। क्योंकि संविधान में खराबी की गुंजाइश है ही नहीं।
बाबा साहेब आपने कहा। हमने माना। साठ साल से आपका कहा रटते रहे। अब तो विश्वास भी हो गया। हमारी पीठ को ही कोई चुल्ल उठी होगी। वरना डंडे में खराबी की कोई गुंजाइश ही कहां है। डण्डे के लिए तो सब बराबर हैं। समानता के अधिकार की असली व्याख्या तो पुलिस का डण्डा ही कर सकता है। वह बरसता है तो बस बरसता ही चला जाता है जबतक कि कानून का राद्दा न जमा दे। बस नहीं बरसता तो उन लोगों पर जिनके पोस्टर लगते हैं। जिनकी मूर्तियां बनती हैं। जो डण्डे को नाप सकते हैं, तौल सकते हैं, खरीद और बेच सकते हैं।
हे परम श्रद्धेय आधुनिक परमपिताओ,
हम अज्ञानियों को क्षमा करना। हमारे अज्ञान के कारण ही तो संविधान बनाने में हमारी राय नहीं ली गई। ज्ञान खरीदने की कूव्वत रखने वाले 15 प्रतिशत लोगों ने यह पवित्र ग्रन्थ हमें सौंपा है। हमें इस जिम्मेदारी को समझना है। इसका बोझ अपने कन्धे पर उठाना और उठाये रखना ही हमारा परम कर्तव्य है। हमारे उद्धार का और कोई मार्ग नहीं है। बाबा साहेब की उठी हुई उंगली इसी मार्ग की तरफ इशारा करती है।
परम श्रद्धा और अन्धभक्ति के साथ,
-- चार अज्ञानी
(उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के पोस्टर को बदरंग करने के कथित आरोप में एक पुलिस अधिकारी ने चार बच्चों को कई दिन तक हवालात में रखा था जबकि उनकी परीक्षाएं चल रही थीं। असलियत यह थी कि अपने किसी रिश्तेदार के बच्चे का उस स्कूल में दाखिला न होने से जिसके वे चारों बच्चे छात्र थे, अधिकारी महोदय ने खुन्नस निकालने के लिए यह कार्रवाई की थी। पुलिस अधिकारी की इस अनैतिक कार्रवाई से संविधान के किसी भी नियम कानून का उल्लंघन नहीं हुआ और उसपर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई (जहां तक मुझे ज्ञात है)। प्रश्न यह है कि हमारे देश का यह कैसा संविधान है जो इसप्रकार की हरकत होने देता है। क्या इसकी कोई गारंटी है कि आगे से ऐसा नहीं होगा। संविधान के पास इन बच्चों को देने के लिए क्या स्पष्टीकरण है।)
Thursday, March 4, 2010
ज्योति बसु, राजकिशोर और द्वंद्ववाद...
मैं विकट दुविधा में फंस गया था। बात ही कुछ ऐसी थी कि मेरी जानकारी की कोई परिभाषा उसपर फिट ही नहीं बैठ रही थी। इसे निषेध का निषेध कहूं या विपरीत तत्वों की एकता। दार्शनिकों के हवाले से सुना था कि कोई चीज एक ही समय पर वह चीज हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। पर इस ज्ञान का ऐसा प्रयोग पहले कभी देखा-सुना नहीं था। हालांकि इसकी पूरी अपेक्षा थी कि यह काम कोई हिंदुस्तानी विचारक ही कर सकता था।
''ज्योति बाबू कम्युनिस्ट थे भी और नहीं भी''। अमूर्तन की गहराई में उतरने की अपनी अक्षमता के कारण मैंने जमीनी तर्क-वितर्क से समझने का प्रयास किया। सही बात तो यह है कि उदाहरणों और अपवादों को जाने बिना मुझे कोई परिभाषा समझ में ही नहीं आती है। वह भी तब जबकि वह इतनी मौलिक और अनूठी हो।
