दिल्ली विश्वविद्यालय में जनचेतना के पुस्तक प्रदर्शनी वाहन पर राष्ट्रीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों के कायराना हमले ने एक बार फिर से उनकी असलियत उजागर कर दी है। वैसे भयानक अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने वालों की तारीफ में यह वाकया बहुत मामूली महत्व रखता है।
राष्ट्रीय संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों की सबसे बड़ी संस्कृति यह है कि यहां दिमाग का प्रयोग वर्जित है। दिमाग का प्रयोग केवल ऊपर के पदाधिकारी करते हैं और वह भी तर्क या बहस करने के लिए नहीं केवल अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने के नए-नए तरीके विकसित करने के लिए। निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को केवल हुक्म की तामील करनी होती है।
ऐसा करने के लिए पढ़ने लिखने की कोई जरूरत ही नहीं है। सारा ज्ञान तो भगवान श्रीकृष्ण गीता में कह ही गए है। वैसे भी आम आदमी को ज्ञान की जरूरत ही कहां है। बस भूत,पिशाच भगाने के लिए हनुमान चालीसा रट लो, और सुख-संपत्ति के लिए कुछ अन्य प्रकार की रचनाओं का जाप कर लो, इतने से ही बैकुण्ठ पार लग जाएगा।
तो फिर जिंदगी और समाज को बदलने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को नींद से झकझोरकर जगा देने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है। लोगों को जिंदगी की असलियत बताने वाली और 'बेहतर जिंदगी का रास्ता' दिखाने वाली 'बेहतर किताबों' की जरूरत ही क्या है। आम लोगों को जीने का ढंग सिखाने वाली किताबों की जरूरत ही क्या है।
लिहाजा 'रामराज्य' की प्राप्ति के लिए प्रयासरत 'अप'संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों ने हिंदी पट्टी में बड़े पैमाने पर प्रगतिशील साहित्य वितरित करने वाली संस्था जनचेतना के पुस्तक प्रदर्शनी वाहन पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक बार फिर हमला किया।
इस हमले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यह जनचेतना की मुहिम और समाज में आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी किताबों का प्रचार प्रसार करने की जरूरत रेखांकित होती है।
आज हर प्रकार के ढोंगी पाखंडी बाबाओं की और हर प्रकार की धार्मिक पुस्तकें, सीडी, कैसेट धड़ल्ले से बाजारों में बिक रहे हैं। लोगों की चेतना को कुंद करने वाली नशे की खुराक जैसे ये साहित्य जितनी आसानी से सुलभ हैं उतने प्रेमचंद या भगतसिहं नहीं हैं। हर प्रकार के पाखंडों, कुरीतियों, यहां तक कि धर्म के आवरण में लिपटी अश्लील कहानियां भी बड़े पैमाने पर लोगों को उपलब्ध कराई जा रही हैं और इन्हें राष्ट्रीय संस्कृति का जामा पहनाया जाता है।
जाहिर है कि ऐसा करने वालों को इंसान की तरह जीने और संघर्ष और सृजन की बात करने वाले साहित्य से खतरा महसूस होता है और भीड़ की ताकत के साथ मौका देखकर वे कायराना हमले भी करने से बाज नहीं आते।
सोचिए कि 'रामराज्य' में क्या होगा।
Wednesday, January 20, 2010
गुण्डागर्दी ही इनकी राष्ट्रीय संस्कृति है।
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Sunday, October 18, 2009
सामाजिक सरोकारों के लिए जेल पहुंचा पत्रकार .....इस विलुप्त होती नस्ल को आपके समर्थन की जरूरत है।
दिल्ली और नोएडा-गाजियाबाद के सामाजिक सरोकार रखने वाले सभी पत्रकारगण तपीश मेंदोला के नाम से परिचित होंगे। अगर आपको याद न हो तो बता दें कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान इसी नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता के अथक प्रयासों की बदौलत दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद में बड़े पैमाने पर गरीबों के बच्चों के गुमशुदा होने और पुलिस-प्रशासन की तरफ से उन्हें कोई मदद न मिलने उल्टा लापता बच्चों के गरीब मां-बाप को ही डराने, धमकाने और अपमानित करने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनीं। अनेक अखबारों और न्यूज चैनलों ने तपिश का इंटरव्यू भी लिया और दिखाया और कईयों ने उनकी मदद से लेकिन उनका या उनके संगठन नौजवान भारत सभा का नाम लिए बगैर प्रस्तुतियां कीं।
तपिश और नौजवान भारत सभा तथा सहयोगी संगठनों के प्रयासों की बदौलत गुमशुदा बच्चों के मामले पर दिल्ली हाइकोर्ट में सुनवाई चल रही है और कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में पुलिस-प्रशासन को काफी लताड़ भी पिलाई है।
फिलहाल तपिश और उनके दो और नौजवान साथी एक अन्य मजदूर के साथ जेल में बंद हैं, उनका जुर्म यह है कि उन्होंने एक बेहद मानवीय और कानूनी मसले पर कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए गोरखपुर के मजदूर आंदोलन का साथ दिया और उसमें अग्रणी भूमिका निभाई। कदम कदम पर फैक्ट्री मालिकों और जिला प्रशासन द्वारा विश्वासघात करने के बावजूद ढाई तीन महीने से चल रहे इस जुझारू आंदोलन में मजदूरों की तरफ से कोई उकसावे या हिंसा की घटना अभी तक सामने नहीं आयी है, हालांकि मालिकों और प्रशासन की तरफ से इस तरह की गतिविधियां लगातार जारी रही हैं। मालिकों ने अपने गुंडों के साथ मिलकर मजदूरों और उनके नेताओं पर जानलेवा हमला भी किया जिसमें स्वयं एक फैक्ट्री के मालिक ने रिवाल्वर से मारकर मारकर एक नौजवान प्रमोद का सिर फोड़ दिया। पर लोकत़ंत्र का खेल यह कि स्वयं इन नौजवानों और मजदूरों के खिलाफ ही कई प्रकार की धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया।
आंदोलन के दबाव में आने के बाद जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई 12 वार्ताएं फैक्ट्री मालिकों के असहयोग या अनुपस्थिति के कारण असफल सिद्ध हो चुकी हैं। इसके बाद अनशन पर बैठे मजूदरों को डराने धमकाने का पुलिसिया नाटक लगातार चल रहा था कि 15 अक्टूबर को बातचीत के बहाने मजदूर आंदोलन के तीन अग्रणी साथियों तपिश, प्रशांत और प्रमोद को प्रशासन ने बातचीत के बहाने एडीएम के कार्यालय बुलाया गया।
प्रशासन की नेकनीयत पर भरोसा करके वार्ता के लिए पहुंचे तीनों नौजवानों के साथ एडीएम के कार्यालय में सिटी मजिस्ट्रेट, एडीएम सिटी और कैंट थाने के इंस्पेक्टर और कुछ और पुलिस वालों ने बेरहमी से मारपीट की। फैक्ट्री मालिकों के लठैत की भूमिका में आ चुके प्रशासन ने लोकतंत्र का नकाब उतारकर पूरी नंगई के साथ बेरहम सलूक किया। बताने के बावजूद ह्रदय रोगी प्रशांत पर भी इन सरकारी दरिंदों ने अपना कहर बरपा किया और 17 अक्टूबर की शाम तक उन्हें डाक्टरी मदद नहीं दी गई थी। हालांकि पुलिस उनपर कोई गंभीर धारा नहीं लगा सकी बावजूद इसके उन्हें जमानत नहीं दी गई है और 22 अक्टूबर तक के लिए जेल भेज दिया गया है।
मुद्दा यह है कि अपने संविधानप्रदत्त जायज और बेहद छोटी मांगों के लिए भी यदि ऐसी ज्यादतियों का शिकार होना पड़े तो शायद शरीफ नागरिकों के सोचने का भी वक्त आ गया है कि यह लोकतंत्र है या निरंकुश तानाशाही। यह बात सिर्फ तपिश और उनके साथियों या गोरखपुर के मजदूर आंदोलन की नहीं है बल्कि यही हाल पूरे देश में है और 99.9 प्रतिशत मामलों में यही होता है। आज अगर हम चुप बैठे तो कल को यही हमारे साथ भी होगा और तब कोई बोलने वाला नहीं होगा।
मीडिया के सामाजिक सरोकारों पर बेहद गंभीर चर्चाएं करने वाले साथियों से मैं कहना चाहूंगा कि अब उससे आगे बढ़कर कुछ करने का समय आ गया है। सामाजिक सरोकार रखने वाला एक जुझारू पत्रकार अपने दो और नौजवान साथियों और एक मजदूर साथी के साथ जेल में बंद है क्योंकि उसने वह किया जो हम सबको करना चाहिए। सामाजिक सरोकार रखने वाले पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की विलुप्त होती प्रजाति के जो लोग भी शेष बचे हैं उनसे मेरी अपील है कि इस मुद्दे पर आगे आएं और अपना सहयोग-समर्थन दें।
विस्तृत जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
अपना सहयोग-समर्थन देने के लिए और अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें :
सत्यम : 9910462009 ईमेल: satyamvarma@gmail.com
संदीप : 9350457431
तपिश और नौजवान भारत सभा तथा सहयोगी संगठनों के प्रयासों की बदौलत गुमशुदा बच्चों के मामले पर दिल्ली हाइकोर्ट में सुनवाई चल रही है और कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में पुलिस-प्रशासन को काफी लताड़ भी पिलाई है।
फिलहाल तपिश और उनके दो और नौजवान साथी एक अन्य मजदूर के साथ जेल में बंद हैं, उनका जुर्म यह है कि उन्होंने एक बेहद मानवीय और कानूनी मसले पर कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए गोरखपुर के मजदूर आंदोलन का साथ दिया और उसमें अग्रणी भूमिका निभाई। कदम कदम पर फैक्ट्री मालिकों और जिला प्रशासन द्वारा विश्वासघात करने के बावजूद ढाई तीन महीने से चल रहे इस जुझारू आंदोलन में मजदूरों की तरफ से कोई उकसावे या हिंसा की घटना अभी तक सामने नहीं आयी है, हालांकि मालिकों और प्रशासन की तरफ से इस तरह की गतिविधियां लगातार जारी रही हैं। मालिकों ने अपने गुंडों के साथ मिलकर मजदूरों और उनके नेताओं पर जानलेवा हमला भी किया जिसमें स्वयं एक फैक्ट्री के मालिक ने रिवाल्वर से मारकर मारकर एक नौजवान प्रमोद का सिर फोड़ दिया। पर लोकत़ंत्र का खेल यह कि स्वयं इन नौजवानों और मजदूरों के खिलाफ ही कई प्रकार की धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया।
