Thursday, September 30, 2010

कुपोषण, स्‍वाद और स्‍वामीनाथन अय्यर की संवेदनशीलता

'अर्थशास्‍त्र राजनीति का सान्‍द्रतम रूप है' मार्क्‍स के इस कथन की भोंडी अभिव्‍यक्ति इस रूप में हुई है कि भारतीय बुर्जुआ जनतन्‍त्र की कमान अर्थशास्त्रियों और वकीलों के हवाले हो गई है। अगर मुनाफे की गारंटी सबसे बड़ी सरकारी जिम्‍मेदारी बन जाए तो ज़ाहिर है सरकार इसमें कोई हस्‍तक्षेप बरदाश्‍त नहीं करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि अनाज सड़ाने के बजाय गरीबों में बॉंट दिया जाये तो प्रधानमन्‍त्री फनफना उठे। किसे ज़िन्‍दा रखना है और किसे भूखा मारना है यह नीतिगत मसला है और विधायिका का काम है, इसलिए प्रधानमन्‍त्री महोदय ने न्‍यायपालिका को अपने दायरे में रहने की हिदायत अविलम्‍ब दे दी। देरी कर भी कैसे सकते थे। आज जबकि देशों का भविष्‍य शेयर बाज़ार के बुलबुले के फूलने और फूटने पर टिका हो वहां देरी कितनी घातक हो सकती है यह प्रधानमन्‍त्री अच्‍छी तरह जानते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भुखमरी के बाज़ार पर पड़ने वाली चोट देश की आर्थिक प्रगति के कर्णधार पूँजीपतियों में जो निराशा फैलाएगी उसकी चिन्‍ता अर्थशास्‍त्री प्रधानमन्‍त्री को नहीं होगी तो किसे होगी।

मुनाफा ही बुर्जुआ अर्थशास्‍त्र का ब्रह्मवाक्‍य है और पूँजीवादी बाज़ार का तर्क इस बात की इजाज़त ही नहीं देता कि माल को मुनाफे के लिए ज़रूरी कीमत से कम पर बेचा जाए। आखिर आज से पहले भी और पूरी दुनिया में अनाज सड़ता रहा है, जलाया जाता रहा है, या समन्‍दर में गिराया जाता रहा है। बाज़ार के खेल में यह एक सामान्‍य सी बात है जिसे सभी जानते हैं। मिलावट करना, जमाखोरी करना, कालाबाज़ारी करना भी उतना ही सामान्‍य है और पूरी तरह पूँजीवादी नैतिकता के दायरे में आता है। पर किसी माल को सस्‍ते में बेचना, मुनाफा कम करके बेचना.... नहीं नहीं... अर्थशास्‍त्री प्रधानमन्‍त्री की आत्‍मा चीत्‍कार उठी!!

आत्‍मा तो स्‍वामीनाथन अय्यर की भी चीत्‍कार उठी! लिहाजा उन्‍होंने फरमाया कि बात यह नहीं है कि लोग ग़रीब हैं और उन्‍हें खाने को पर्याप्‍त नहीं मिलता। दिक्‍कत यह है सरकार गरीबों को देने के लिए जितना सस्‍ता अनाज भेजती है वो वास्‍तविक गरीबों तक पहुंचने के बजाय ऐसे लोगों द्वारा हजम कर लिया जाता है जो महंगा अनाज खरीद सकते हैं। इसलिए सरकार को करना ये चाहिए कि गरीबों को जितना अनाज सस्‍ते में देना है उसको पाउडर के रूप में कुछ अन्‍य विटामिन और प्रोटीन मिलाकर देना चाहिए। अय्यर साहब की दरियादिली देखकर अगर आपकी आंखों में आंसू उमड़ पड़ने वाले हों तो ज़रा ठहरिये। स्‍वामीनाथन जी आगे कहते हैं - लेकिन ऐसा करने से पहले उस पाउडर को इतना कड़वा, बेस्‍वाद बना देना चाहिए कि केवल वही लोग उसे खाएं जो वास्‍तव में भूख्‍ा से मर रहे हों। ज़ाहिर सी बात है कि इतना बेस्‍वाद खाना खाने में अमीर लोगों को कोई दिलचस्‍पी नहीं होगी और लिहाजा वास्‍तविक ज़रूरतमंदों को पोषक भोजन मिल जाएगा।

इतना दयालु अर्थशास्‍त्री बिरले ही कभी पैदा हो। अय्यर साहब कम से कम हमारे प्रधानमन्‍त्री महोदय से ज्‍़यादा संवेदनशील तो हैं ही। प्रधानमन्‍त्री जहां लोगों को निवाला ही नहीं देना चाहते वहां अय्यर साहब केवल उस निवाले का स्‍वीद छीनने की बात कर रहे हैं।