वैसे पिछड़े देशों के बुद्धिजीवियों को लगता है कि जबतक वे कोई मौलिक बात नहीं कहेंगे तबतक उनकी बुद्धिजीविता संदेह के घेरे में रहेगी इसलिए वे हमेशा कुछ न कुछ मौलिक कहने के दबाव में रहते हैं। वैसे ही जैसे न्यूज चैनल स्टिंग ऑपरेशन करने के दबाव में रहते हैं। जैसे नेपाल के माओवादियों को ही देखिए। अपने देश में क्रान्ति सम्पन्न भले ही न कर पाए हों लेकिन मार्क्सवाद में कुछ नया जोड़ने का ऐलान तो कर ही दिया। एक नया 'पथ' भी शोध लाए। दो वर्गों की संयुक्त तानाशाही का नया फॉर्मूला भी पेश कर दिया। दीगर बात है कि यह फॉर्मूला मार्क्सवाद/लेनिनवाद/माओवाद की किसी प्रस्थापना द्वारा पुष्ट या प्रमाणित नहीं होता। खैर इसकी फिक्र करने की जरूरत क्या है जरूरत तो यह है कि जब भी मुंह खोलो तो कोई मौलिक सिद्धांत ही टपकना चाहिए।
लर्मन्तोव ने एक जगह लिखा है कि रूसी लोगों को तबतक कोई कहानी समझ में नहीं आती जबतक कि कहानी के अंत में कोई सबक न निकलता हो। उसी तरह भारतीय बुद्धिजीवी को तबतक संतोष नहीं होता जबतक कि वह हर एक घटना को किसी मौलिक सिद्धांत से व्याख्यायित न कर ले।
खैर मुद्दा यह था कि ज्योति बाबू कम्युनिस्ट थे भी और नहीं भी। तो प्रश्न यह था कि वह कितना कम्युनिस्ट थे और कितना नहीं थे। या प्रश्न को और ठोस ढंग से रखें तो वे कितने प्रतिशत कम्युनिस्ट थे और कितने प्रतिशत नहीं थे। यह तो कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है कि कहीं वे स्प्लिट पर्सनाल्टी वाले व्यक्ति तो नहीं थे। और राजकिशोर जी ही यह बता सकते हैं कि वे दिन के कितने घंटे कम्युनिस्ट होते थे और कितने घंटे सज्जन (ध्यान रहे राजकिशोर जी ने बिना कोई प्रमाण दिए अपनी यह मूल प्रस्थापना भी दी है कि कम्युनिस्ट होना और सज्जन होना परस्पर अपवर्जी (म्युचुअली एक्स्क्लूसिव) गुण हैं)। कहीं ऐसा तो नहीं कि वे दिन में कम्युनिस्ट होते थे रात में सज्जन।
मैंने इस मौलिक प्रस्थापना को समझने के लिए इसे ज्योति बाबू के अतीत पर लागू करने की तरकीब सोची। साथ ही मेरी सीमित कल्पना के टुच्चे घोड़े भी दौड़ने लगे। मैं सोचने लगा कि ज्योति बाबू जब कम्युनिस्ट का रूप धारण करते होंगे तो क्या करते होंगे और जब सज्जन का रूप धारण करते होंगे तो क्या करते होंगे। जब वे मजदूरों-किसानों के हक की बात करते थे तब क्या होते थे और जब बहुराष्ट्रीय कंपनियो को अपने राज्य को लूटने का न्यौता देते विदेशों की सैर करते थे तब क्या होते थे। जब वे कहते थे कि सर्वहारा के पास खोने के लिए सिर्फ अपनी बेडि़यां हैं तब क्या होते थे और जब वे धमकाते थे कि मजदूरों की भलाई इसी में है कि वे उत्पादन बढ़ाने में मालिकों का साथ दें तब क्या होते थे। जब उनकी पार्टी कम्युनिस्टों का कत्लेआम करने में मदद करने वाले सलीम ग्रुप को औने-पौने दाम में जमीन का कब्जा दे रही थी तब वे कम्युनिस्ट थे या सज्जन। पश्चिम बंगाल में माकपाई काडरों की गुण्डागर्दी और समान्तर सरकार को मुख्यमंत्री के तौर पर संरक्षण देते हुए वे कम्युनिस्ट व्यवहार कर रहे थे या सज्जनता का।