आंदोलन के दबाव में आने के बाद जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई 12 वार्ताएं फैक्ट्री मालिकों के असहयोग या अनुपस्थिति के कारण असफल सिद्ध हो चुकी हैं। इसके बाद अनशन पर बैठे मजूदरों को डराने धमकाने का पुलिसिया नाटक लगातार चल रहा था कि 15 अक्टूबर को बातचीत के बहाने मजदूर आंदोलन के तीन अग्रणी साथियों तपिश, प्रशांत और प्रमोद को प्रशासन ने बातचीत के बहाने एडीएम के कार्यालय बुलाया गया।
प्रशासन की नेकनीयत पर भरोसा करके वार्ता के लिए पहुंचे तीनों नौजवानों के साथ एडीएम के कार्यालय में सिटी मजिस्ट्रेट, एडीएम सिटी और कैंट थाने के इंस्पेक्टर और कुछ और पुलिस वालों ने बेरहमी से मारपीट की। फैक्ट्री मालिकों के लठैत की भूमिका में आ चुके प्रशासन ने लोकतंत्र का नकाब उतारकर पूरी नंगई के साथ बेरहम सलूक किया। बताने के बावजूद ह्रदय रोगी प्रशांत पर भी इन सरकारी दरिंदों ने अपना कहर बरपा किया और 17 अक्टूबर की शाम तक उन्हें डाक्टरी मदद नहीं दी गई थी। हालांकि पुलिस उनपर कोई गंभीर धारा नहीं लगा सकी बावजूद इसके उन्हें जमानत नहीं दी गई है और 22 अक्टूबर तक के लिए जेल भेज दिया गया है।
मुद्दा यह है कि अपने संविधानप्रदत्त जायज और बेहद छोटी मांगों के लिए भी यदि ऐसी ज्यादतियों का शिकार होना पड़े तो शायद शरीफ नागरिकों के सोचने का भी वक्त आ गया है कि यह लोकतंत्र है या निरंकुश तानाशाही। यह बात सिर्फ तपिश और उनके साथियों या गोरखपुर के मजदूर आंदोलन की नहीं है बल्कि यही हाल पूरे देश में है और 99.9 प्रतिशत मामलों में यही होता है। आज अगर हम चुप बैठे तो कल को यही हमारे साथ भी होगा और तब कोई बोलने वाला नहीं होगा।
मीडिया के सामाजिक सरोकारों पर बेहद गंभीर चर्चाएं करने वाले साथियों से मैं कहना चाहूंगा कि अब उससे आगे बढ़कर कुछ करने का समय आ गया है। सामाजिक सरोकार रखने वाला एक जुझारू पत्रकार अपने दो और नौजवान साथियों और एक मजदूर साथी के साथ जेल में बंद है क्योंकि उसने वह किया जो हम सबको करना चाहिए। सामाजिक सरोकार रखने वाले पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की विलुप्त होती प्रजाति के जो लोग भी शेष बचे हैं उनसे मेरी अपील है कि इस मुद्दे पर आगे आएं और अपना सहयोग-समर्थन दें।
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Sunday, September 13, 2009
हड़ताल 'अपराध' नहीं पवित्र धर्म है।
जेट एअरवेज़ के पायलटों की हड़ताल के संदर्भ में 11 सिंतंबर 09 के अपने संपादकीय 'हड़ताल का अपराध' में नई दुनिया अखबार यह प्रश्न करता है कि 'हड़ताल करने वालों को कड़ा दंड देने के लिए व्यापक जनसमर्थन और बहुमत के बल पर कानून बनाने की आवश्यकता हो गई है। हड़तालों पर कड़े अंकुश के लिए क्या घिसे-पिटे पुराने कानूनों में फेरबदल पर विचार करने का सही वक्त नहीं आ गया है?'
आउटलुक पत्रिका के संभवत: जुलाई 09 के अंक में एक लेख में लंदन के ट्यूब ट्रेनों की हड़ताल के विषय में लेखक कहता है कि इस हड़ताल से सबसे अधिक दिक्कत 'आम आदमी' को हुई।
हो सकता है आप भी कहें कि उपरोक्त दोनों बातें सच ही तो हैं। आखिर हडतालों के कारण लोगों को तमाम असुविधाएं होती हैं, बहुत से जरूरतमंद लोग अत्यावश्यक सेवाओं से वंचित रह जाते हैं, काम और व्यवसाय का नुकसान होता है, सरकारी और गैरसरकारी तथा राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान होता है, उत्पादक गतिविधियां ठप्प हो जाती हैं और उत्पादक श्रम बेकार चला जाता है। और शायद आप प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से यह भी कहने या जताने से न चूकें कि यह सब नाहक ही होता है और यह शैतानी तबियत वाले चंद निठल्ले लोगों के दिमाग की उपज होती है।
और बहुत हद तक यह भी संभव है कि आप शायद अपने ये इंप्रेशन हड़ताल के कारण को जानने-समझने के पहले ही बना चुके हों।
कोई चीज सिर्फ इसलिए गलत नहीं हो जाती क्योंकि कुछ लोग उसका इस्तेमाल गलत ढंग से या गलत उद्देश्य के लिए करते हैं। पायलटों को लाखों रुपये वेतन और भत्तों में मिलते हैं और उनकी ड्यूटी भी अपेक्षाकृत आरामदायक होती है केवल इसलिए हड़ताल एक गलत हथियार नहीं हो जाता। हड़ताल किसी स्थिति के असहनीय हो जाने पर अपना विरोध जताने और दबाव बनाने का एक तरीका है, और किसी भी अन्य तरीके की तरह इसके सही या गलत होने का फैसला हड़ताल के मूल कारण की पड़ताल किए बिना नहीं किया जा सकता।
हड़ताल का नाम सुनते ही आउटलुक के लेख के लेखक की तरह कई लोगों का 'आम आदमी'-प्रेम उमड़कर बाहर आने लगता है। पर ये बेचारे अतिभावुक मासूम लोग ये नहीं सोचते कि हड़ताल करने वाले भी आम लोग ही होते हैं (हालांकि हमेशा ऐसा नही होता मगर ज्यादातर तो होता ही है)। अगर खास होते तो हड़ताल कर ही क्यों रहे होते। (खास लोग लॉबीइंग करते हैं दबाव डालते हैं, हड़ताल नहीं करते)। खास लोगों को हड़ताल करने की जरूरत ही नहीं होती। आप कभी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि ये हड़ताली आम लोग हड़ताल कर ही क्यों रहे हैं। आप कभी ये जानने की कोशिश भी नहीं करते कि शायद शांतिप्रिय तरीकों के असफल हो जाने के बाद ही हड़ताल की जरूरत पड़ी हो, शायद हड़तालियों के साथ अन्याय हुआ हो, शायद अकेले-अकेले उनकी आवाज दबाई जा रही हो और इसलिए उन्हें समूह की शक्ति से अपनी आवाज जोर से उठाने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया हो। पर हो सकता है कि आप 'आम आदमी' के दुख में इतने दुबलाए जा रहे हों कि आपके मन में ये प्रश्न उठते ही न हों।
क्या आपको मालूम है ऐसा क्यों है?
चौंकिए मत ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने अपने आप को ही आम आदमी समझ लिया है। इस्त्री किए कपड़े पहने, लंच पैक थामे, प्रोमोशन, बीमा, फ्लैट और कार की किश्त, मुन्नू को इजीनियरिंग कालेज में एडमिशन दिलाने के लिए डोनेशन, मुन्नी के दहेज के लिए रकम, अर्थव्यस्था के ढहने के कारण शेयरों के गिरते भाव.... आदि आदि में आप इतने बेहाल-परेशान रहते हैं कि आपको लगता है कि आप से ज्यादा 'आम' दुनिया में और कोई है ही नहीं। और ऊपर से ये हड़ताल करने वाले उफ्फ.... स्साले!! काम के न काज के, दुश्मन (आपके)अनाज के!!!
यह भी हो सकता है कि आप डीटीसी की बस के बजाय ए सी कार में बैठे हों और तब तो बस पूछिए मत। दीज़ ब्लडी इंडियंस, गुड फॉर नथिंग। इनको तो कोई तानाशाह ही ठीक कर सकता है।
जाहिर सी बात है कि मन ही मन वो तानाशाह भी आप स्वयं को ही समझते हैं। या आपको लगता है कि वो तानाशाह आपका पास का नहीं तो आपका दूर का रिश्तेदार तो होगा ही।
हडतालों के साथ एक और मजेदार मिथक यह है कि सिर्फ कर्मचारी ही हड़ताल करते हैं।
अगर यह सच है तो संसद और विधानसभाओं में विरोध स्वरूप सदन से वॉक आऊट करना और सार्वजनिक संपत्ति का लाखों-करोड़ों रुपया वारा न्यारा करना क्या हड़ताल का रूप नहीं है।
और पूंजीपतियों की हड़ताल के बारे में क्या ख्याल है।
जो पूजीपति निवेश करने के लिए और मनमाफिक मुनाफा पीटने के लिए तमाम तरह की शर्तें लगाते हैं धमकियां देते हें, ब्लैकमेल करते हैं यहां तक कि अपनी गलतियों के कारण दीवाला निकल जाने पर पूरे रौब के साथ बेल आउट पैकेज की मांग करते हें क्या वो हड़ताल नहीं है और क्या उससे 'आम आदमी' को परेशानी नहीं होती है। जहां कर्मचारियों की मांगे बेहद छोटी और काफी हद तक जायज होती हैं वहीं सरकार के सामने पूंजीपतियों की शर्तें देखिए और आप स्वयं अंदाजा लगाइये।
- सस्ती जमीन दो नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- बिजली पानी सस्ता दो और बिजली पानी के लाखों करोड़ों रुपये के बकाया बिलों के भुगतान की बात भी मत करो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- करों में तमाम तरह की छूट दो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- पुलिस और सरकारी अधिकारियों से कहो कि घूस भले लें लेकिन ज्यादा सख्ती नहीं करें, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- श्रम कानूनों में ढील दो, जो मौजूदा कानून हैं उनको भी लागू मत करो, कर्मचारियों-मजदूरों का खून पसीना निचोड़ने की पूरी आजादी दो, जब बात हमारे गुडों की जद से बाहर हो जाए तो उनसे हमें बचाने और उनकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए पुलिसिया सुरक्षा का वायदा करो और यूनियन बनाने की आजादी तो बिल्कुल मत दो, नहीं तो हम निवेश नहीं करेंगे।
- कानून व्यवस्था को ऐसी बनाओं की हम चाहें तो कोर्ट कचहरी के चक्कर लगवा-लगवाकर कर्मचारियों का जूता घिसवा डालें। अगर कोई केस करे भी तो बाप के केस का फैसला उसके बेटे के बुढ़ा जाने पर ही हो। और अगर कर्मचारी जीत भी जाए तो जुर्माना इतना कम हो कि बेचारा केस जीतकर भी ठगा सा महसूस करे।
- आदि आदि आदि ...... (इस सूची का कोई अंत नहीं है.)