गॉंव में देखा है कि मवेशियों के चारे में खली नाम की एक चीज मिलाई जाती है जिससे कि उनका चारा स्‍वादिष्‍ट हो जाए और वे ज्‍़यादा मात्रा में खाएं। यहां तक कि खली खरीदने से पहले किसान स्‍वयं थोड़ी खली चखकर भी देखते हैं कि उसका स्‍वाद जानवर को पसंद आयेगा या नहीं। किसान ही नहीं अय्यर साहब के यहां भी अगर कोई जानवर हो तो वे शायद ऐसा करते होंगे। आखिर जानवर खाएगा तभी तो मुनाफा कमा कर देगा। पर गरीब जनता का क्‍या? उसके लिए ही तो कहा गया है 'काम का न काज का, दुश्‍मन अनाज का'। अय्यर साहब और मनमोहन साहब दोनो को डर है कि अगर जनता को स्‍वादिष्‍ट खाना और वो भी सस्‍ते में खिलाया गया तो जनता तो 'परिक' ही जाएगी। और एक बार अगर यह सिस्‍टम चल पड़ा तो फिर बन्‍द करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा। लिहाजा एक तरफ प्रधानमन्‍त्री महोदय ने इंडिया इंक के सीईओ की हैसियत से न्‍यायपालिका को उसका दायरा बताया वहीं दूसरी ओर एक अन्‍य बुर्जुआ अर्थशास्‍त्री ने गरीब जनता के लिए उसकी सामाजिक हैसियत (जानवर से भी बद्तर) के मुताबिक एक समाधान पेश कर दिया। मुनाफे को इंसान से पहले रखने वाले बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों से इसके अलावा और किस तरह के समाधान की उम्‍मीद की जा सकती है। बाज़ार के मन्दिर में मुनाफे के पुजारी प्रसाद में इसके सिवा और दे भी क्‍या सकते हैं?

Friday, September 3, 2010

जिन्‍दगी और मौत के संघर्ष में 28 दिनों से साहस के साथ डटे हैं चिली के 33 खदान मजदूर।

गत 5 अगस्‍त को चट्टान ढहने से सुरंग के एक हिस्‍से के अवरुद्ध हो जाने के कारण चिली के 33 खदान मजदूर धरती की सतह से 700 मीटर नीचे जिन्‍दगी और मौत का संघर्ष कर रहे हैं। दो दिन के आहार की आपूर्ति पर इन मजदूरों ने 17 दिन तक अपने आप को जीवित रखा जब उनसे पहली बार संपर्क स्‍थापित हुआ और पता चला कि सभी 33 मजदूर जीवित और स्‍वस्‍थ हैं।

सुखद बात यह है कि अब इन मजदूरों के साथ लगातार संपर्क बना हुआ है, वे अपने प्रियजनों से संक्षिप्‍त बातचीत भी कर पा रहे हैं और उन्‍हें खाने-पीने की चीजें, दवाइयां, और टीके पहुंचाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी सबसे जरूरी चीज यह है कि वे उम्‍मीद न हारें और उनका मनोबल बढ़ाया जाए। एक विशेषज्ञ का कहना है कि ऐसी स्थिति में भी उन्‍हें रोजमर्रे का अपना एक कार्यक्रम बनाना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए वर्ना ऐसे समय में जबकि आप ऐसी स्थिति में फंसे हों और कुछ कर न रहे हों तो निराशा पैठने की संभावना रहती है।

इन 33 खदान कर्मियों को निकालने के लिए युद्धस्‍तर पर प्रयास किए जा रहे हैं पर यह जानकर निराशा हो सकती है कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो भी उन्‍हें बाहर निकालने में लगभग 4 महीने का समय लग सकता है। उन्‍हें निकालने के लिए जो दूसरी सुरंग खोदी जा रही है उससे उत्‍पन्‍न होने वाले डेब्रिस को भी इन 33 मजदूरों को ही मेहनत करके हटाना होगा ताकि वे नई सुरंग तक पहुंच सकें और उन्‍हें बारी-बारी एक-एक करके निकाला जा सके।

चीन की तरह हालांकि चिली खदान दुर्घटनाओं के लिए कुख्‍यात नहीं है लेकिन फिर भी हम महसूस कर सकते हैं कि खदान कर्मियों का काम कितना जोखिम भरा होता है। हर साल दुनियाभर में कितने ही खदान मजदूरों की दुर्घटनाओं में मौत हो जाती है। कितनों की मौत तो खबर भी नहीं बन पाती। इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि ज्‍यादातर दुर्घटनाएं सुरक्षा उपायों की कमी या जोखिम भरे क्षेत्रों में खनन गतिविधियों के कारण होती है। खदानों का काम इतना जोखिम भरा होता है कि कहीं और काम न मिलने पर मजबूरी में ही कोई मजदूर खदानों की तरफ रुख करता है। चिली के कैपियापो शहर की तांबे और सोने की जिस सैन एस्‍टेबार खदान में यह दुर्घटना हुई वहां भी गैरकानूनी ढंग से काम हो रहा था। यही कारण है कि इस दुर्घटना के बाद खदान के मालिक ने मीडिया के सामने मजदूरों से क्षमायाचना की।

पर अभी तो पूरी दुनिया सांस थामे उन 33 खदान कर्मियों की सुरक्षा और कुशलता की कामना कर रही है। संकट की इस घड़ी में पूरी दुनिया के मजदूरों और लोगों की शुभकामनाएं इन मजदूरों और उनके परिवार वालों के साथ हैं। हमें पूरा विश्‍वास है कि ये सभी खदान कर्मी हर प्रकार की निराशा को फतह करते हुए सकुशल वापस लौटेंगे।

हमारी कोशिश रहेगी कि चिली की खदान में फंसे इन 33 मजदूरों के बारे में आपको नियमित अपडेट देते रहें।