बुद्धिजीवी ने कहा है कि कम्युनिज्म और सज्जनता में जब भी कोई द्वंद्व हुआ तो उन्होंने सज्जनता को चुना। मतलब यह कि वे सज्जन पहले थे और कम्युनिस्ट बाद में। जैसे उनके राज्य के एक बड़े कम्युनिस्ट नेता ने कहा कि मैं हिन्दू पहले हूं और कम्युनिस्ट बाद में। थोड़े ही दिन में कोई कहेगा कि मैं बंगाली पहले हूं और कम्युनिस्ट बाद में। जैसे कि लाल कृष्ण आडवाणी और राज ठाकरे ने कम्युनिज्म की दीक्षा ले ली हो।
अभी हाल ही में ज्योति बाबू की पार्टी के महासचिव ने कहा कि धर्म को मानने वालों पर कम्युनिस्ट पार्टी किसी प्रकार की रोक नहीं लगाती। माकपा जैसी पार्टी रोक लगा भी कैसे सकती है जिसके एक भूतपूर्व महासचिव ही जत्थेदार कम्युनिस्ट थे। जल्दी ही ऐसा भी हो सकता है कि माकपा का महासचिव छापा तिलक लगाए जनेऊ पहने राम-राम कहता नजर आए या यह भी हो सकता है कि वह पांच वक्त का नमाजी हो। भाजपा-शिवसेना का तो आधार ही खिसक जाएगा। यह तो सज्जनता की पराकाष्ठा हो जाएगी। कम्युनिज्म और सज्जनता का ऐसा बेजोड़ घोल हिन्दुस्तान में ही संभव है। और यदि ऐसा हुआ तो बुद्धिजीवियों की जमात से ज्यादा गदगद और कोई नहीं होगा।
भला इससे अच्छा क्या हो सकता है कि एक सज्जन कम्युनिस्ट संसद और विधानसभा का चुनाव लड़ते-लड़ते, पूंजीपतियों से आरजू-मिन्नत करके अठन्नी-चवन्नी मांगते-मांगते, क्राइम स्टोरीज पढ़ते-पढ़ते, संगीत सुनते-सुनते एक दिन टीवी-रेडियो पर देशवासियों को संदेश दे कि लो भैया समाजवाद आ गया। मूलाधार बदल गया। अब वर्गों का नामोनिशान नहीं रहेगा। मजदूर भाई और पूंजीपति भाई सब एकसाथ मिलकर समाजवाद का निर्माण करेंगे। अब वर्गों के बीच में कोई अंतरविरोध कोई झगड़ा नहीं रह गया है। हो सकता है कोई इसे समाजवाद की जगह रामराज्य भी कह दे। वैसे ही कई भारतीय बुद्धिजीवियों को मार्क्सवाद से एकमात्र कष्ट यही है कि वह विदेशी विचारधारा है। अगर इन बुद्धिजिवियों को किसी दिन पता चला कि धरती के गोल होने की बात भारत में नहीं किसी अन्य देश में खोजी गई थी तो वे फिर से धरती को चपटी मानने लगेंगे। या ऐसा भी कह सकते हैं कि बाकी देशों की धरती भले ही गोल हो मगर हमारे यहां की तो चपटी ही है। अगर गोल होती तो किसी देसी महात्मा ने ऐसा जरूर कहा होता।
प्रश्न बहुत हैं जवाब कम। हर प्रश्न का जवाब देना बुद्धिजीवियों का काम भी नहीं है। खासकर बड़े बुद्धिजीवियों का। वे तो मौलिक प्रस्थापनाएं और सूत्र देते हैं। कुछ छोटे बुद्धिजीवी उनका भाष्य करके तरह-तरह से उनकी व्याख्या करते हैं। व्याख्या करते-करते कुछ लोग कुछ नई मौलिक प्रस्थापनाएं पेश करते हैं। कुछ मौलिक नहीं करेंगे तो बुद्धिजीवी का तमगा कैसे मिलेगा।
तभी तो हमारे देश की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियां कहती हैं कि आज का समय पहले जैसा नहीं रहा। आज का सर्वहारा भी पहले जैसा नहीं रहा। आज का मार्क्सवाद भी पहले जैसा नहीं रहा। आखिर एंगेल्स ने ही तो कहा था कि समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है। कम्युनिस्ट सज्जन में तब्दील हो जाता है। मार्क्सवाद संशोधनवाद में। वर्ग संघर्ष की जगह वर्गों में भाईचारे की भावना आ जाती है।
एक अंतिम प्रश्न रह जाता है : क्या बुद्धिजीवी भी अपने विपरीत में बदल जाता है? अगर हां, तो बदलकर वह क्या हो जाता है?