तो क्या यह भी एक तरह का हड़ताल नहीं है। और क्या नई दुनिया और उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले इसे भी 'अपराध' मानते हैं।
पुनश्च : नई दुनिया के संपादक लिखते हैं कि '...जब पूरी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था तथा जनता अपने आर्थिक विकास की गति पर गौरव करते हुए प्रगति के शिखर पर पहुंचने की आकांक्षा रखती है, तब सरकार हड़ताल जैसे गलत हथियारों के इस्तेमाल की छूट क्यों दे रही है'। अब पता नहीं संपादक जी ने देश के 20 रुपया रोज से कम पर जीने वाले देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी को उस 'जनता' में शामिल किया है या नहीं जो आर्थिक विकास पर गौरव कर रही है। यही प्रश्न भारत के हर चौथे भूखे नागरिक, और कुपोषण के शिकार पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की लगभग आधी आबादी की तरफ से भी पूछी जा सकती है कि वे 'जनता' में शामिल हैं या नहीं और 'गौरव' करने का हक उन्हें भी है या नहीं।
ब्लॉग की एक पोस्ट के लिए इस विषय पर फिलहाल इतना ही...।
आउटलुक पत्रिका के संभवत: जुलाई 09 के अंक में एक लेख में लंदन के ट्यूब ट्रेनों की हड़ताल के विषय में लेखक कहता है कि इस हड़ताल से सबसे अधिक दिक्कत 'आम आदमी' को हुई।
हो सकता है आप भी कहें कि उपरोक्त दोनों बातें सच ही तो हैं। आखिर हडतालों के कारण लोगों को तमाम असुविधाएं होती हैं, बहुत से जरूरतमंद लोग अत्यावश्यक सेवाओं से वंचित रह जाते हैं, काम और व्यवसाय का नुकसान होता है, सरकारी और गैरसरकारी तथा राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान होता है, उत्पादक गतिविधियां ठप्प हो जाती हैं और उत्पादक श्रम बेकार चला जाता है। और शायद आप प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से यह भी कहने या जताने से न चूकें कि यह सब नाहक ही होता है और यह शैतानी तबियत वाले चंद निठल्ले लोगों के दिमाग की उपज होती है।
और बहुत हद तक यह भी संभव है कि आप शायद अपने ये इंप्रेशन हड़ताल के कारण को जानने-समझने के पहले ही बना चुके हों।
कोई चीज सिर्फ इसलिए गलत नहीं हो जाती क्योंकि कुछ लोग उसका इस्तेमाल गलत ढंग से या गलत उद्देश्य के लिए करते हैं। पायलटों को लाखों रुपये वेतन और भत्तों में मिलते हैं और उनकी ड्यूटी भी अपेक्षाकृत आरामदायक होती है केवल इसलिए हड़ताल एक गलत हथियार नहीं हो जाता। हड़ताल किसी स्थिति के असहनीय हो जाने पर अपना विरोध जताने और दबाव बनाने का एक तरीका है, और किसी भी अन्य तरीके की तरह इसके सही या गलत होने का फैसला हड़ताल के मूल कारण की पड़ताल किए बिना नहीं किया जा सकता।
हड़ताल का नाम सुनते ही आउटलुक के लेख के लेखक की तरह कई लोगों का 'आम आदमी'-प्रेम उमड़कर बाहर आने लगता है। पर ये बेचारे अतिभावुक मासूम लोग ये नहीं सोचते कि हड़ताल करने वाले भी आम लोग ही होते हैं (हालांकि हमेशा ऐसा नही होता मगर ज्यादातर तो होता ही है)। अगर खास होते तो हड़ताल कर ही क्यों रहे होते। (खास लोग लॉबीइंग करते हैं दबाव डालते हैं, हड़ताल नहीं करते)। खास लोगों को हड़ताल करने की जरूरत ही नहीं होती। आप कभी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि ये हड़ताली आम लोग हड़ताल कर ही क्यों रहे हैं। आप कभी ये जानने की कोशिश भी नहीं करते कि शायद शांतिप्रिय तरीकों के असफल हो जाने के बाद ही हड़ताल की जरूरत पड़ी हो, शायद हड़तालियों के साथ अन्याय हुआ हो, शायद अकेले-अकेले उनकी आवाज दबाई जा रही हो और इसलिए उन्हें समूह की शक्ति से अपनी आवाज जोर से उठाने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया हो। पर हो सकता है कि आप 'आम आदमी' के दुख में इतने दुबलाए जा रहे हों कि आपके मन में ये प्रश्न उठते ही न हों।
क्या आपको मालूम है ऐसा क्यों है?
चौंकिए मत ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने अपने आप को ही आम आदमी समझ लिया है। इस्त्री किए कपड़े पहने, लंच पैक थामे, प्रोमोशन, बीमा, फ्लैट और कार की किश्त, मुन्नू को इजीनियरिंग कालेज में एडमिशन दिलाने के लिए डोनेशन, मुन्नी के दहेज के लिए रकम, अर्थव्यस्था के ढहने के कारण शेयरों के गिरते भाव.... आदि आदि में आप इतने बेहाल-परेशान रहते हैं कि आपको लगता है कि आप से ज्यादा 'आम' दुनिया में और कोई है ही नहीं। और ऊपर से ये हड़ताल करने वाले उफ्फ.... स्साले!! काम के न काज के, दुश्मन (आपके)अनाज के!!!
यह भी हो सकता है कि आप डीटीसी की बस के बजाय ए सी कार में बैठे हों और तब तो बस पूछिए मत। दीज़ ब्लडी इंडियंस, गुड फॉर नथिंग। इनको तो कोई तानाशाह ही ठीक कर सकता है।
जाहिर सी बात है कि मन ही मन वो तानाशाह भी आप स्वयं को ही समझते हैं। या आपको लगता है कि वो तानाशाह आपका पास का नहीं तो आपका दूर का रिश्तेदार तो होगा ही।
हडतालों के साथ एक और मजेदार मिथक यह है कि सिर्फ कर्मचारी ही हड़ताल करते हैं।
अगर यह सच है तो संसद और विधानसभाओं में विरोध स्वरूप सदन से वॉक आऊट करना और सार्वजनिक संपत्ति का लाखों-करोड़ों रुपया वारा न्यारा करना क्या हड़ताल का रूप नहीं है।
और पूंजीपतियों की हड़ताल के बारे में क्या ख्याल है।
जो पूजीपति निवेश करने के लिए और मनमाफिक मुनाफा पीटने के लिए तमाम तरह की शर्तें लगाते हैं धमकियां देते हें, ब्लैकमेल करते हैं यहां तक कि अपनी गलतियों के कारण दीवाला निकल जाने पर पूरे रौब के साथ बेल आउट पैकेज की मांग करते हें क्या वो हड़ताल नहीं है और क्या उससे 'आम आदमी' को परेशानी नहीं होती है। जहां कर्मचारियों की मांगे बेहद छोटी और काफी हद तक जायज होती हैं वहीं सरकार के सामने पूंजीपतियों की शर्तें देखिए और आप स्वयं अंदाजा लगाइये।
- सस्ती जमीन दो नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- बिजली पानी सस्ता दो और बिजली पानी के लाखों करोड़ों रुपये के बकाया बिलों के भुगतान की बात भी मत करो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- करों में तमाम तरह की छूट दो, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- पुलिस और सरकारी अधिकारियों से कहो कि घूस भले लें लेकिन ज्यादा सख्ती नहीं करें, नहीं तो निवेश नहीं करेंगे।
- श्रम कानूनों में ढील दो, जो मौजूदा कानून हैं उनको भी लागू मत करो, कर्मचारियों-मजदूरों का खून पसीना निचोड़ने की पूरी आजादी दो, जब बात हमारे गुडों की जद से बाहर हो जाए तो उनसे हमें बचाने और उनकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए पुलिसिया सुरक्षा का वायदा करो और यूनियन बनाने की आजादी तो बिल्कुल मत दो, नहीं तो हम निवेश नहीं करेंगे।
- कानून व्यवस्था को ऐसी बनाओं की हम चाहें तो कोर्ट कचहरी के चक्कर लगवा-लगवाकर कर्मचारियों का जूता घिसवा डालें। अगर कोई केस करे भी तो बाप के केस का फैसला उसके बेटे के बुढ़ा जाने पर ही हो। और अगर कर्मचारी जीत भी जाए तो जुर्माना इतना कम हो कि बेचारा केस जीतकर भी ठगा सा महसूस करे।
- आदि आदि आदि ...... (इस सूची का कोई अंत नहीं है.)