Thursday, August 12, 2010

एक स्‍वनामधन्‍य कम्युनिस्‍ट बुद्धिजीवी का भोलापन....इस अदा पर कौन न मर जाये।।

प्रिय नीलाभ जी,
जनज्‍वार के माध्‍यम से पता चला कि आप राजनीतिक दलों के न्‍यास आदि बनाने को सही नहीं मानते। आपने अपनी टिप्‍पणी में अपने इस विचार के पीछे कोई तर्क नहीं पेश किया है। यह जानने की बहुत इच्‍छा हो रही है कि राजनीतिक दलों को न्‍यास आदि क्‍यों नहीं बनाना चाहिए। क्‍या न्‍यास आदि संस्‍थाओं में ऐसे कीटाणु बसते हैं जो राजनीतिक दलों को भ्रष्‍ट कर देते हैं। क्‍या इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि न्‍यास का उद्देश्‍य क्‍या है उसको कैसे संचालित किया जाता है और उसमें कौन लोग काम करते हैं। बस न्‍यास बना नहीं कि आप किसी राजनीतिक दल को विपथगामी घोषित कर देंगे। आपकी बात इतनी मजेदार है कि मेरी यह जानने की उत्‍सुकता बढ़ती ही जा रही है कि आप और किन-किन कामों को राजनीतिक दलों के करने योग्‍य नहीं समझते।
जहां तक मेरा राजनीतिक ज्ञान है मैं समझता हूं कि एक समूह उन सभी (या अधिकतर) कामों को ज़्यादा बेहतर ढंग से संचालित कर सकता है जिन्‍हें कोई व्‍यक्ति अकेला करता है। इन कामों में राजनीतिक काम भी आ सकते हैं और कला-संस्‍कृति के क्षेत्र के काम भी आ सकते हैं और अकादमिक काम भी।
आज दिल्‍ली के अधिकतर प्रगतिशील कवि, लेखक, संस्‍कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी मध्‍य वर्ग या उच्‍च मध्‍यवर्ग की जीवनशैली जी रहे हैं। आज कितने लेखक, कवि, बुद्धिजीवी हैं जो बाल्‍जाक की तरह काली काफी पीकर पेरिस के अभिजात समाज को अपनी कलम से नंगा कर देने की चुनौती देने का माद्दा रखते हैं। आज के प्रगतिशील लेखकों में से किसको आप भारत का टामस पेन और लू शुन कहेंगे। मां उपन्‍यास लिखने के बाद गोर्की ने जब लेनिन से मुलाकात की तो लेनिन ने कहा कि यह मजदूरों के लिए एक जरूरी किताब है और इसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाओ। क्‍या आपको लगता है कि अगर 'मां' जैसी कोई किताब आज लिखी जाती है तो आज के बुर्जुआ प्रकाशक उसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाएंगे। निश्‍चय ही नहीं करवाएंगे। बुर्जुआ प्रकाशक तो क्‍या खुद को प्रगतिशील कहने वाले कवि, लेखक और बुद्धिजीवी भी यह काम नहीं करेंगे। सही बात तो यह है कि प्रतिष्‍ठा, पुरस्‍कार, रॉयल्‍टी अगर मिलती रहे तो हमारे लेखकों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनकी किताबें वास्‍तव में पढ़ी भी जा रही हैं या नहीं। आज कितने ऐसे लेखक हैं जो 20 रुपये से कम पर जीने वाले भारत के 77 प्रतिशत लोगों की जिंदगी से करीबी से जुड़े हों या करीबी जुड़ाव महसूस करते हों। आज प्रगतिशील लेखकों/बुद्धिजीवियों और सर्वहारा जनता के बीच की खाई गणेशशंकर विद्यार्थी और प्रेमचंद के जमाने से कई गुना चौड़ी हो गई है। यह कहने में कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि आज के हमारे प्रगतिशील लेखक, कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्‍वासघात कर चुके हैं। वास्‍तव में समाजवाद से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है, उनका समाजवाद तो कब का आ चुका है।
और इसीलिए जो काम प्रगतिशील लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्‍कृतिकर्मियों को करना चाहिए था, यानी कि समाज में गंभीर राजनीतिक और गैर राजनीतिक साहित्‍य का एक सचेत पाठकवर्ग तैयार करने और ऐसे साहित्‍य के फलने-फूलने का माहौल तैयार करने का काम, उसे मजबूरी में क्रान्तिकारी दल (दलों) को करना पड़ रहा है। आप शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि यह राजनीतिक दलों की इच्‍छा नहीं बल्कि उनकी मजबूरी है। हालांकि अगर वे अपनी चाहत से भी ऐसा करते हैं तो इसमें गलत क्‍या है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। शायद आप समझने में मेरी मदद करेंगे।