''ज्योति बाबू कम्युनिस्ट थे भी और नहीं भी''। अमूर्तन की गहराई में उतरने की अपनी अक्षमता के कारण मैंने जमीनी तर्क-वितर्क से समझने का प्रयास किया। सही बात तो यह है कि उदाहरणों और अपवादों को जाने बिना मुझे कोई परिभाषा समझ में ही नहीं आती है। वह भी तब जबकि वह इतनी मौलिक और अनूठी हो।
वैसे पिछड़े देशों के बुद्धिजीवियों को लगता है कि जबतक वे कोई मौलिक बात नहीं कहेंगे तबतक उनकी बुद्धिजीविता संदेह के घेरे में रहेगी इसलिए वे हमेशा कुछ न कुछ मौलिक कहने के दबाव में रहते हैं। वैसे ही जैसे न्यूज चैनल स्टिंग ऑपरेशन करने के दबाव में रहते हैं। जैसे नेपाल के माओवादियों को ही देखिए। अपने देश में क्रान्ति सम्पन्न भले ही न कर पाए हों लेकिन मार्क्सवाद में कुछ नया जोड़ने का ऐलान तो कर ही दिया। एक नया 'पथ' भी शोध लाए। दो वर्गों की संयुक्त तानाशाही का नया फॉर्मूला भी पेश कर दिया। दीगर बात है कि यह फॉर्मूला मार्क्सवाद/लेनिनवाद/माओवाद की किसी प्रस्थापना द्वारा पुष्ट या प्रमाणित नहीं होता। खैर इसकी फिक्र करने की जरूरत क्या है जरूरत तो यह है कि जब भी मुंह खोलो तो कोई मौलिक सिद्धांत ही टपकना चाहिए।
लर्मन्तोव ने एक जगह लिखा है कि रूसी लोगों को तबतक कोई कहानी समझ में नहीं आती जबतक कि कहानी के अंत में कोई सबक न निकलता हो। उसी तरह भारतीय बुद्धिजीवी को तबतक संतोष नहीं होता जबतक कि वह हर एक घटना को किसी मौलिक सिद्धांत से व्याख्यायित न कर ले।
खैर मुद्दा यह था कि ज्योति बाबू कम्युनिस्ट थे भी और नहीं भी। तो प्रश्न यह था कि वह कितना कम्युनिस्ट थे और कितना नहीं थे। या प्रश्न को और ठोस ढंग से रखें तो वे कितने प्रतिशत कम्युनिस्ट थे और कितने प्रतिशत नहीं थे। यह तो कोई मनोवैज्ञानिक ही बता सकता है कि कहीं वे स्प्लिट पर्सनाल्टी वाले व्यक्ति तो नहीं थे। और राजकिशोर जी ही यह बता सकते हैं कि वे दिन के कितने घंटे कम्युनिस्ट होते थे और कितने घंटे सज्जन (ध्यान रहे राजकिशोर जी ने बिना कोई प्रमाण दिए अपनी यह मूल प्रस्थापना भी दी है कि कम्युनिस्ट होना और सज्जन होना परस्पर अपवर्जी (म्युचुअली एक्स्क्लूसिव) गुण हैं)। कहीं ऐसा तो नहीं कि वे दिन में कम्युनिस्ट होते थे रात में सज्जन।
मैंने इस मौलिक प्रस्थापना को समझने के लिए इसे ज्योति बाबू के अतीत पर लागू करने की तरकीब सोची। साथ ही मेरी सीमित कल्पना के टुच्चे घोड़े भी दौड़ने लगे। मैं सोचने लगा कि ज्योति बाबू जब कम्युनिस्ट का रूप धारण करते होंगे तो क्या करते होंगे और जब सज्जन का रूप धारण करते होंगे तो क्या करते होंगे। जब वे मजदूरों-किसानों के हक की बात करते थे तब क्या होते थे और जब बहुराष्ट्रीय कंपनियो को अपने राज्य को लूटने का न्यौता देते विदेशों की सैर करते थे तब क्या होते थे। जब वे कहते थे कि सर्वहारा के पास खोने के लिए सिर्फ अपनी बेडि़यां हैं तब क्या होते थे और जब वे धमकाते थे कि मजदूरों की भलाई इसी में है कि वे उत्पादन बढ़ाने में मालिकों का साथ दें तब क्या होते थे। जब उनकी पार्टी कम्युनिस्टों का कत्लेआम करने में मदद करने वाले सलीम ग्रुप को औने-पौने दाम में जमीन का कब्जा दे रही थी तब वे कम्युनिस्ट थे या सज्जन। पश्चिम बंगाल में माकपाई काडरों की गुण्डागर्दी और समान्तर सरकार को मुख्यमंत्री के तौर पर संरक्षण देते हुए वे कम्युनिस्ट व्यवहार कर रहे थे या सज्जनता का।