तो क्या यह भी एक तरह का हड़ताल नहीं है। और क्या नई दुनिया और उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले इसे भी 'अपराध' मानते हैं।
पुनश्च : नई दुनिया के संपादक लिखते हैं कि '...जब पूरी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था तथा जनता अपने आर्थिक विकास की गति पर गौरव करते हुए प्रगति के शिखर पर पहुंचने की आकांक्षा रखती है, तब सरकार हड़ताल जैसे गलत हथियारों के इस्तेमाल की छूट क्यों दे रही है'। अब पता नहीं संपादक जी ने देश के 20 रुपया रोज से कम पर जीने वाले देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी को उस 'जनता' में शामिल किया है या नहीं जो आर्थिक विकास पर गौरव कर रही है। यही प्रश्न भारत के हर चौथे भूखे नागरिक, और कुपोषण के शिकार पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की लगभग आधी आबादी की तरफ से भी पूछी जा सकती है कि वे 'जनता' में शामिल हैं या नहीं और 'गौरव' करने का हक उन्हें भी है या नहीं।
ब्लॉग की एक पोस्ट के लिए इस विषय पर फिलहाल इतना ही...।
Monday, July 13, 2009
मीडिया में आई गिरावट पर मीडिया वालों की चिंता का सार क्या है...।
आजकल मीडिया में स्वयं मीडिया की आलोचना छायी हुई है। मीडिया के गिरते स्तर पर मीडिया से जुड़े तमाम लोग विचार-विमर्श कर रहे हैं। सरकार भी मीडिया पर नियंत्रण लगाने के मूड मे दीख रही है और अगर सरकार जल्दी करती नहीं दीख रही है तो इसका बस एक ही कारण है कि अपनी तमाम गिरावट के बावजूद मीडिया सरकार के लिए उपयोगी ही साबित हो रहा है, वह स्वयं अपने तईं वह सारे काम कर रहा है जो वर्तमान दौर में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के लिहाज से प्रासंगिक है। मोटा-मोटी यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया का जिस हद तक पतन होता जाएगा उस हद तक वह आम जनता के लिए नुकसानदेह और सरकार के लिए फायदेमंद होता जाएगा।
यहीं यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर मीडिया के पतन पर इतना शोर क्यों।
इस प्रश्न का जवाब एक दूसरे प्रश्न के जवाब में निहित है कि मीडिया के पतन पर चिन्ता व्यक्त करने वाले लोग कौन हैं और उनकी चिन्ता का सार क्या है।
व्यक्तियों से पहले विचारों की बात करना सही तरीका होगा क्योंकि अंतत: व्यक्तियों का महत्व उनके नामों से नहीं बल्कि उनके विचारों से ही तय होता है और विचारहीन मनुष्य जैसी कोई चीज नहीं होती।
मीडिया के पतन पर स्यापा करने वाले ज्यादातर लोग स्वयं मीडिया की इस पतनकथा के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इन तमाम प्रत्यक्षदर्शियों में से ज्यादातर मीडिया में आई इस गिरावट के हमसफर रहे हैं, कुछ इस गिरावट के लिए जिम्मेदार रहे हैं तो कुछ मूकदर्शक और कुछ अन्य इसके लाभार्थी रहे हैं।
आज वे मीडिया में आई गिरावट पर आश्चर्यव्यक्त कर रहे हैं तो यह अपने आप में एक आश्चर्य की बात है क्योंकि मीडिया में मूल्यों का ह्रास किसी दुर्घटना का दुष्परिणाम नहीं बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है जो लगातार उनकी आंखों के सामने घटती रही है।
आज मीडिया के जनपक्षधर न रह जाने की बात की जाती है पर इस बिन्दु पर विचार पर विचार नहीं किया जाता कि मीडिया अपने आप में कोई चिंतनशील प्राणी नहीं है। वह कितना जनपक्षधर है यह इस बात से तय होता है कि मीडिया से जुड़े लोग कितने जनपक्षधर रह गये हैं। मीडिया समाज से इतर कोई चीज नहीं है। वह समाज को प्रभावित भी करता है और समाज से प्रभावित भी होता है। समाज में जिन मूल्यों का बोलबाला होगा, समाज में जिन विचारों, लोगों और व्यवस्थाओं का प्रभुत्व होगा उसी की छाप उस समय के मीडिया पर रहेगी। आज मीडिया की चर्चा एक स्वायत्त स्वतंत्र निकाय के रूप मे की जा रही है, अन्य सामाजिक शक्तियों के साथ उसके अंतरसंबंधों का विश्लेषण नहीं किया जाता।
मीडिया की वर्तमान हालत पर चिंता व्यक्त करने वाले लेखों का विश्लेषण सतही, पूरा सत्य नहीं बल्कि सत्यांश, अपने को किनारे रखकर किया गया और ऐतिहासिक समझ के अभाव से परिपूर्ण नजर आता है।
आज के मीडिया को आज के विशिष्ट ऐतिहासिक दौर से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब समाज में ही प्रगति पर प्रतिक्रिया हावी है, और आज जब ज्यादा नहीं बल्कि 60 साल पहले के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौर के मूल्य भी क्षरित हो गये हैं तो हम गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद और राधा मोहन गोकुलजी जैसे पत्रकारों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
आज के मीडिया के स्वामित्व के स्वरूप, उसके उत्पादन के स्वरूप और उसका उत्पादन करने वाले लोग तथा उसके उपभोग के स्वरूप पर विचार करने के बाद और मीडिया मालिकों और मीडियाकर्मियों और मीडियाकर्मियों और आम लोगों के बीच के संबंधों पर विचार करने के बाद यह समझने के लिए बहुत अक्ल की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि आज का मीडिया ऐसा ही हो सकता है।
सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बहुत हद तक इस बात से तय होता है कि समाज के प्रभावशाली तबकों के हितों के अनुसार चीजें कैसी होनी चाहिए।
असली मुद्दों के बजाय गौड़ मुद्दों की तरफ लोगों का ध्यान भटकाना, लोगों को अतार्किक और अवैज्ञानिक बनाना, विचारों के बजाय वस्तुओं और विश्लेषण की दृष्टि देने के बजाय तथ्यों पर जोर देना, पहलकदमी संगठित करने के बजाय लोगों को निष्क्रिय श्रोता बनाना क्या ये ही वे चीजें नहीं हैं जो किसी भी दौर के शासक वर्ग की जरूरत होती हैं। लोग अपनी दाल-रोटी के बजाय राखी सावंत के स्वयंवर में ज्यादा दिलचस्पी लें क्या आज के मालिक वर्ग की इसके अलावा कोई और चाहत हो सकती है। और क्या आज का मीडिया बिल्कुल यही काम नहीं कर रहा है। और क्या नामी-गिरामी मीडिया वालों को लाखों का पैकेज और अन्य सुख-सुविधाएं यही काम करने के लिए नहीं दी जा रही हैं।
खैर मैं जिस मुद्दे की तरफ फिलहाल आना चाहता हूं वह यह है कि मीडिया की हालत पर स्यापा करने वालों या यहां तक कि उसकी आलोचना करने वालों की चिंता/आलोचना का सार क्या है।
हमारे चिंतकों और सरकार की मुख्य चिंता यह है कि जिस तेजी से मीडिया अपने रसातल की ओर जाता रहा है उससे कहीं उसकी विश्वसनीयता ही संदेह के घेरे में न आ जाए क्योंकि यदि ऐसा हो गया तो जनमानस पर अपने विचारों का प्रभाव कैसे डाला जा सकेगा। एक मायने में यह चिंता सही भी है क्योंकि आजकल मीडिया में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है वह बुर्जुआ मानदंडों से भी बेहद घटिया स्तर का है। अखबारों के संपादकीय पृष्ठों की सामग्री का स्तर बेहद गिर गया है और पूरा लेख पढ़ने के बाद उसमें से कोई काम की बात कोई तार्किक समझदारी या विश्लेषण ढूंढ पाना मुश्किल होता है। कुछ स्वनामधन्य प्रतिष्ठित स्तंभकार अपनी चवन्नी चलाए जा रहे हैं। ज्यादातर लेखों का कोई आपरेटिव पार्ट ही नहीं होता है और यह समझना मुश्किल होता है कि लेख लिखा ही क्यों गया था। लगता है कि हमारे माननीय पत्रकारों, विचारकों ने सोचना-समझना, चिंतन करना और यहां तक कि पढ़ना-लिखना भी बंद कर दिया है। दो-चार डेटा, पुरानी पढ़ाई से हासिल दो-चार तर्क, दो-चार शब्दों की बाजीगरी और हो गया लेख तैयार। न्यूज और विज्ञापन का फर्क मिटता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महिमागान करने वाला मीडिया यह नहीं बताता कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिल जाना ही पूरा जनवाद नहीं होता। आज का मीडिया कहीं एकदम साफ झूठ बोल रहा है तो कहीं सत्यांश, कहीं वह जितना कहता है उससे कहीं ज्यादा छुपाता है तो कहीं वह निष्पक्षता की आड़ में स्पष्टत: जनविरोधी और प्रतिक्रियावादी प्रचार का माध्यम बना हुआ है।
मीडिया की दुर्गति पर चिंतित ज्यादतर विचारकों की चिंता उसके जनपक्षधर चरित्र की नहीं बल्कि उसकी स्तरहीन सामग्री को लेकर है। लेकिन मीडिया की बीमार हालत का उनका रोग-निदान जितना सतही और आंशिक है उनकी सलाह उतनी ही निष्प्रभावी है। कुल मिलाकर उनकी बातों का सार यह है कि मीडिया की विभिन्न भूमिकाओं के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, कुछ कुछ सुधार करके चीजों को ठीक कर लिया जाए, न्यूज और विज्ञापन के बीच संतुलन बनाया जाए और मुनाफे के उद्यम के साथ-साथ मीडिया की विश्वसनीयता पर आंच भी न आने दी जाए। पूंजीपतियों के स्वामित्व वाले मीडिया के विकल्प का कोई खाका उनके पास नहीं है। उनकी गरमा-गरम आलोचना में किसी सार्थक पहल की दिशा नहीं है नौजवान मीडियाकर्मियों को वे इसी प्रणाली में फिट हो जाने के अलावा कोई दूसर मार्ग नहीं दिखा सकते। आखिर इसी मीडिया ने उन्हें शोहरत और सहूलियतें दी हैं इसलिए इसके स्वास्थ्य की चिंता तो उन्हें होती ही है, यह दीगर बात है कि इसका इलाज करने में वे असमर्थ हैं।
यहीं यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिर मीडिया के पतन पर इतना शोर क्यों।
इस प्रश्न का जवाब एक दूसरे प्रश्न के जवाब में निहित है कि मीडिया के पतन पर चिन्ता व्यक्त करने वाले लोग कौन हैं और उनकी चिन्ता का सार क्या है।