आपने सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन घुमा फिराकर कुछ प्रकाशनों पर आरोप लगाया है कि उन्‍होंने साधन को साध्‍य बना लिया है। तो उपरोक्‍त बातों के मद्देनजर सबसे पहले तो यह आरोप प्रगतिशील लेखकों पर लगाया जाना चाहिए जिनमें आप स्‍वयं भी शामिल हैं। अपनी किताबें छपवाने में बहुतेरे लोग आगे रहते हैं लेकिन लू शुन की तरह किसी ने यह क्‍यों नहीं सोचा कि अपने देश के लोगों का परिचय विश्‍व की तमाम मूल्‍यवान साहित्यिक धरोहरों से कराया जाए। आज मार्क्‍सवाद की कितनी किताबें हैं जो सही और सटीक अनुवाद के साथ हिन्‍दी में उपलब्‍ध हैं। और यदि नहीं है तो यह काम कौन करेगा। क्‍या यह काम राजकमल और वाणी जैसे बुर्जुआ प्रकाशनों के भरोसे छोड़ दिया जाए या भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के भरोसे या नीलाभ प्रकाशन के भरोसे। मार्क्‍सवाद की जिन किताबों के हिंदी अनुवाद हैं भी उन्‍हें संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता है। और रामविलास शर्मा जी ने यूं तो किताबें लिखकर रैक भर दिये हैं लेकिन उनके माध्‍यम से मार्क्‍सवाद समझने वालों का खुदा ही मालिक हो सकता है। ऐसे में अगर कोई राजनीतिक संगठन प्रकाशन तंत्र और न्‍यास संगठित करके हिंदी भाषी लोगों को अपनी भाषा में विश्‍वस्‍तरीय साहित्‍य और मार्क्‍सवाद की पुस्‍तकें उपलब्‍ध कराने के इन बेहद ज़रूरी कामों को करता है तो इसके लिए उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए या गालियां?
हालांकि आज भी बहुत बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की है जिनके लिए दुनिया माओ के बाद से आगे ही नहीं बढ़ी है और निश्चित ही उन्‍हें किताबों की और बहस-मुबाहिसे की उतनी जरूरत भी नहीं है। वैसे मजेदार बात तो यह भी है कि हथियार खरीदने के लिए चंदा मांगने को बुद्धिजीवी लोग जायज समझते हैं लेकिन पुस्‍तकें छापने के लिए चंदा मांगने को वे गलत समझते हैं और कोई तर्क पेश किए बिना साधन और साध्‍य जैसे बौधिक जुमलों के द्वारा अपना काम चला लेते हैं। वैसे 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी और नव जनवादी क्रांति (एनडीआर) की लाइन ने भी तमाम बौद्धिकों की पौ बारह कर दी है। आज कोई भी व्‍यक्ति ब्‍लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्‍म की लीद फैलाकर क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कम्‍युनिज्‍म की समझदारी है भी या नहीं या कम्‍युनिज्‍म के प्रति उसका समर्पण है भी या नहीं। मध्‍यवर्गीय रूमानी फिलिस्‍टाइन को इससे कोई मतलब भी नहीं है। वह स्‍वयं को एक नायक की तरह देखना पसंद करता है और निजी जीवन में क्रान्ति से भले ही उसका कभी साबका न पड़ा हो और सामाजिक कामों के लिए चंदा देते समय भी बीवी से डरता हो लेकिन बौद्धिक जगत में हल्‍ला मचाने का साधन उसकी पहुंच में आ गया है और वह शहीदाना अंदाज में पोस्‍ट पर पोस्‍ट लिखे जाता है। हो सकता है कि उसने वह चौराहा भी देख रहा हो जहां 'मुक्‍त क्षेत्र' बनने के बाद उसकी मूर्ति लगाई जाएगी।
स्‍तालिन ने यों ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियां झूठ-फरेब, मक्‍कारी, चुगली और षडयंत्रों से भरी होंगी। जनज्‍वार पर आकर आपने और आपके सहयोगियों ने न सिर्फ स्‍तालिन की बात को पुष्‍ट कर दिया बल्कि अपने ही कृत्‍यों से न्‍यास और प्रकाशन संगठित करने की जरूरत को बल प्रदान कर दिया है। आपने भी बस यही साबित किया है कि आज के पके पकाये बुद्धिजीवियों से रैडिकल चिंतन और व्‍यवहार की उम्‍मीद करना वैसा ही है जैसे जरसी गाय से युद्धाश्‍व के कारनामों की उम्‍मीद पालना। इसीलिए नये साहसी, रैडिकल, युवा, कर्मठ बौद्धिक तत्‍वों की तैयारी का काम और भी ज़रूरी है।
जनज्‍वार के अपने जिन साथियों की बातों का आपने समर्थन किया है (हालांकि यह समर्थन आपने नसीहतों की आड़ में किया है) उनके साथ मैं पिछले 10-12 सालों से जमीनी स्‍तर पर काम कर चुका हूं। अपने राजनीतिक और निजी जीवन में इन लोगों की पतनशीलता का मुझे प्रत्‍यक्ष अनुभव है और ये सारे के सारे जमीनी कार्यों में एकदम फिसड्डी साबित हो चुके हैं। जो इस बात से भी साबित होता है कि संगठन से निकाले जाने के बाद इनमें से किसी भी शख्‍स की जमीनी कार्रवाइयों में किसी प्रकार की कोई भागीदारी नहीं रही है। अपनी हर असफलता को दूसरों के मत्‍थे मढ़ने की इनकी आदत और नीयत जनज्‍वार पर लिखे इनके ही पोस्‍टों से जाहिर हो जाती है। आज आपको इन हिजड़ों की संगत पसंद आ रही है तो आपको सोचना चाहिए कि आप कहां पहुंच गये हैं। जनज्‍वार ने अपनी नंगई के द्वारा साबित कर दिया है कि भारत के कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन की पश्‍चगति अभी अपने मुकाम तक नहीं पहुंची है और इसमें तमाम तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और (आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए) विरोधी लाइन वाले कतिपय संगठनों के कुछ लोग अपनी तरफ से पूरा सहयोग दे रहे हैं। चलिये देखते हैं कि यह पश्‍चगति कहां जाकर थमती है।