बुद्धिजीवी ने कहा है कि कम्युनिज्म और सज्जनता में जब भी कोई द्वंद्व हुआ तो उन्होंने सज्जनता को चुना। मतलब यह कि वे सज्जन पहले थे और कम्युनिस्ट बाद में। जैसे उनके राज्य के एक बड़े कम्युनिस्ट नेता ने कहा कि मैं हिन्दू पहले हूं और कम्युनिस्ट बाद में। थोड़े ही दिन में कोई कहेगा कि मैं बंगाली पहले हूं और कम्युनिस्ट बाद में। जैसे कि लाल कृष्ण आडवाणी और राज ठाकरे ने कम्युनिज्म की दीक्षा ले ली हो।
अभी हाल ही में ज्योति बाबू की पार्टी के महासचिव ने कहा कि धर्म को मानने वालों पर कम्युनिस्ट पार्टी किसी प्रकार की रोक नहीं लगाती। माकपा जैसी पार्टी रोक लगा भी कैसे सकती है जिसके एक भूतपूर्व महासचिव ही जत्थेदार कम्युनिस्ट थे। जल्दी ही ऐसा भी हो सकता है कि माकपा का महासचिव छापा तिलक लगाए जनेऊ पहने राम-राम कहता नजर आए या यह भी हो सकता है कि वह पांच वक्त का नमाजी हो। भाजपा-शिवसेना का तो आधार ही खिसक जाएगा। यह तो सज्जनता की पराकाष्ठा हो जाएगी। कम्युनिज्म और सज्जनता का ऐसा बेजोड़ घोल हिन्दुस्तान में ही संभव है। और यदि ऐसा हुआ तो बुद्धिजीवियों की जमात से ज्यादा गदगद और कोई नहीं होगा।
भला इससे अच्छा क्या हो सकता है कि एक सज्जन कम्युनिस्ट संसद और विधानसभा का चुनाव लड़ते-लड़ते, पूंजीपतियों से आरजू-मिन्नत करके अठन्नी-चवन्नी मांगते-मांगते, क्राइम स्टोरीज पढ़ते-पढ़ते, संगीत सुनते-सुनते एक दिन टीवी-रेडियो पर देशवासियों को संदेश दे कि लो भैया समाजवाद आ गया। मूलाधार बदल गया। अब वर्गों का नामोनिशान नहीं रहेगा। मजदूर भाई और पूंजीपति भाई सब एकसाथ मिलकर समाजवाद का निर्माण करेंगे। अब वर्गों के बीच में कोई अंतरविरोध कोई झगड़ा नहीं रह गया है। हो सकता है कोई इसे समाजवाद की जगह रामराज्य भी कह दे। वैसे ही कई भारतीय बुद्धिजीवियों को मार्क्सवाद से एकमात्र कष्ट यही है कि वह विदेशी विचारधारा है। अगर इन बुद्धिजिवियों को किसी दिन पता चला कि धरती के गोल होने की बात भारत में नहीं किसी अन्य देश में खोजी गई थी तो वे फिर से धरती को चपटी मानने लगेंगे। या ऐसा भी कह सकते हैं कि बाकी देशों की धरती भले ही गोल हो मगर हमारे यहां की तो चपटी ही है। अगर गोल होती तो किसी देसी महात्मा ने ऐसा जरूर कहा होता।
प्रश्न बहुत हैं जवाब कम। हर प्रश्न का जवाब देना बुद्धिजीवियों का काम भी नहीं है। खासकर बड़े बुद्धिजीवियों का। वे तो मौलिक प्रस्थापनाएं और सूत्र देते हैं। कुछ छोटे बुद्धिजीवी उनका भाष्य करके तरह-तरह से उनकी व्याख्या करते हैं। व्याख्या करते-करते कुछ लोग कुछ नई मौलिक प्रस्थापनाएं पेश करते हैं। कुछ मौलिक नहीं करेंगे तो बुद्धिजीवी का तमगा कैसे मिलेगा।