व्यक्तियों से पहले विचारों की बात करना सही तरीका होगा क्योंकि अंतत: व्यक्तियों का महत्व उनके नामों से नहीं बल्कि उनके विचारों से ही तय होता है और विचारहीन मनुष्य जैसी कोई चीज नहीं होती।
मीडिया के पतन पर स्यापा करने वाले ज्यादातर लोग स्वयं मीडिया की इस पतनकथा के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इन तमाम प्रत्यक्षदर्शियों में से ज्यादातर मीडिया में आई इस गिरावट के हमसफर रहे हैं, कुछ इस गिरावट के लिए जिम्मेदार रहे हैं तो कुछ मूकदर्शक और कुछ अन्य इसके लाभार्थी रहे हैं।
आज वे मीडिया में आई गिरावट पर आश्चर्यव्यक्त कर रहे हैं तो यह अपने आप में एक आश्चर्य की बात है क्योंकि मीडिया में मूल्यों का ह्रास किसी दुर्घटना का दुष्परिणाम नहीं बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है जो लगातार उनकी आंखों के सामने घटती रही है।
आज मीडिया के जनपक्षधर न रह जाने की बात की जाती है पर इस बिन्दु पर विचार पर विचार नहीं किया जाता कि मीडिया अपने आप में कोई चिंतनशील प्राणी नहीं है। वह कितना जनपक्षधर है यह इस बात से तय होता है कि मीडिया से जुड़े लोग कितने जनपक्षधर रह गये हैं। मीडिया समाज से इतर कोई चीज नहीं है। वह समाज को प्रभावित भी करता है और समाज से प्रभावित भी होता है। समाज में जिन मूल्यों का बोलबाला होगा, समाज में जिन विचारों, लोगों और व्यवस्थाओं का प्रभुत्व होगा उसी की छाप उस समय के मीडिया पर रहेगी। आज मीडिया की चर्चा एक स्वायत्त स्वतंत्र निकाय के रूप मे की जा रही है, अन्य सामाजिक शक्तियों के साथ उसके अंतरसंबंधों का विश्लेषण नहीं किया जाता।
मीडिया की वर्तमान हालत पर चिंता व्यक्त करने वाले लेखों का विश्लेषण सतही, पूरा सत्य नहीं बल्कि सत्यांश, अपने को किनारे रखकर किया गया और ऐतिहासिक समझ के अभाव से परिपूर्ण नजर आता है।
आज के मीडिया को आज के विशिष्ट ऐतिहासिक दौर से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब समाज में ही प्रगति पर प्रतिक्रिया हावी है, और आज जब ज्यादा नहीं बल्कि 60 साल पहले के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौर के मूल्य भी क्षरित हो गये हैं तो हम गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद और राधा मोहन गोकुलजी जैसे पत्रकारों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
आज के मीडिया के स्वामित्व के स्वरूप, उसके उत्पादन के स्वरूप और उसका उत्पादन करने वाले लोग तथा उसके उपभोग के स्वरूप पर विचार करने के बाद और मीडिया मालिकों और मीडियाकर्मियों और मीडियाकर्मियों और आम लोगों के बीच के संबंधों पर विचार करने के बाद यह समझने के लिए बहुत अक्ल की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि आज का मीडिया ऐसा ही हो सकता है।
सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बहुत हद तक इस बात से तय होता है कि समाज के प्रभावशाली तबकों के हितों के अनुसार चीजें कैसी होनी चाहिए।
असली मुद्दों के बजाय गौड़ मुद्दों की तरफ लोगों का ध्यान भटकाना, लोगों को अतार्किक और अवैज्ञानिक बनाना, विचारों के बजाय वस्तुओं और विश्लेषण की दृष्टि देने के बजाय तथ्यों पर जोर देना, पहलकदमी संगठित करने के बजाय लोगों को निष्क्रिय श्रोता बनाना क्या ये ही वे चीजें नहीं हैं जो किसी भी दौर के शासक वर्ग की जरूरत होती हैं। लोग अपनी दाल-रोटी के बजाय राखी सावंत के स्वयंवर में ज्यादा दिलचस्पी लें क्या आज के मालिक वर्ग की इसके अलावा कोई और चाहत हो सकती है। और क्या आज का मीडिया बिल्कुल यही काम नहीं कर रहा है। और क्या नामी-गिरामी मीडिया वालों को लाखों का पैकेज और अन्य सुख-सुविधाएं यही काम करने के लिए नहीं दी जा रही हैं।
खैर मैं जिस मुद्दे की तरफ फिलहाल आना चाहता हूं वह यह है कि मीडिया की हालत पर स्यापा करने वालों या यहां तक कि उसकी आलोचना करने वालों की चिंता/आलोचना का सार क्या है।
हमारे चिंतकों और सरकार की मुख्य चिंता यह है कि जिस तेजी से मीडिया अपने रसातल की ओर जाता रहा है उससे कहीं उसकी विश्वसनीयता ही संदेह के घेरे में न आ जाए क्योंकि यदि ऐसा हो गया तो जनमानस पर अपने विचारों का प्रभाव कैसे डाला जा सकेगा। एक मायने में यह चिंता सही भी है क्योंकि आजकल मीडिया में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है वह बुर्जुआ मानदंडों से भी बेहद घटिया स्तर का है। अखबारों के संपादकीय पृष्ठों की सामग्री का स्तर बेहद गिर गया है और पूरा लेख पढ़ने के बाद उसमें से कोई काम की बात कोई तार्किक समझदारी या विश्लेषण ढूंढ पाना मुश्किल होता है। कुछ स्वनामधन्य प्रतिष्ठित स्तंभकार अपनी चवन्नी चलाए जा रहे हैं। ज्यादातर लेखों का कोई आपरेटिव पार्ट ही नहीं होता है और यह समझना मुश्किल होता है कि लेख लिखा ही क्यों गया था। लगता है कि हमारे माननीय पत्रकारों, विचारकों ने सोचना-समझना, चिंतन करना और यहां तक कि पढ़ना-लिखना भी बंद कर दिया है। दो-चार डेटा, पुरानी पढ़ाई से हासिल दो-चार तर्क, दो-चार शब्दों की बाजीगरी और हो गया लेख तैयार। न्यूज और विज्ञापन का फर्क मिटता जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महिमागान करने वाला मीडिया यह नहीं बताता कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिल जाना ही पूरा जनवाद नहीं होता। आज का मीडिया कहीं एकदम साफ झूठ बोल रहा है तो कहीं सत्यांश, कहीं वह जितना कहता है उससे कहीं ज्यादा छुपाता है तो कहीं वह निष्पक्षता की आड़ में स्पष्टत: जनविरोधी और प्रतिक्रियावादी प्रचार का माध्यम बना हुआ है।
मीडिया की दुर्गति पर चिंतित ज्यादतर विचारकों की चिंता उसके जनपक्षधर चरित्र की नहीं बल्कि उसकी स्तरहीन सामग्री को लेकर है। लेकिन मीडिया की बीमार हालत का उनका रोग-निदान जितना सतही और आंशिक है उनकी सलाह उतनी ही निष्प्रभावी है। कुल मिलाकर उनकी बातों का सार यह है कि मीडिया की विभिन्न भूमिकाओं के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, कुछ कुछ सुधार करके चीजों को ठीक कर लिया जाए, न्यूज और विज्ञापन के बीच संतुलन बनाया जाए और मुनाफे के उद्यम के साथ-साथ मीडिया की विश्वसनीयता पर आंच भी न आने दी जाए। पूंजीपतियों के स्वामित्व वाले मीडिया के विकल्प का कोई खाका उनके पास नहीं है। उनकी गरमा-गरम आलोचना में किसी सार्थक पहल की दिशा नहीं है नौजवान मीडियाकर्मियों को वे इसी प्रणाली में फिट हो जाने के अलावा कोई दूसर मार्ग नहीं दिखा सकते। आखिर इसी मीडिया ने उन्हें शोहरत और सहूलियतें दी हैं इसलिए इसके स्वास्थ्य की चिंता तो उन्हें होती ही है, यह दीगर बात है कि इसका इलाज करने में वे असमर्थ हैं।
Sunday, April 12, 2009
सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त दलित चेतना - भाग II
यह समझने के लिए बहुत अक्ल की जरूरत नहीं है कि आज के युग में जाति व्यवस्था की कोई आवश्यकता नहीं है। जाति व्यवस्था के जिस शुद्धतम प्राचीन रूप की बात की जाती है वह भी आज के समय में लागू नहीं हो सकती है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जाति व्यवस्था की उपयोगिता कब की समाप्त हो चुकी है। लेकिन इतिहास निर्माण में बल की भूमिका का सिद्धान्त बताता है कि कोई चीज चाहे कितनी ही जर्जर क्यों न हो जाए वह तब तक नष्ट नहीं होगी जब तक कि उसपर बाहर से बल आरोपित न किया जाए। जाति व्यवस्था के संदर्भ में आज हम ऐसे ही मुकाम पर खड़े हैं।
हर चीज को विद्यमान है उसके होने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य है और वह कारण उस चीज को सार्थकता प्रदान करता है, लेकिन समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है और उसे नष्ट कर देने के कारण भी उत्पन्न होने लगते हैं। जाति प्रथा आजतक मौजूद है तो इसके पीछे भी कारण हैं।
पूरा का पूरा सामन्ती समाज शूद्रों और दलितों के श्रम पर आश्रित था। अपने विशेषाधिकारों को बनाए रखने और अपने उत्तराधिकारियों का भविष्य सुनिश्चित करने के लिए जरूरी था कि शासक वर्ग (अगड़ी जातियां) कठोर जातिगत नियम और कानून बनाएं। उस दौर में सत्ता और धर्म दो प्रमुख हथियार थे जिनका उपयोग निचली जातियों के सदियों से अनपढ़ लोगों का शोषण-उत्पीड़न करने के लिए किया जाता था।
जाति व्यवस्था का आज भी इसी उद्देश्य पूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज न सिर्फ उच्च जातियों के सत्ताधारी बल्कि दलित जातियों के सत्ताधारी भी सत्ता हासिल करने और उसे बचाए रखने के लिए जाति प्रथा का उपयोग कर रहे हैं। अगर जाति प्रथा वास्तव में समाप्त हो गयी तो वे सत्ता कैसे हासिल करेंगे।
पूंजीवाद अपने साथ आधुनिक विचार लेकर आता है। वह लोगों में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के विचार डालता है। तर्क और खुले दिमाग से सोचने को प्रोत्साहित करता है। लेकिन यह उसी दौर में होता है जिस दौर तक पूंजीवाद की भूमिका क्रान्तिकारी होती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब पूंजीवाद अपने स्वघोषित उद्देश्यों से ही पीछे हट जाता है। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ खरीदने बेचने की स्वतंत्रता होती है, समानता सिर्फ पूंजीपतियों के लिए होती है और भाईचारा सिर्फ मुनाफे के आधार पर बनता है। जब तक फायदा हो तब तक भाई-भाई और अगर फायदा न हो तो मार-कुटाई। अपने प्रगतिविरोधी रूप में पूंजीवाद अतीत की उन सभी प्रथाओं को गोद ले लेता है जो भले ही आज के लिए उपयोगी न हों लेकिन जिससे उसका हित सधता हो। ऐसा ही कुछ जाति प्रथा के साथ भी हुआ। लोगों को बांटने और अपना उल्लू सीधा करने में जाति प्रथा और इस तरह की अन्य चीजें जैसे कि धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता ऐसे अचूक हथियारों का काम करते हैं कि शासक वर्ग कभी नहीं चाहेगा कि वे पूरी तरह समाप्त हों।