आपने साधन के साध्‍य बन जाने की बात अपनी पोस्‍ट में उठाई है। मेरे ख्‍याल से साधन के साध्‍य बना जाने की बात तब लागू होती है अगर किसी के सिद्धांत और व्‍यवहार में अंतर हो। जहां तक परिकल्‍पना और राहुल फाउण्‍डेशन की बात है, तो अगर आप कविताएं लिखने से फुरसत लेकर इनके प्रकाशनों को पढ़ेंगे तो आपको स्‍पष्‍ट पता चल जाएगा कि ये किन अर्थों में नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन की बात करते हैं और इनका व्‍यवहार इनके सिद्धांत की पूर्णत: संगति में है। यदि इन्‍होंने अपने वास्‍तविक विचारों को स्‍पष्‍ट रूप से जाहिर किए बिना लोगों से सहयोग लिया हो और केवल यही करते रहे हों तो आप यह कह सकते हैं कि साधन ही हमारा साध्‍य बन गया है। अगर साधन ही हमारा साध्‍य है तो करावलनगर, गोरखपुर और लुधियाना के मजदूरों के आन्‍दोलनों में हमारी भूमिका के बारे में आपके क्‍या विचार हैं।

कवि महोदय आप शायद जानते होंगे कि न्‍यास बनाना और किताबें छापना ऐसे काम हैं जो शुरू से ही नजर आते हैं। वहीं लोगों को संगठित करना एक ऐसा काम है जिसका आउटपुट तत्‍काल नजर नहीं आता। वर्तमान परिस्थितियों का हमारा मूल्‍यांकन और इसलिए हमारे काम का तरीका भी थोड़ा अलग है जो बुद्धिजीवियों को समझ में नहीं आता है। चूंकि हम समय-समय पर 'ऐक्‍शन' नहीं करते रहते और थोड़ा काम करके बहुत गाते नहीं, इसलिए जमीन से कटे बुद्धिजीवियों को लगता है कि हम बस किताबें ही छाप रहे हैं। वैसे क्‍या ये सरासर बेईमानी और बदनीयती नहीं है कि जानबूझकर किसी संगठन के कामों के एक हिस्से को अपने झूठे आरोपों का निशाना बनाया जाए और उसके कामों के बड़े और मुख्‍य पहलू की चर्चा ही न की जाए! तो कविवर ऐसी स्थिति में अत्‍यावश्‍यक है कि आंखें फाड़कर घूरती सच्‍चाईयों को समझने और उनके अनुरूप अपने सिद्धान्‍त और व्‍यवहार में परिवर्तन करने के लिए कम्‍युनिस्‍टों को प्रेरित करने हेतु ज़रूरी कामों के तौर पर मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान और प्रकाशन जैसी संस्‍थाएं स्‍थापित की जाएं। आज जबकि 'भूतपूर्व' और स्‍वनामधन्‍य कम्‍युनिस्‍टों की जमात बढ़ती जा रही है जिसने कम्‍युनिज्‍म के बुनियादी उसूलों, मर्यादाओं और गुणों का परित्‍याग कर दिया है तो ऐसी संस्‍थाएं बेहद ज़रूरी हैं जो कम्‍युनिज्‍म के आदर्शों को बचाए रखने और नई पीढ़ियों को इस विरासत से शिक्षित-दीक्षित करने का काम करें। बेशक जिन्‍हें लगता है कि परिस्थितियां बदली ही नहीं हैं और जो कुछ लिखना पढ़ना था सब लिखा-पढ़ा और कहा जा चुका है और बस आंख मूंदकर लकीर पर लाठी पीटते रहना है उन्‍हें न्‍यास और प्रकाशन की जरूरत न तो है और न समझ में आयेगी।

नीलाभ जी आप भोलेपन की मिसाल कायम करते हुए लिखते हैं कि कात्‍यायनी, सत्‍यम और शशिप्रकाश के खिलाफ उनके ही कुछ पुराने साथियों ने आरोप लगाए हैं। इससे आप 'हतप्रभ' भी हैं और 'उदास' भी। जाहिर है आप हतप्रभ और उदास इसलिए हैं क्‍योंकि आप इन आरोपों को जायज और ईमानदारी की जमीन से उठाया गया समझते हैं। पर आप ऐसा क्यों समझते हैं। क्‍या आपने जानना चाहा कि इन लोगों के खिलाफ दूसरे पक्ष के क्‍या आरोप हैं। क्‍या आपने कभी जानना चाहा कि ये लोग जिन कार्यकर्ताओं के साथ काम करते थे उनके इनके बारे में क्‍या विचार हैं। आपने तो भोलेपन की इंतहा ही कर दी और आपने मान लिया कि जनज्‍वार के टिप्‍पणीकार ही सही हैं और दूसरा पक्ष गलत है। इस एकांगीपन की वजह क्‍या है नीलाभ जी। क्‍यों आपको लगता है कि संगठन/समूह ही हमेशा गलत होता है और आरोप लगाने वाला कार्यकर्ता हमेशा सही होता है। और क्‍या आपको लगता है कि इन सब बातों का फैसला करने का सबसे उपयुक्‍त मंच ब्‍लॉग ही है। क्‍या ब्‍लॉग जैसे सशक्‍त टूल ने नीलाभ को गैरजिम्‍मेदार बना दिया है या यह पुरानी खुन्‍नस निकालने का एक जरिया है।
-- एक नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ता, दिल्‍ली