तभी तो हमारे देश की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियां कहती हैं कि आज का समय पहले जैसा नहीं रहा। आज का सर्वहारा भी पहले जैसा नहीं रहा। आज का मार्क्सवाद भी पहले जैसा नहीं रहा। आखिर एंगेल्स ने ही तो कहा था कि समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है। कम्युनिस्ट सज्जन में तब्दील हो जाता है। मार्क्सवाद संशोधनवाद में। वर्ग संघर्ष की जगह वर्गों में भाईचारे की भावना आ जाती है।
एक अंतिम प्रश्न रह जाता है : क्या बुद्धिजीवी भी अपने विपरीत में बदल जाता है? अगर हां, तो बदलकर वह क्या हो जाता है?
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Wednesday, January 20, 2010
गुण्डागर्दी ही इनकी राष्ट्रीय संस्कृति है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में जनचेतना के पुस्तक प्रदर्शनी वाहन पर राष्ट्रीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों के कायराना हमले ने एक बार फिर से उनकी असलियत उजागर कर दी है। वैसे भयानक अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने वालों की तारीफ में यह वाकया बहुत मामूली महत्व रखता है।
राष्ट्रीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों की सबसे बड़ी संस्कृति यह है कि यहां दिमाग का प्रयोग वर्जित है। दिमाग का प्रयोग केवल ऊपर के पदाधिकारी करते हैं और वह भी तर्क या बहस करने के लिए नहीं केवल अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने के नए-नए तरीके विकसित करने के लिए। निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को केवल हुक्म की तामील करनी होती है।
ऐसा करने के लिए पढ़ने लिखने की कोई जरूरत ही नहीं है। सारा ज्ञान तो भगवान श्रीकृष्ण गीता में कह ही गए है। वैसे भी आम आदमी को ज्ञान की जरूरत ही कहां है। बस भूत,पिशाच भगाने के लिए हनुमान चालीसा रट लो, और सुख-संपत्ति के लिए कुछ अन्य प्रकार की रचनाओं का जाप कर लो, इतने से ही बैकुण्ठ पार लग जाएगा।
तो फिर जिंदगी और समाज को बदलने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को नींद से झकझोरकर जगा देने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को जिंदगी की असलियत बताने वाली और 'बेहतर जिंदगी का रास्ता' दिखाने वाली 'बेहतर किताबों' की जरूरत ही क्या है। आम लोगों को जीने का ढंग सिखाने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है।
लिहाजा 'रामराज्य' की प्राप्ति के लिए प्रयासरत 'अप'संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों ने हिंदी पट्टी में बड़े पैमाने पर प्रगतिशील साहित्य वितरित करने वाली संस्था जनचेतना के पुस्तक प्रदर्शनी वाहन पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बार फिर हमला किया।
इस हमले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यह जनचेतना की मुहिम और समाज में आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी किताबों का प्रचार प्रसार करने की जरूरत रेखांकित होती है।
आज हर प्रकार के ढोंगी पाखंडी बाबाओं की और हर प्रकार की धार्मिक पुस्तकें, सीडी, कैसेट धड़ल्ले से बाजारों में बिक रहे हैं। लोगों की चेतना को कुंद करने वाली नशे की खुराक जैसे ये साहित्य जितनी आसानी से सुलभ हैं उतने प्रेमचंद या भगतसिहं नहीं हैं। हर प्रकार के पाखंडों, कुरीतियों, यहां तक कि धर्म के आवरण में लिपटी अश्लील कहानियां भी बड़े पैमाने पर लोगों को उपलब्ध कराई जा रही हैं और इन्हें राष्ट्रीय संस्कृति का जामा पहनाया जाता है।