ऐसे में दलित जातियों के कुछ आगे बढ़ आए लोगों को भी इसी में अपना फायदा दिखाई देता है। जैसे ही वे थोड़ा पढ़-लिख लेते हैं या पैसा कमा लेते हैं जो वे जल्दी से जल्दी उच्च जातियों में जगह प्राप्त करने को बेचैन हो जाते हैं। इसलिए वे जातियों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय आरक्षण जैसी मांगें करते हैं। वे यह कोशिश नहीं करते कि सदियों से हीन भावना से ग्रस्त अपने बिरादर भाइयों को सम्मान के साथ जीना और संघर्ष करना सिखाएं। बल्कि इधर-उधर के कुछ मुद्दे उठाकर वे इस पूरी लड़ाई को ही मुद्दे से भटका देते हैं।
जाति प्रथा कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे संसद में बहुमत पाकर, आरक्षण लागू करके या नियम-कानून बनाकर समाप्त किया जा सके। यह मनुष्य की गरिमा की लड़ाई है। यह समाज में मानव श्रम को उसका उचित स्थान दिलाने की लड़ाई है। यह इस तथ्य को स्थापित करने की लड़ाई है कि श्रम वास्तव में मनुष्य का नैसर्गिक गुण है। और श्रम किए बिना मनुष्य मनुष्य रह ही नहीं सकता है। यह निजी संपत्ति पर आधारित एक सदियों पुरानी बुराई का नाश करने की लड़ाई है। चूंकि आज के मजदूर वर्ग में दलित जातियों के ही लोग सबसे अधिक हैं इसलिए मजदूरों के हकों की कोई भी लड़ाई वास्तव में दलित जातियों के लोगों की बहुसंख्या के हित की लड़ाई है। आरक्षण जैसी चीजों के बजाय मजदूर आन्दोलन से ही दलित जातियों का सबसे बड़ा और सबसे निचला तबका अपना उद्धार कर सकता है। इसलिए मार्क्स के सिद्धान्तों की अनदेखी करके दलित प्रश्न का कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है।
हर चीज को विद्यमान है उसके होने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य है और वह कारण उस चीज को सार्थकता प्रदान करता है, लेकिन समय के साथ हर चीज अपने विपरीत में बदल जाती है और उसे नष्ट कर देने के कारण भी उत्पन्न होने लगते हैं। जाति प्रथा आजतक मौजूद है तो इसके पीछे भी कारण हैं।
पूरा का पूरा सामन्ती समाज शूद्रों और दलितों के श्रम पर आश्रित था। अपने विशेषाधिकारों को बनाए रखने और अपने उत्तराधिकारियों का भविष्य सुनिश्चित करने के लिए जरूरी था कि शासक वर्ग (अगड़ी जातियां) कठोर जातिगत नियम और कानून बनाएं। उस दौर में सत्ता और धर्म दो प्रमुख हथियार थे जिनका उपयोग निचली जातियों के सदियों से अनपढ़ लोगों का शोषण-उत्पीड़न करने के लिए किया जाता था।
जाति व्यवस्था का आज भी इसी उद्देश्य पूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज न सिर्फ उच्च जातियों के सत्ताधारी बल्कि दलित जातियों के सत्ताधारी भी सत्ता हासिल करने और उसे बचाए रखने के लिए जाति प्रथा का उपयोग कर रहे हैं। अगर जाति प्रथा वास्तव में समाप्त हो गयी तो वे सत्ता कैसे हासिल करेंगे।
पूंजीवाद अपने साथ आधुनिक विचार लेकर आता है। वह लोगों में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के विचार डालता है। तर्क और खुले दिमाग से सोचने को प्रोत्साहित करता है। लेकिन यह उसी दौर में होता है जिस दौर तक पूंजीवाद की भूमिका क्रान्तिकारी होती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब पूंजीवाद अपने स्वघोषित उद्देश्यों से ही पीछे हट जाता है। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ खरीदने बेचने की स्वतंत्रता होती है, समानता सिर्फ पूंजीपतियों के लिए होती है और भाईचारा सिर्फ मुनाफे के आधार पर बनता है। जब तक फायदा हो तब तक भाई-भाई और अगर फायदा न हो तो मार-कुटाई। अपने प्रगतिविरोधी रूप में पूंजीवाद अतीत की उन सभी प्रथाओं को गोद ले लेता है जो भले ही आज के लिए उपयोगी न हों लेकिन जिससे उसका हित सधता हो। ऐसा ही कुछ जाति प्रथा के साथ भी हुआ। लोगों को बांटने और अपना उल्लू सीधा करने में जाति प्रथा और इस तरह की अन्य चीजें जैसे कि धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता ऐसे अचूक हथियारों का काम करते हैं कि शासक वर्ग कभी नहीं चाहेगा कि वे पूरी तरह समाप्त हों।
ऐसे में दलित जातियों के कुछ आगे बढ़ आए लोगों को भी इसी में अपना फायदा दिखाई देता है। जैसे ही वे थोड़ा पढ़-लिख लेते हैं या पैसा कमा लेते हैं जो वे जल्दी से जल्दी उच्च जातियों में जगह प्राप्त करने को बेचैन हो जाते हैं। इसलिए वे जातियों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय आरक्षण जैसी मांगें करते हैं। वे यह कोशिश नहीं करते कि सदियों से हीन भावना से ग्रस्त अपने बिरादर भाइयों को सम्मान के साथ जीना और संघर्ष करना सिखाएं। बल्कि इधर-उधर के कुछ मुद्दे उठाकर वे इस पूरी लड़ाई को ही मुद्दे से भटका देते हैं।
जाति प्रथा कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे संसद में बहुमत पाकर, आरक्षण लागू करके या नियम-कानून बनाकर समाप्त किया जा सके। यह मनुष्य की गरिमा की लड़ाई है। यह समाज में मानव श्रम को उसका उचित स्थान दिलाने की लड़ाई है। यह इस तथ्य को स्थापित करने की लड़ाई है कि श्रम वास्तव में मनुष्य का नैसर्गिक गुण है। और श्रम किए बिना मनुष्य मनुष्य रह ही नहीं सकता है। यह निजी संपत्ति पर आधारित एक सदियों पुरानी बुराई का नाश करने की लड़ाई है। चूंकि आज के मजदूर वर्ग में दलित जातियों के ही लोग सबसे अधिक हैं इसलिए मजदूरों के हकों की कोई भी लड़ाई वास्तव में दलित जातियों के लोगों की बहुसंख्या के हित की लड़ाई है। आरक्षण जैसी चीजों के बजाय मजदूर आन्दोलन से ही दलित जातियों का सबसे बड़ा और सबसे निचला तबका अपना उद्धार कर सकता है। इसलिए मार्क्स के सिद्धान्तों की अनदेखी करके दलित प्रश्न का कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है।
Thursday, March 26, 2009
सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त दलित चेतना
हाल ही में 'आज समाज' अखबार में छपी एक छोटी सी खबर का जिक्र करना चाहता हूं। अखबार की खबर के अनुसार फोरम आफ एकेडमिक्स फार सोशल जस्टिस की ओर से दिल्ली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्री हरबंस नाम के एक वक्ता ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होने के कारण राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से प्रकाशित रंगनायकम्मा की पुस्तक '''जाति' प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं' पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। श्री हरबंस ने और क्या कहा इसकी अखबार में कोई चर्चा नहीं है और फिलहाल मैं उसपर कोई टिप्पणी भी नहीं कर रहा हूं, मैं सिर्फ जातिसूचक शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति के पीछे काम करने वाली मानसिकता पर कुछ बातें करना चाहता हूं।
सबसे पहले तो मैं ऐसा आरोप लगाने वाले सम्मानित बुद्धिजीवी से पूछना चाहता हूं कि क्या जाति प्रश्न पर कोई किताब जातियों का नाम लिए बिना लिखी जा सकती है। क्या बुद्ध और अंबेडकर ने खास जाति के लोगों को संबोधित करने के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। मान लीजिये कि किसी तथाकथित निम्न जाति (यहां यह स्पष्टत कर दें कि न तो रंगनायकम्मा और न ही ब्लागर उन्हें निम्न मानता है, ऐतिहासिक कारणों से मुझे ऐसी शब्दावली का प्रयोग करना पड़ रहा है) के लोगों का एक संगठन है, तो यदि उससे पूछा जाए कि आप कौन हैं तो क्या इसका जवाब यह होना चाहिए कि हम ऐसी जाति के लोगों का संगठन हैं जिसका नाम लेने से हमपर और आपपर जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का आरोप लग सकता है।
और संविधान किस तरह जातियों को आरक्षण देता है। क्या वह जातियों का नाम लिए बिना और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किए बिना आरक्षण की बात करता है। और जो लोग आरक्षण का लाभ प्राप्त करते हैं क्या उनके प्रमाणपत्र पर जाति का उल्लेख नहीं होता है। अगर जातिसूचक शब्दों के प्रयोग के आधार पर प्रतिबंध लगाया जाए तो तमाम धार्मिक ग्रंथ जिनमें बौद्ध ग्रंथ भी शामिल हैं उनपर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा क्योंकि उनमें तो अनेकों बार तमाम ऊंची-नीची जातियों का उल्लेख आता है।