Monday, June 28, 2010

विश्‍व कप फुटबॉल, जाबुलानी और मैराडोना का सूट

दक्षिण अफ्रीका में चल रहा विश्‍व कप फुटबॉल प्री क्‍वार्टर फाइनल चरण में पहुंच चुका है। कुछ टीमें क्‍वार्टर फाइनल के लिए क्‍वालीफाई भी कर चुकी हैं। इस विश्‍व कप में अगर किसी एक व्‍यक्ति पर सबसे अधिक फोकस रहा है तो वह हैं अर्जेंटीना के कोच डिएगो मैराडोना। कैमरा बार-बार लौट कर उनकी तरफ आता है और उनकी अलग-अलग मुद्राओं को कैद करता रहता है। मैंराडोना का जीवन चढ़ावों-उतारों से भरा रहा है ये तो सभी जानते है फिर भी फुटबॉल प्रेमियों को मैराडोना प्‍यारे लगते हैं। किसी ने उनकी बुराई करते हुए एक बार उनके 'हैंड ऑफ गॉड' वाले गोल की चर्चा की। मेरे मन में बरबस यह ख्‍याल आया कि मैराडोना का हाथ ही तो असली 'हैंड ऑफ गॉड' है।
इस बार मैराडोना सूट में नजर आ रहे हैं, और उसकी फिटिंग भी कुछ ऐसी है कि मैराडोना जैसे व्‍यक्तित्‍व वाला आदमी ही उस तरह का सूट पहन एक ऐसे आयोजन में आ सकता है जिसपर सारी दुनिया की निगाहें हैं। वर्ना मैराडोना भी चाहें तो 'सेवाइल रो' से सूट सिलवा सकते हैं।

फुटबॉल विश्‍व कप में जो गेंद इस्‍तेमाल की जा रही है उसे नाइक कंपनी ने बनाया है और उसका नाम है 'जाबुलानी' ज़ुलु में जिसका अर्थ होता है 'आनंद मनाना' या 'खुशी देना'। पर जाबुलानी ने कइयों को दुखी कर दिया है। चूंकि खिलाड़ी इस नई गेंद से खेलने के आदी नहीं हैं इसलिए बॉल के नियंत्रण आदि को लेकर खिलाडि़यों विशेषकर गोलरक्षकों को परेशानी है। मुझे यह नहीं समझ में आता जिस गेंद का विश्‍व कप में इस्‍तेमाल किया जाना है उसको दो-तीन साल पहले ही बाज़ार में क्‍यों नहीं उपलब्‍ध करा दिया जाता है। ताकि हर टीम उसी गेंद पर अभ्‍यास करे। पर जबतक खेलों पर मुनाफाखोर कंपनियों का कब्‍जा रहेगा तब तक ऐसी चीजें होती रहेंगी।

फुटबॉल में अब लगता है कि खिलाडि़यों को गिरने की बीमारी हो गई है। विपक्षी खिलाड़ी जोर से छीं भी दे तो आजकल के फुटबालर ऐसे लोटने लगते हैं जैसे उनकी टांग टूट गई हो। इस चीज ने गेम का मज़ा कम कर दिया है। रेफरियों से होने वाली गलतियां भी थोड़ा मजा कम कर देती हैं। अगर रेफरी से गलती नहीं हुई होती और लैंपार्ड का गोल मान लिया जाता तो इंग्‍लैड-जर्मनी का मैच काफी रोचक बनता। हालांकि जर्मनी के मुकाबले इंग्‍लैंड का प्रदर्शन औसत ही रहा।

अगर खेल की बात करें तो ब्राजील, अर्जेंटीना, जर्मनी और स्‍पेन ने अब तक सबसे शानदार खेल दिखाया है। उनके खेल में अनुशासन और योजनाबद्धता है और सही मायनों में इन्‍होंने इंटेलिजेंट खेल का प्रदर्शन किया है। एशियाई देशों में दक्षिण कोरिया और जापान ने बढि़या खेल दिखाया है और अपनी गति और चुस्‍ती-फुर्ती से वे लंबे-लंबे खिलाडि़यों वाली यूरोपीय टीमों को टक्‍कर दे सकती हैं। डेनमार्क के खिलाफ फ्री किक पर जापानी खिलाडि़यों के दो गोल और एक फील्‍ड गोल उनके कौशल का बखान करते हैं। पर अगर मुझे सेमीफाइनल की चार टीमें चुननी हों तो मैं उपरोक्‍त चार को ही चुनुंगा। और इनमें भी स्‍पेन सबसे बढि़या टीम लग रही है। हालांकि दिल तो हमेशा ब्राजील के ही पक्ष में रहता है। अपना देश तो फुटबॉल में अभी बहुत पीछे है, तब तक हम ब्राजील को ही जितवाते रहेंगे। मजे की बात है कि इन चार सबसे अच्‍छी टीमों में से दो दक्षिण अमेरिका की हैं और दो यूरोप की। वर्ना ज्‍यादातर तो यूरोप की टीमें ही छायी रहती हैं। जिन टीमों में अनुशासन और योजनाबद्धता की कमी है और जिनकी रणनीति में कमजोरी है उनका हाल यह होता है विपक्षी के डी के पास पहुंच कर उन्‍हें समझ मे ही नहीं आता कि अच्‍छे मूव कैसे बनाएं। और इस चक्‍कर में सही मौका हाथ से निकल जाता है। जबकि उपरोक्‍त चारों टीमों के साथ ऐसी दिक्‍कत नहीं है। उनके खिलाड़ी फटाफट मूव बनाते हैं जैसे कि उन्‍होंने पहले से रिहर्सल कर रखा हो।
यहां चार टीमों को चुनने से मेरा इरादा को शर्त जैसा लगाने का नहीं है। मैं इन्‍हें सिर्फ इंटेलिजेंट गेसेज़ मानता हूं। और इसलिए अभी अंतिम विजेता या यहां तक कि फाइनलिस्‍टों की भी बात नहीं कर रहा हूं। हालांकि माकूल समय आने पर उनकी भी बात की जाएगी।