जाहिर है कि ऐसा करने वालों को इंसान की तरह जीने और संघर्ष और सृजन की बात करने वाले साहित्य से खतरा महसूस होता है और भीड़ की ताकत के साथ मौका देखकर वे कायराना हमले भी करने से बाज नहीं आते।
सोचिए कि 'रामराज्य' में क्या होगा।
राष्ट्रीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों की सबसे बड़ी संस्कृति यह है कि यहां दिमाग का प्रयोग वर्जित है। दिमाग का प्रयोग केवल ऊपर के पदाधिकारी करते हैं और वह भी तर्क या बहस करने के लिए नहीं केवल अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने के नए-नए तरीके विकसित करने के लिए। निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को केवल हुक्म की तामील करनी होती है।
ऐसा करने के लिए पढ़ने लिखने की कोई जरूरत ही नहीं है। सारा ज्ञान तो भगवान श्रीकृष्ण गीता में कह ही गए है। वैसे भी आम आदमी को ज्ञान की जरूरत ही कहां है। बस भूत,पिशाच भगाने के लिए हनुमान चालीसा रट लो, और सुख-संपत्ति के लिए कुछ अन्य प्रकार की रचनाओं का जाप कर लो, इतने से ही बैकुण्ठ पार लग जाएगा।
तो फिर जिंदगी और समाज को बदलने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को नींद से झकझोरकर जगा देने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को जिंदगी की असलियत बताने वाली और 'बेहतर जिंदगी का रास्ता' दिखाने वाली 'बेहतर किताबों' की जरूरत ही क्या है। आम लोगों को जीने का ढंग सिखाने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है।
लिहाजा 'रामराज्य' की प्राप्ति के लिए प्रयासरत 'अप'संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों ने हिंदी पट्टी में बड़े पैमाने पर प्रगतिशील साहित्य वितरित करने वाली संस्था जनचेतना के पुस्तक प्रदर्शनी वाहन पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बार फिर हमला किया।
इस हमले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यह जनचेतना की मुहिम और समाज में आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी किताबों का प्रचार प्रसार करने की जरूरत रेखांकित होती है।
आज हर प्रकार के ढोंगी पाखंडी बाबाओं की और हर प्रकार की धार्मिक पुस्तकें, सीडी, कैसेट धड़ल्ले से बाजारों में बिक रहे हैं। लोगों की चेतना को कुंद करने वाली नशे की खुराक जैसे ये साहित्य जितनी आसानी से सुलभ हैं उतने प्रेमचंद या भगतसिहं नहीं हैं। हर प्रकार के पाखंडों, कुरीतियों, यहां तक कि धर्म के आवरण में लिपटी अश्लील कहानियां भी बड़े पैमाने पर लोगों को उपलब्ध कराई जा रही हैं और इन्हें राष्ट्रीय संस्कृति का जामा पहनाया जाता है।
जाहिर है कि ऐसा करने वालों को इंसान की तरह जीने और संघर्ष और सृजन की बात करने वाले साहित्य से खतरा महसूस होता है और भीड़ की ताकत के साथ मौका देखकर वे कायराना हमले भी करने से बाज नहीं आते।
सोचिए कि 'रामराज्य' में क्या होगा।
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