असल में मामला यह है कि ऐसी मांग करने वाले हमारे बुद्धिजीवी जातियों के संबंध में स्वयं ही उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं जिसका वे दूसरों पर आरोप लगाते हैं। आखिर रंगनाकम्मा ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किसी जाति विशेष को गाली देने के लिए तो किया नहीं है, बल्कि उनके समर्थन में किया है। वे तो यहां तक कहती हैं कि किसी ''निचली'' जाति का होना अपमान का नहीं बल्कि सम्मान की बात है क्योंकि इन जातियों के लोग दूसरों का शोषण करके नहीं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर जीते हैं। लेकिन हमारे बुद्धिजीवी ऐसा नहीं सोचते। वे यह नहीं सोचते कि जबतक समाज में किसी काम को छोटा और किसी काम को बड़ा समझने की मानसिकता बनी रहेगी और इस आधार पर लोगों में सामाजिक विभाजन बने रहेंगे तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी खास वर्ग को संबोधित करने के लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जब तक विभाजन रहेगा उस विभाजन को व्यक्त करने वाले शब्द भी रहेंगे ही रहेंगे, इसे किसी ताकत या कानून से रोका नहीं जा सकता। आज के शब्द कल न रहें तो भी वह काम और उस काम को करने वाले लोग तो रहेंगे ही। और उनको पुकारने के लिए किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा।
सच्चाई यह है कि जिन्हे ''निचली'' जातियां कहा जाता है वे ज्यादातर वे जातियां हैं जो शारीरिक श्रम करती हैं जिनके श्रम के बिना पूरा का पूरा समाज एक दिन भी चल नहीं सकता। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इन जातियों को अपने पर फख्र महससू करना चाहिए। लेकिन चूंकि समाज पर बौद्धिक श्रम (वास्तव में निठल्लापन) करने वालों का प्रभुत्व रहा है इसलिए वे इस तरह के शारीरिक काम को हेय समझते हैं, और स्वयं करना तो दूर जो करते हैं उन्हें नीची नजर से देखते हैं। ऐसे में जिन शब्दों के साथ अपने को जोड़कर किसी इंसान को सम्मांनित महससू करना चाहिए उन शब्दों के प्रयोग पर हमारे बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं। क्या इससे यह निष्किर्ष नहीं निकलता कि हमारे सम्मानित बुद्धिजीवी भी श्रम के संदर्भ में उसी सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हैं।
दलित बुद्धिजीवियों और अन्य पढ़े-लिखे दलितों के साथ एक समस्या तो यह भी है कि वे अपनी जाति को लेकर स्व्यं ही हीन भावना के शिकार रहते हैं। अपनी जाति के लोगों को अपने पेशे पर सम्मानित महसूस करने के लिए प्रोत्सांहित करने के बजाय उनकी मंशा बस इतनी होती है कि बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग का हो जाने के बाद उन्हें उनकी जाति से जोड़कर न देखा जाए। अपने बराबर की हैसियत वाले समाज में (धन पर आधारित बराबरी) उन्हें अगड़ी जातियों के बराबर का समझा जाए। दलित पूंजीवाद की वकालत करने वाले लोगों का भी यही अप्रोच है कि दलितों में ही कुछ अमीर और गरीब दलित हो जाएं। तो यह प्रश्न भी उठता है कि दलित जातियों के अमीर उन दलितों को क्या हेय नहीं समझेंगे जो अपने पुराने पेशे में ही रह जाएंगे। क्या कोई अमीर दलित किसी गरीब दलित के परिवार के साथ वैवाहिक संबंध बनाना चाहेगा। और अगर इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो क्या इससे सिद्ध नहीं हो जाता कि आज की परिस्थिति में जाति प्रश्न का समाधान संपत्ति के प्रश्न को हल किए बिना नहीं किया जा सकता। और इसी से क्या यह सहज निष्कर्ष भी नहीं निकलता है कि जाति प्रश्न के समाधान के लिए मार्क्स जरूरी हैं।
मजेदार बात तो यह है कि जहां जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर इतना हो हल्ला मचता है उस देश में तमाम सरकारी कागजों पर जाति का कॉलम बना होता है। जिनमें बहुत से सरकारी कागज तो ऐसे होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की जाति पूछने का कोई औचित्य ही नहीं होता। जैसे कि किराए पर मकान लेते समय पुलिस वेरिफिकेशन के लिए प्रयोग किया जाने वाला कागज।
अगली पोस्ट में मैं इस बात पर फोकस करूंगा कि आज समाज में पेशे के आधार पर जाति विभाजन का कोई औचित्य नहीं रह गया है, क्योंकि चाहे निम्न जाति का लड़का हो या उच्च जाति का अगर वह गरीब है तो वह शहर आकर फैक्ट्री में काम करेगा अपने पुरखों का पेशा तो करेगा नहीं। इसलिए तर्कसंगत ढंग से देखें तो पेशे पर आधारित जातियों के विभाजन की व्यावस्था पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के साथ फिट नहीं होती। लेकिन फिर भी ऐसा है, तो इसके क्या कारण हैं। वे कौन हैं जिनका हित जाति व्यीवस्था को बनाए रखने में है या कहें कि जाति व्यणवस्था किनका हित साधन करती है।
सबसे पहले तो मैं ऐसा आरोप लगाने वाले सम्मानित बुद्धिजीवी से पूछना चाहता हूं कि क्या जाति प्रश्न पर कोई किताब जातियों का नाम लिए बिना लिखी जा सकती है। क्या बुद्ध और अंबेडकर ने खास जाति के लोगों को संबोधित करने के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। मान लीजिये कि किसी तथाकथित निम्न जाति (यहां यह स्पष्टत कर दें कि न तो रंगनायकम्मा और न ही ब्लागर उन्हें निम्न मानता है, ऐतिहासिक कारणों से मुझे ऐसी शब्दावली का प्रयोग करना पड़ रहा है) के लोगों का एक संगठन है, तो यदि उससे पूछा जाए कि आप कौन हैं तो क्या इसका जवाब यह होना चाहिए कि हम ऐसी जाति के लोगों का संगठन हैं जिसका नाम लेने से हमपर और आपपर जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का आरोप लग सकता है।
और संविधान किस तरह जातियों को आरक्षण देता है। क्या वह जातियों का नाम लिए बिना और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किए बिना आरक्षण की बात करता है। और जो लोग आरक्षण का लाभ प्राप्त करते हैं क्या उनके प्रमाणपत्र पर जाति का उल्लेख नहीं होता है। अगर जातिसूचक शब्दों के प्रयोग के आधार पर प्रतिबंध लगाया जाए तो तमाम धार्मिक ग्रंथ जिनमें बौद्ध ग्रंथ भी शामिल हैं उनपर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा क्योंकि उनमें तो अनेकों बार तमाम ऊंची-नीची जातियों का उल्लेख आता है।
असल में मामला यह है कि ऐसी मांग करने वाले हमारे बुद्धिजीवी जातियों के संबंध में स्वयं ही उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं जिसका वे दूसरों पर आरोप लगाते हैं। आखिर रंगनाकम्मा ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किसी जाति विशेष को गाली देने के लिए तो किया नहीं है, बल्कि उनके समर्थन में किया है। वे तो यहां तक कहती हैं कि किसी ''निचली'' जाति का होना अपमान का नहीं बल्कि सम्मान की बात है क्योंकि इन जातियों के लोग दूसरों का शोषण करके नहीं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर जीते हैं। लेकिन हमारे बुद्धिजीवी ऐसा नहीं सोचते। वे यह नहीं सोचते कि जबतक समाज में किसी काम को छोटा और किसी काम को बड़ा समझने की मानसिकता बनी रहेगी और इस आधार पर लोगों में सामाजिक विभाजन बने रहेंगे तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी खास वर्ग को संबोधित करने के लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जब तक विभाजन रहेगा उस विभाजन को व्यक्त करने वाले शब्द भी रहेंगे ही रहेंगे, इसे किसी ताकत या कानून से रोका नहीं जा सकता। आज के शब्द कल न रहें तो भी वह काम और उस काम को करने वाले लोग तो रहेंगे ही। और उनको पुकारने के लिए किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा।
सच्चाई यह है कि जिन्हे ''निचली'' जातियां कहा जाता है वे ज्यादातर वे जातियां हैं जो शारीरिक श्रम करती हैं जिनके श्रम के बिना पूरा का पूरा समाज एक दिन भी चल नहीं सकता। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इन जातियों को अपने पर फख्र महससू करना चाहिए। लेकिन चूंकि समाज पर बौद्धिक श्रम (वास्तव में निठल्लापन) करने वालों का प्रभुत्व रहा है इसलिए वे इस तरह के शारीरिक काम को हेय समझते हैं, और स्वयं करना तो दूर जो करते हैं उन्हें नीची नजर से देखते हैं। ऐसे में जिन शब्दों के साथ अपने को जोड़कर किसी इंसान को सम्मांनित महससू करना चाहिए उन शब्दों के प्रयोग पर हमारे बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं। क्या इससे यह निष्किर्ष नहीं निकलता कि हमारे सम्मानित बुद्धिजीवी भी श्रम के संदर्भ में उसी सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हैं।
दलित बुद्धिजीवियों और अन्य पढ़े-लिखे दलितों के साथ एक समस्या तो यह भी है कि वे अपनी जाति को लेकर स्व्यं ही हीन भावना के शिकार रहते हैं। अपनी जाति के लोगों को अपने पेशे पर सम्मानित महसूस करने के लिए प्रोत्सांहित करने के बजाय उनकी मंशा बस इतनी होती है कि बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग का हो जाने के बाद उन्हें उनकी जाति से जोड़कर न देखा जाए। अपने बराबर की हैसियत वाले समाज में (धन पर आधारित बराबरी) उन्हें अगड़ी जातियों के बराबर का समझा जाए। दलित पूंजीवाद की वकालत करने वाले लोगों का भी यही अप्रोच है कि दलितों में ही कुछ अमीर और गरीब दलित हो जाएं। तो यह प्रश्न भी उठता है कि दलित जातियों के अमीर उन दलितों को क्या हेय नहीं समझेंगे जो अपने पुराने पेशे में ही रह जाएंगे। क्या कोई अमीर दलित किसी गरीब दलित के परिवार के साथ वैवाहिक संबंध बनाना चाहेगा। और अगर इस प्रश्न का उत्तर नहीं है तो क्या इससे सिद्ध नहीं हो जाता कि आज की परिस्थिति में जाति प्रश्न का समाधान संपत्ति के प्रश्न को हल किए बिना नहीं किया जा सकता। और इसी से क्या यह सहज निष्कर्ष भी नहीं निकलता है कि जाति प्रश्न के समाधान के लिए मार्क्स जरूरी हैं।