अगर आपके कुछ इंटेलिजेंट गेसेज़ हों या इस खेल के बारे में कुछ कहना हो या आपकी कोई 'गट फीलिंग' हो, तो कृपया यहां ज़रूर साझा करें।

Thursday, June 17, 2010

यूनियन कार्बाइड (भोपाल गैस कांड) और ग्रेजि़यानो (सीईओ की मौत) - एक संक्षिप्‍त तुलनात्‍मक अध्‍ययन।

घटना
यूनियन कार्बाइड - दिसंबर 2-3, 1984 की रात को अमेरिकी कंपनी की भारतीय सहायक कंपनी (यू सी आई एल) के प्‍लांट से जहरीली गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोगों की मौत और लाखों लोग प्रभावित।

ग्रेजि़यानो - ग्रेटर नोएडा स्थित ग्रेजियानो कंपनी के मजदूरों का आंदोलन और इस दौरान सीईओ ललित किशोर चौधरी की मौत।


घटना का कारण
यूनियन कार्बाइड - मुनाफे की हवस में शीर्ष प्रबंधन की जानकारी और आदेश पर बरती गई हर प्रकार की लापरवाही। निर्देशों की अवहेलना करते हुए बहुत अधिक मात्रा में अत्‍यंत जहरीली गैस का भंडारण। गैस को ठंडा करने वाले यंत्र का लंबे समय से बेकार पड़े रहना। चेतावनी देने वाले यंत्रों का काम न करना। यानी कि सारी की सारी जानबूझकर की गई लापरवाहियां।

ग्रेजियानो - अमानवीय कार्यस्थितियों, कम वेतन, छंटनी, प्रबंधन और उसके द्वारा पाले गए गुण्‍डों द्वारा गाली-गलौच और यूनियन बनाने की मांग पर मजदूरों ने आन्‍दोलन शुरू किया। कंपनी और ठेकेदारों के गुण्‍डों ने मजदूरों पर जानलेवा हमला किया (आजकल ये सभी उद्योगों में आम बात है)। सरिया, डंडों से मजदूरों की पिटाई की गई, सुरक्षा गार्डों ने फायरिंग भी की। लगभग 35 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस का दस्‍ता इस बीच पास में ही खड़ा रहा और प्रबंधन के इशारे पर कोई कार्रवाई नहीं की क्‍योंकि प्रबंधन अपने गुण्‍डों से मजदूरों को पिटवाकर अपनी ताकत दिखाना चाहता था। इस दौरान ग्रेजियानो के सीईओ ललित चौधरी को सिर पर चोट लग गई जो उनकी मौत का कारण बनी। क्‍या हुआ, कैसे हुआ यह किसी ने नहीं देखा। सीईओ की पत्‍नी के अनुसार ललित चौधरी की मौत व्‍यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का नतीजा थी, मजदूरों के आंदोलन से उसका कोई संबंध नहीं था।


घटना के बाद की कार्रवाई
यूनियन कार्बाइड - कंपनी के मालिक वारेन एंडरसन को वीआईपी सरकारी मेहमान की तरह सरकारी हेलिकॉप्‍टर से भगा दिया गया। तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री ने उस समय कहा कि हम किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते हैं। कुछ अखबारों ने लिखा कि यह मजदूरों की करतूत थी। लगभग 26 साल तक कानूनी नौटंकी जिसमें जघन्‍य आरोपों को मामूली लापरवाही में तब्‍दील कर दिया गया। सजा के नाम पर प्रमुख आरोपियों को 2-2 साल की सजा हुई। सजा के साथ ही साथ जमानत भी थमा दी गई।

ग्रेजियानो - सीईओ की मौत के बाद सरकार से लेकर प्रशासनिक तंत्र और अदालत तक और उद्योगपतियों की संस्‍थाओं से लेकर मीडिया तक सबने एकसाथ मजदूरों पर हल्‍ला बोल दिया। इस मुद्दे पर सरकार ने वरिष्‍ठ नौकरशाहों और पूंजीपतियों की एक कमेटी बनाई। पुलिस ने मजदूरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर पकड़ा, बर्बर ढंग से पीटा और 137 मजदूरों को हिरासत में लिया। 63 पर सीईओ की हत्‍या करने का आरोप लगाया गया। बाकियों पर बलवा करने और शांति भंग करने का आरोप लगाया गया। इस बार न्‍यायालय ने बड़ी मुस्‍तैदी से मजदूरों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। मजदूरों के साथ इंसानों जैसा बर्ताव करने का अनुरोध करने की हिमाकत करने के चलते तत्‍कालीन श्रम मंत्री ऑस्‍कर फर्नांडीज को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा। गरीब मजदूरों के परिवार सड़क पर आ गए। मीडिया को न पहले उनकी चिंता थी न अब है।

यह केवल दो घटनाओं से संबंधित तथ्‍यों की एक संक्षिप्‍त प्रस्‍तुति है: निष्‍कर्ष निकालने का काम पाठक स्‍वयं करें।

ग्रेजियानों की घटना के बारे में अधिक विस्‍तार से जानने के लिए मेरी एक पुरानी पोस्‍ट देखें।

Thursday, June 10, 2010

आज अगर नीरो होता...