मजेदार बात तो यह है कि जहां जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर इतना हो हल्ला मचता है उस देश में तमाम सरकारी कागजों पर जाति का कॉलम बना होता है। जिनमें बहुत से सरकारी कागज तो ऐसे होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की जाति पूछने का कोई औचित्य ही नहीं होता। जैसे कि किराए पर मकान लेते समय पुलिस वेरिफिकेशन के लिए प्रयोग किया जाने वाला कागज।
अगली पोस्ट में मैं इस बात पर फोकस करूंगा कि आज समाज में पेशे के आधार पर जाति विभाजन का कोई औचित्य नहीं रह गया है, क्योंकि चाहे निम्न जाति का लड़का हो या उच्च जाति का अगर वह गरीब है तो वह शहर आकर फैक्ट्री में काम करेगा अपने पुरखों का पेशा तो करेगा नहीं। इसलिए तर्कसंगत ढंग से देखें तो पेशे पर आधारित जातियों के विभाजन की व्यावस्था पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के साथ फिट नहीं होती। लेकिन फिर भी ऐसा है, तो इसके क्या कारण हैं। वे कौन हैं जिनका हित जाति व्यीवस्था को बनाए रखने में है या कहें कि जाति व्यणवस्था किनका हित साधन करती है।
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Monday, February 16, 2009
सत्यम का घोटाला और नैतिकता की दुहाई।
सत्यम कंपनी का घोटाला जगजाहिर होने के बाद सरकार से लेकर नियामक एजेंसियों और मीडिया तक सब के सब रामालिंगा राजू पर टूट पड़े। कल तब जिसे इंक्रेडिबल इंडिया का स्टार आइकॉन बताया जा रहा था उसे अचानक बदनामी के गर्त में गिरा दिया गया। सत्यम के घोटाले को एक असाधारण घटना करार दिया गया और राजू के कृत्य का अनैतिकता की श्रेणी में डाल दिया गया।
प्रश्न यहीं खड़ा होता है। रामालिंगा राजू ने जो किया वह अनैतिक कैसे हो सकता है। और रामालिंगा राजू न ऐसा क्या किया जो उनके जैसे बाकी लोग नहीं करते या अपनी औकात के मुताबिक जिन्हें मौका मिलता है वह नहीं करते। नैतिकता की दुहाई तो तब दी जा सकती है जब नैतिकता और अनैतिकता में कोई गुणात्मक भेद हो।
अगर रामालिंगा राजू पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने बही-खातों में हेर फेर की तो पूछा जा सकता है कि उसने कौन सा बड़ा गुनाह कर दिया। कौन पूंजीपति, व्यवसायी, दूकानदार, बही-खातों में हेर फेर नहीं करता। छोटे से छोटे दूकानदार से लेकर बड़े से बड़े उद्योगपति तक कौन टैक्स बचाने के लिए झूठे खर्च और हिसाब किताब में गड़बड़ी नहीं करता। अगर छोटा दूकानदार दाल और चावल में मिलावट करता है तो बड़ा पूंजीपति घटिया उत्पाद बनाकर मुनाफा कमाता है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम जैसी बड़ी बड़ी साफ्टवेयर कंपनियों के मुनाफे का राज़ है उनके कर्मचारियों का भयंकर शोषण और उनकी मेहनत की लूट। सॉफ्टवेयर कंपनियों में 10-12 घंटे काम को सामान्य समझा जाता है और पगार 8 घंटे की दी जाती है। इन कंपनियों में कहा जाता है कि आने का समय तो तय है लेकिन जाने का समय मैनेजर और काम के अनुसार तय होता है। ओवरटाइम का कोई झंझट ये कंपनियां नहीं पालतीं बस आपको चाय कॉफी मिलती रहती है। चूंकि ये कंपनियां विदेशी ग्राहकों की सेवा करती हैं इसलिए मुद्रा में अंतर के कारण इन्हें भारी मुनाफा होता है और अपने कर्मचारियों को बाकी उद्योगों की तुलना में बेहतर पगार देने के बाद भी इनका मुनाफा जबरदस्त होता है। साफ्टवेयर और कॉल सेंटर में काम करने वालों की जिंदगी कोल्हू के बैल के जैसी होती है। जिंदगी और बाहरी दुनिया से कटे ये नौजवान बहुत कम उम्र में ही अलगाव, डिप्रेशन और अन्य मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
यह सब कुछ सामान्य माना जाता है और अनैतिक नहीं समझा जाता। राजू भी जब यह सब कर रहा था तब उसे अनैतिक नहीं समझा गया। राजू की गलती बस यही रही कि वह अपनी सीमा से बाहर चला गया और नियंत्रण खो बैठा। पर जो खुद ही अनैतिक हैं, जो खुद ही ये सारे गलत धंधे करते हैं वे राजू को किस आधार पर अनैतिक कह रहे हैं। क्या हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, फिक्की और एस्सोचैम के लोग जो राजू को अनैतिक कह रहे हैं वे यह मानते हैं कि बाकी सभी दूध के धुले हैं। वास्तव में सबकी सच्चाई सभी जानते हैं लेकिन आपसी समझदारी के नाते कोई मुंह नहीं खोलता जब तक कि समस्या इस हद तक न बढ़ जाए कि उसे छुपाए रख पाना संभव ही न हो सके।
असल में पूंजीवादी व्यवस्था में नैतिकता और अनैतिकता का कोई भेद नहीं होता। जो चीज मुनाफा दे वह नैतिक होती है। यहां लूट, डकैती, भ्रष्टाचार सब जायज है। और यह अपने दायरे में सभी को समेट लेती है। हर छोटे बड़े व्यवसायी को ईमान धर्म बेचकर बस मुनाफा कमाना होता है। इसलिए चूंकि हमाम में सभी नंगे होते हैं और एकदूसरे की असलियत से वाकिफ होते हैं कोई दूसरे पर उंगली नहीं उठाता। जब पानी सर से गुजरने लगता है तब किसी न किसी को बलि का बकरा बनना पड़ता है ताकि लोगों का भरोसा इस व्यवस्था में बनाए रखा जा सके। राजू के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का बस यही मतलब है कि निवेशकों का विश्वास भारतीय अर्थव्यवस्था से टूट न जाए। सिर्फ एक राजू की वजह से लूट के इस पूरे कारोबार पर ही खतरा न मंडराने लगे। हमारे देश को चलाने वाले पूंजीपतियों और उनकी सरकार की बस यही मंशा है। नैतिकता और ईमान धर्म से तो खुद उनका दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है।
प्रश्न यहीं खड़ा होता है। रामालिंगा राजू ने जो किया वह अनैतिक कैसे हो सकता है। और रामालिंगा राजू न ऐसा क्या किया जो उनके जैसे बाकी लोग नहीं करते या अपनी औकात के मुताबिक जिन्हें मौका मिलता है वह नहीं करते। नैतिकता की दुहाई तो तब दी जा सकती है जब नैतिकता और अनैतिकता में कोई गुणात्मक भेद हो।
अगर रामालिंगा राजू पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसने बही-खातों में हेर फेर की तो पूछा जा सकता है कि उसने कौन सा बड़ा गुनाह कर दिया। कौन पूंजीपति, व्यवसायी, दूकानदार, बही-खातों में हेर फेर नहीं करता। छोटे से छोटे दूकानदार से लेकर बड़े से बड़े उद्योगपति तक कौन टैक्स बचाने के लिए झूठे खर्च और हिसाब किताब में गड़बड़ी नहीं करता। अगर छोटा दूकानदार दाल और चावल में मिलावट करता है तो बड़ा पूंजीपति घटिया उत्पाद बनाकर मुनाफा कमाता है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम जैसी बड़ी बड़ी साफ्टवेयर कंपनियों के मुनाफे का राज़ है उनके कर्मचारियों का भयंकर शोषण और उनकी मेहनत की लूट। सॉफ्टवेयर कंपनियों में 10-12 घंटे काम को सामान्य समझा जाता है और पगार 8 घंटे की दी जाती है। इन कंपनियों में कहा जाता है कि आने का समय तो तय है लेकिन जाने का समय मैनेजर और काम के अनुसार तय होता है। ओवरटाइम का कोई झंझट ये कंपनियां नहीं पालतीं बस आपको चाय कॉफी मिलती रहती है। चूंकि ये कंपनियां विदेशी ग्राहकों की सेवा करती हैं इसलिए मुद्रा में अंतर के कारण इन्हें भारी मुनाफा होता है और अपने कर्मचारियों को बाकी उद्योगों की तुलना में बेहतर पगार देने के बाद भी इनका मुनाफा जबरदस्त होता है। साफ्टवेयर और कॉल सेंटर में काम करने वालों की जिंदगी कोल्हू के बैल के जैसी होती है। जिंदगी और बाहरी दुनिया से कटे ये नौजवान बहुत कम उम्र में ही अलगाव, डिप्रेशन और अन्य मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
यह सब कुछ सामान्य माना जाता है और अनैतिक नहीं समझा जाता। राजू भी जब यह सब कर रहा था तब उसे अनैतिक नहीं समझा गया। राजू की गलती बस यही रही कि वह अपनी सीमा से बाहर चला गया और नियंत्रण खो बैठा। पर जो खुद ही अनैतिक हैं, जो खुद ही ये सारे गलत धंधे करते हैं वे राजू को किस आधार पर अनैतिक कह रहे हैं। क्या हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, फिक्की और एस्सोचैम के लोग जो राजू को अनैतिक कह रहे हैं वे यह मानते हैं कि बाकी सभी दूध के धुले हैं। वास्तव में सबकी सच्चाई सभी जानते हैं लेकिन आपसी समझदारी के नाते कोई मुंह नहीं खोलता जब तक कि समस्या इस हद तक न बढ़ जाए कि उसे छुपाए रख पाना संभव ही न हो सके।
असल में पूंजीवादी व्यवस्था में नैतिकता और अनैतिकता का कोई भेद नहीं होता। जो चीज मुनाफा दे वह नैतिक होती है। यहां लूट, डकैती, भ्रष्टाचार सब जायज है। और यह अपने दायरे में सभी को समेट लेती है। हर छोटे बड़े व्यवसायी को ईमान धर्म बेचकर बस मुनाफा कमाना होता है। इसलिए चूंकि हमाम में सभी नंगे होते हैं और एकदूसरे की असलियत से वाकिफ होते हैं कोई दूसरे पर उंगली नहीं उठाता। जब पानी सर से गुजरने लगता है तब किसी न किसी को बलि का बकरा बनना पड़ता है ताकि लोगों का भरोसा इस व्यवस्था में बनाए रखा जा सके। राजू के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों का बस यही मतलब है कि निवेशकों का विश्वास भारतीय अर्थव्यवस्था से टूट न जाए। सिर्फ एक राजू की वजह से लूट के इस पूरे कारोबार पर ही खतरा न मंडराने लगे। हमारे देश को चलाने वाले पूंजीपतियों और उनकी सरकार की बस यही मंशा है। नैतिकता और ईमान धर्म से तो खुद उनका दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है।
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