इतिहास ने स्‍वयं को दोहराया तो जरूर पर जहां त्रासदी संहारक थी वहीं प्रहसन इतिहास की एक शर्मनाक प्रतीक घटना बनकर सामने आया है। 26 साल पहले हुई त्रासदी को अंजाम देने वालों को एक लंबी, उबाऊ और कष्‍टप्रद नौटंकी के बाद सजा के नाम पर तोहफे बांटे जा रहे हैं। 26 साल पहले इंसानियत रोई थी, आज वो शर्मसार है।

क्‍या लिखूं कुछ सूझ नहीं रहा है। पड़ोस के घरों से टीवी पर चल रहे किसी लाफ्टर शो के जजों और दर्शकों की अर्थहीन हंसी सोचने की प्रक्रिया को बाधित कर रही है। हां इस शर्मनाक घड़ी में भी लाफ्टर शो देखने वालों की कमी नहीं है। गनीमत है कि कोर्ट का यह फैसला आईपीएल के बीत जाने के बाद आया है वर्ना मीडिया वाले भी इस मुद्दे पर इतना समय जाया न करते।
15000 लोगों को कत्‍ल करने वाले को जनता के प्रतिनिधियों ने सरकारी हेलिकॉप्‍टर से भगा दिया। जनता की फिक्र करने वाली कोर्ट ने 26 साल तक भुक्‍तभोगियों को घाट-घाट का पानी पिलाया। आज एक तरफ जहां अपराधियों को प्रसाद बांटे जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ उसी पार्टी की सरकार न्‍यूक्लियर लायबिलिटी बिल तैयार कर रही है जिसमें भविष्‍य के ऐसे अपराधियों को हल्‍के में छोड़ देने के लिए कानूनी उपाय किए जा रहे हैं। एक जनप्रतिनिधि (कानून मंत्री) दिलासा दे रहे हैं कि केस बंद नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ से यह भी कह रहे हैं कि सरकार ने एंडरसन मामले में सीबीआई पर दबाव नहीं डाला था। 19 साल बाद रुचिका को तो न्‍याय लगता है मिल गया, पर भोपाल के लाखों लोगों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है।
अचानक जोरदार हंसी से पूरा मुहल्‍ला गूंज उठता है। किसी प्रतिस्‍पर्धी ने एक द्धिअर्थी चुटकुला सुनाया है। सेंसर बोर्ड के अलावा बाकी दुनिया को इस चुटकुले का एक ही अर्थ समझ में आएगा। इस चुटकुले पर सबसे जोर से हंसने वाला भी एक जनप्रतिधि है। ऐसा लगता है कि उसने सारी दुनिया की हंसी पर कब्‍जा कर लिया है और हंसे चले जाता है। उसकी हंसी में कभी बेशर्मी तो कभी अश्‍लीलता झलकती है। जनता के पास हंसने का कोई कारण ही नहीं बचा है। इसलिए आजकल हंसी को व्‍यायाम बना दिया गया है। एक ज्ञानी कहता है रोज इतनी देर हंसा करो (चाहे हिरोशिमा पर बम गिरे चाहे भोपाल में गैस रिसने से लोग मरें) नहीं तो फलाने-फलाने रोग हो जाएगा। कुछ लोग डर के मारे हंसते हैं। वे हंसी अफोर्ड कर सकते हैं, जनता नहीं कर सकती। जनता तो सिर्फ अपने ऊपर हंस सकती है। जनता केवल बेबसी की हंसी हंस सकती है, अपना चू..या कटते हुए देख कर हंस सकती है।
आज नीरो होता तो शायद भोपाल के किसी घर में टीवी पर लाफ्टर शो देख रहा होता।

Wednesday, April 21, 2010

नैतिकता पर महान वैज्ञानिक नील्‍स बोर के विचार।

नील्‍स बोर सिर्फ एक महान वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि अपने समय के महान सिद्धान्‍तकार और दार्शनिक भी थे। एक बार उन्‍होंने बताया कि अपने विद्यार्थी जीवन में वे दर्शन पर कुछ लिखने को लालायित थे। क्‍वाण्‍टम भौतिकी की एक किताब से यह उद्धरण प्रस्‍तुत कर रहा हूं :

वास्‍तव में वे (नील्‍स बोर) स्‍वतंत्र इच्‍छा की समस्‍या का गणितीय समाधान खोज रहे थे। यदि प्रकृति में सब कुछ पूर्वनिश्चित है और मनुष्‍य अपनी इच्‍छा को क्रियान्वित करने के‍ लिए स्‍वतन्‍त्र नहीं है तो कोई भी नैतिक मानदण्‍ड अर्थहीन हैं; चूंकि मनुष्‍य अपने व्‍यवहार में स्‍वतन्‍त्र नहीं है तो विवेक और नैतिकता की बात करना निराधार है। लेकिन यदि स्‍वतन्‍त्र इच्‍छा है तो शास्‍त्रीय नियतिवाद के साथ कोई कैसे इसका सामंजस्‍य कर सकता है, जिसके अनुसार प्रकृति में हर चीज विशुद्ध आवश्‍यकता द्वारा नियन्त्रित होती है।

उनकी जीवनी के सिर्फ इस तथ्य से हम शास्‍त्रीय नियतिवाद, यानी ब्रह्मांड में घटनाओं की पूर्वनिर्धारकता की अवधारणा के विध्‍वंस में उनकी भूमिका का अनुमान लगा सकते हैं।
(क्‍वाण्‍टम जगत की संभाव्‍यताएं - दानियल दानिन)